लौटाए गए इनाम क्या भाड़ फोड़ लेंगे?

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- Author, विष्णु खरे
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार और कवि
- प्रकाशित
अकादमी सच्चे साहित्य के विरुद्ध एक काफ़्काई, षड्यंत्रकारी, नौकरशाही दफ़्तर है. उसके चुनावों में भयानक साज़िशें होती हैं और पिछले तीस वर्षों में वह खुली आँखों से अपनों-अपनों को रेवड़ी बाँटनेवाली, स्व-पुनर्निर्वाचक, प्रगति-विरोधी संस्था बना दी गई है.
स्वयं को स्वायत्त घोषित करने वाली अकादमी, जिसके देश भर से बीसियों अलग-अलग क़ाबिलियत और विचारधाराओं के सदस्य हैं, जिनमें से कुछ केंद्रीय मंत्रालयों द्वारा नामज़द वरिष्ठ आईएएस स्तर के सरकारी अफ़सर भी होते हैं, जिसका एक-एक पैसा संस्कृति मंत्रालय से आता और नियंत्रित होता है, अब भी साहित्य को एक जीवंत, संघर्षमय रणक्षेत्र और लेखकों को प्रतिबद्ध, जुझारू, आपदाग्रस्त मानव मानने से इनकार करती है.
आज जिस पतित अवस्था में वह है उसके लिए स्वयं लेखक ज़िम्मेदार हैं जो अकादमी पुरस्कार और अन्य फ़ायदों के लिए कभी चुप्पी, कभी मिलीभगत की रणनीति अख़्तियार किए रहते हैं.
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नाम लेने से कोई लाभ नहीं, लेकिन आज जो लोग दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी की हत्याओं के विरोध में पुरस्कार और विभिन्न सदस्यताएँ लौटा रहे हैं उनमें से एक वर्षों से साहित्य अकादमी पुरस्कार को 'कुत्ते की हड्डी' कहते थे.
<bold><link type="page"><caption> शशि देशपांडे ने साहित्य अकादमी से नाता तोड़ा</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/10/151009_shashi_deshpande_resigned_sdp" platform="highweb"/></link> </bold>
पाखण्ड
वे इसी हड्डी के लिए ललचा भी रहे थे और जिसे पाने के लिए उन्होंने क्या नहीं किया. उन्होंने अकादमी की कई योजनाओं से पर्याप्त पैसे कमाए सो अलग, लेकिन अपने वापसी-पत्र में लिखते हैं कि वह वर्षों से लेखकों को लेकर पीड़ित, दुखी और भयभीत रहे हैं.

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एक पुरस्कृत सज्जन संस्कृति मंत्रालय में अकादमी के ही प्रभारी रहे. दूसरे कई वर्षों तक अकादमी के कारकुन रहे और उसके सर्वोच्च प्रशासकीय पद से रिटायर होने के बाद भी एक्सटेंशन चाहते रहे और अभी कल तक उसकी सैकड़ों गतिविधियों के स्तम्भ रहे.
उनके पाखण्ड की पराकाष्ठा यह है कि अभी वह एक ऐसे बौद्धिक प्रतिष्ठान में हैं जिसका सारा पैसा सरकारी है और जो घोषित और क़ानूनी रूप से शत-प्रतिशत एक केंद्रीय मंत्रालय की मातहत संस्था है.
एक देवीजी सिख-संहार, बाबरी-विध्वंस और मेरठ-गुजरात के मृत मुसलमानों पर चुप रहीं. स्टेंस के परिवार को जला दिया गया. दलितों पर अनंत अत्याचार हो रहे हैं. अचानक इनका मौक़ापरस्त ज़मीर जाग उठा है.
यह सारे लोग अकादमी के पतन के न सिर्फ़ गवाह हैं, बल्कि उसमें सक्रिय रूप से शामिल रहे हैं.
<bold><link type="page"><caption> दाभोलकर, पंसारे, कलबुर्गी के हत्यारे कौन?</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/09/150831_who_killed_dr_malleshappa_kalburg_rns" platform="highweb"/></link> </bold>
मीडिया के लिए सनसनीख़ेज़

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ऐसा नहीं है कि प्रतिबद्ध लेखक संघों और छिटपुट प्रगतिकामी लेखकों ने अकादमी की गिरावट की भर्त्सना या मुख़ालफ़त न की हो, लेकिन मीडिया के लिए एक पुरस्कार को लौटाया जाना ज़्यादा सनसनीख़ेज़ और प्रचार्य-प्रसार्य है, वह भी चंद दिनों के वास्ते.
विडंबना यह है कि शायद कुछ हज़ार भारतीयों को छोड़कर न कोई अकादमी को जानता है, न उसके पुरस्कृत लेखकों को.
वह इस विवाद को समझेगा ही नहीं. जब हमारा ज़मीर हज़ारों निरपराध इंसानों की हत्याओं के बाद नहीं जागता तो दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी भारत में व्याप्त सांप्रदायिक, जातीय तथा ऊँच-नीच की हिंसा के बीच क्या औक़ात रखते हैं?
जब हमारा समाज जागरूक होना ही नहीं चाहता, जब बुद्धिजीवियों ने ख़ुद से और उससे विश्वासघात किया है तो कुछ लौटाए-गए इनाम और ओहदे क्या भाड़ फोड़ लेंगे?
वापस करने के मायने

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कोई संस्था ऐसे नियम क्यों बनाएगी कि उसका दिया हुआ पुरस्कार लौटाया जा सके और वह उसे वापिस ले ले?
बल्कि हो सकता है, जो किया भी जा सकता है, कि अब वह पहले लेखक से वचन ले ले कि वह उसे लौटाएगा नहीं या उसे ताकीद कर दे कि वह वापिस नहीं लिया जाएगा.
यदि कोई उसके पदों से इस्तीफ़ा देता है तब तो उसे मंज़ूर करना ही होगा, लेकिन पुरस्कारों को वह अपनी सूची से हटा नहीं सकती, आप लाख कहते रहिए कि आपने उन्हें लौटा दिया.
वह आपका चैक अपने खाते में जमा कर नहीं सकती. तो आपने वापिस क्या किया?
यह मानना पड़ेगा कि कुछ लेखकों की इस पहल से एक दूध-जला वातावरण और पूर्वोदाहरण तो बना है लेकिन यह देशव्यापी बुद्धिजीवियों या आम लोगों का जनांदोलन शायद कभी नहीं बन सकेगा.

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राज्य तथा केंद्रीय सरकारों तथा अकादमियों से दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी की हत्याओं और उनसे जुड़े व्यापक राजनीतिक, सामाजिक और साम्प्रदायिक मसलों पर जिस तरह का शोक-प्रस्ताव लेखक और बुद्धिजीवी चाहते हों, यदि वह सर्वसम्मत भी हो तो उन्हें मिल नहीं सकता.
हद-से-हद वह, जैसा कि दफ़्तरी रिवाज है और जो सैकड़ों बार हो चुका है और होता रहेगा, अकादमियाँ खेद प्रकट कर सकती हैं और गोलमोल भर्त्सना कर सकती हैं.
<bold><link type="page"><caption> कन्नड़, पंजाबी लेखकों ने 'साहित्य सम्मान' लौटाया</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/10/151011_atamjit_singh_sahitya_academy_sdp" platform="highweb"/></link> </bold>
राजनीतिक दल साथ नहीं

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संस्कृति, कलाएँ और साहित्य इस देश में दयनीय हाशिए पर हैं. ग़ौर किया जाए कि कोई भी राजनीतिक पार्टी लेखकों के साथ नहीं है. देश के लाखों शिक्षक और वकील इस मसले पर उदासीन हैं. अख़बार इसे समुचित गंभीरता से उठा नहीं रहे. भारत में सामूहिक अंतरात्मा है ही नहीं.
असली या नक़ली सैद्धांतिक मतभेद, मोहभंग और सर्वसंशयवाद (सिनिसिज़्म) इतने व्याप्त हैं कि लेखकों में ही एकजुट होकर सड़क पर उतरने का संकल्प नहीं है.
ऐसे सार्वजनिक इस्तीफ़ों, पुरस्कार-त्यागों से कुछ को थोड़ा सच्चा-झूठा कीर्ति-लाभ हो जाएगा, बायो-डेटा में एक सही-ग़लत लाइन जुड़ जाएगी, अकादमियाँ और सरकारें मगरमच्छी अश्रु-पूरित नेत्रों से अपने बेपरवाह रोज़मर्रा को लौट जाएँगी.
"अन्याय फिर भी चुगता रहे(गा) मेरे देश की देह".
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