कश्मीर में इतना अधिक मतदान क्यों हुआ?

श्रीनगर के सोनावरी में मतदान के लिए खड़ी महिलाएं
    • Author, रियाज़ मसरूर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

कड़कड़ाती ठंड और अलगाववादियों के चुनाव बहिष्कार की अपील के बावजूद भारत प्रशासित कश्मीर के दो ज़िलों में मंगलवार को 70 फ़ीसदी से अधिक मतदान हुआ.

पिछले कई दशकों में यह पहली बार है कि कश्मीर में चुनाव के दौरान हिंसा की कोई बड़ी घटना नहीं हुई.

जब यह पूछा गया कि क्या यह कश्मीर के अलगाववादियों की सार्वजनिक अवहेलना है तो मतदाताओं ने बहुत सावधानी से जवाब दिया.

बदलाव के लिए मतदान

कश्मीर में मतदान के लिए कतार में खड़े लोग

बदलाव के लिए मतदान करने वाले बैंककर्मी एजाज़ अहमद ने कहा, "यहां कश्मीर एक बड़ी समस्या है. इसके अलावा बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं, जिनका हम रोज़मर्रा के जीवन में सामना करते हैं. हम इस बात की उम्मीद नहीं करते हैं कि हमारे चुने हुए नेता कश्मीर समस्या पर भारत-पाकिस्तान से बातचीत करेंगे. हमें इस बात की खुशी है कि अलगाववादी यह काम कर रहे हैं. लेकिन हम चाहते हैं कि एक ईमानदार व्यक्ति विधानसभा में हमारा प्रतिनिधित्व करे."

आश्चर्य की बात यह है कि बड़ी संख्या में मतदाता वोट डालने निकले. लेकिन अलगाववादियों के चुनाव बहिष्कार की अपील पर बंद भी देखा गया.

हड़ताल और मतदान

कश्मीर में मतदान करता एक मतदाता

आख़िर हड़ताल और मतदान का मतलब क्या है? इस सवाल पर गांदरबल के एक बुजुर्ग अब्दुल राशिद कहते हैं, "मतदान का यह मतलब कतई नहीं है कि कश्मीर की प्रमुख समस्या का अंत हो गया. लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए हमारे पुरखों ने अपनी जान दी है. मतदान कर हम उसका सम्मान करते हैं."

जम्मू कश्मीर में मतदान के लिए कतार में खड़ी महिलाएं
इमेज कैप्शन, कश्मीर के दो ज़िलों में मंगलवार को 70 फ़ीसद से अधिक मतदान हुआ.

वो कहते हैं, ''लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि हम भारत के साथ वर्तमान व्यवस्था से ख़ुश हैं. हुर्रियत नेता इस मुद्दे के प्रतिनिधि हैं. लेकिन उन्हें जेल भेज दिया गया है और सैकड़ों अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है. वोट डालते समय हमें बहुत बुरा लगा."

अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने आधिकारिक दावों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि चुनाव बंदूक के साए में कराए गए.

अपील ठुकराई

उन्होंने एक बयान में कहा, "यह एक अलोकतांत्रिक और थोपी गई प्रक्रिया थी. हम इसे ख़ारिज करते हैं."

कश्मीर में मतदान के बाद स्याही दिखाता एक मतदाता

वहीं कुछ पर्ववेक्षकों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में मतदान अलगाववादियों को पुनर्विचार को मजबूर कर सकता है.

गुलज़ार अहमद कहते हैं, "वो सालों से चुनाव के बहिष्कार की अपील करते आ रहे हैं. लोग हड़ताल की उनकी मांग का तो समर्थन करते हैं. लेकिन चुनाव बहिष्कार की उनकी अपील को ठुकरा देते हैं. इससे वो यह समझ सकते हैं कि लोग कश्मीर में रहने की समस्या को किस तरह से देखते हैं. जब लोकप्रिय नेता समाधान नहीं बताते हैं तो लोग अपनी पसंद बनाते हैं."

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