पुरस्कार लौटाने का उलटा असर तो नहीं पड़ेगा?

उदय प्रकाश, नयन तारा सहगल, शशि देशपांडे और अशोक वाजपेयी
    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
  • प्रकाशित

क़रीब क़रीब हर लेखक और कलाकार ये कहलाना पसंद करता है कि वो ग़ैर राजनीतिक है लेकिन रचनात्मकता शून्य में तो नहीं पैदा होती. हर रचनात्मकता में राजनीति का कुछ न कुछ पुट ज़रूर होता है और पुरस्कार को लौटा कर ये बुद्धिजीवी एक तरह का कड़ा राजनीतिक संदेश दे रहे हैं.

अमरीकी उपन्यासकार टोनी मॉरिसन ने एक बार सही ही लिखा था, "जो लोग ये कह कर कि वो यथास्थिति को पसंद करते हैं, राजनीतिक न होने की बहुत ज़्यादा कोशिश करते हैं, वो वास्तव में राजनीतिक सोच वाले लोग होते हैं."

साहित्य अकादमी

साहित्य अकादमी या पद्म पुरस्कार लौटाने वाले लोगों के समर्थन या विरोध में कई तर्क दिए जा सकते हैं लेकिन ये बात अधिकतर लोग मानेंगे कि उनके इस क़दम ने देश में बढ़ती हुई असहिष्णुता की ओर सबका ध्यान ज़रूर खींचा है.

पुरस्कार लौटाने की शुरुआत सबसे पहले गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी जब उन्होंने जालियाँवाला बाग हत्याकांड के विरुद्ध उनको दी गई नाइटहुड यानी सर की उपाधि वापस कर दी थी.

जहाँ तक पद्म पुरस्कारों की बात है पहले भी कई लोगों ने सरकार के किसी क़दम के ख़िलाफ़ या तो इसे वापस किया है या इसे लेने से इनकार किया है.

खुशवंत सिंह

मशहूर लेखक खुशवंत सिंह 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' का विरोध करने के लिए अपना पद्मभूषण लौटा चुके हैं.

नाट्यकला के क्षेत्र के बड़े नाम रतन थियम ने नगा युद्ध विराम को बढ़ाए जाने के विरोध में 2001 में अपनी पद्मश्री सरकार को लौटा दी थी.

पद्म पुरस्कारों की निष्पक्षता पर शुरू से सवाल उठते आए हैं. इस पर पहला सवाल पचास के दशक में तत्कालीन शिक्षामंत्री मौलाना आज़ाद ने उठाया था जब उन्होंने ख़ुद को भारत रत्न दिए जाने के फ़ैसले को अस्वीकार करते हुए कहा था कि पुरस्कार चुनने वाले लोगों को ख़ुद को पुरस्कार देने का अधिकार नहीं है.

ऐसे उदाहरण क़रीब-क़रीब नहीं के बराबर हैं जब किसी सरकार ने अपने राजनीतिक विरोधियों को इस सम्मान के लिए चुना हो.

इसका एक ही अपवाद है जब नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली सरकार ने विपक्षी दल के अटल बिहारी वाजपेयी को पद्मविभूषण देने का फ़ैसला किया था.

शशि थरूर

जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया जैसे लोग इन पुरस्कारों से इसलिए वंचित रह गए क्योंकि उस समय की सरकार उनके पक्ष में नहीं थी.

कांग्रेस नेता शशि थरूर का कहना है कि देश में जो कुछ हो रहा है वो निंदनीय ज़रूर है लेकिन विरोध करने का ये ढंग सरकार नहीं पुरस्कारों का निरादर करना है.

साहित्य अकादमी पुरस्कार जीतने वाले शंख्य घोष कहते हैं कि पुरस्कार लौटाने वाले लोग दूसरे तरीक़े से अपना विरोध व्यक्त कर सकते थे क्योंकि साहित्य अकादमी सरकारी संस्था नहीं है.

1977 में अपने काव्य संग्रह ‘बाबेरेर प्रार्थना’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार जीतने वाले शंख्य घोष का कहना है, "ये पुरस्कार मुझे वर्तमान सरकार ने तो नहीं दिया. आप मुझे कारण बताइए कि चालीस साल पहले दिए गए पुरस्कार को मैं इस सरकार के ग़लत काम के विरोध में क्यों लौटाऊँ?"

लेखकों के सम्मान लौटाने का फ़ैसला सरकार को कुछ सोचने के लिए मजबूर करे या न करे लेकिन इसने इन पुरस्कारों का राजनीतिकरण के ख़तरे को और बढ़ा दिया है.

लेखकों का विरोध

अब सरकार या साहित्य अकादमी जैसी स्वायत्त संस्थाएं इस तरह का पुरस्कार देने से पहले इन बातों पर भी विचार करेंगी कि इसे पाने वाले शख़्स की राजनीतिक संबद्धता क्या है?

ऐसा तो नहीं कि ये शख़्स पुरस्कार वापस कर सरकार को शर्मसार कर देगा? अगर ऐसा होता है तो उत्कृष्टता से समझौता होगा और मिडियोक्रेटी और दरबारी संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा.

इस स्थिति में पहले से ही सवालों के घेरे में आए ये पुरस्कार अपनी प्रतिष्ठा और खो देंगे. सिर्फ़ एक राजनीतिक विचारधारा के लोगों को इस तरह का सम्मान मिलना इनको और भी हास्यास्पद बना देगा.

मोदी सरकार ने कई स्वायत्त और सांस्कृतिक संस्थाओं की कमान एक ख़ास विचारधारा को लोगों को दे कर इसकी शुरुआत कर दी है.

गजेंद्र चौहान

इंडियन काउंसिल ऑफ़ हिस्टॉरिकल रिसर्च के प्रमुख के पद पर सुदर्शन राव, राष्ट्रीय बुक ट्रस्ट के प्रमुख के तौर पर पांचजन्य के पूर्व संपादक बलदेव शर्मा की नियुक्ति और पुणे फ़िल्म इंस्टीट्यूट के प्रमुख के पद पर गजेंद्र चौहान का लाया जाना इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं.

अगर राष्ट्रीय, साहित्यिक और फ़िल्म पुरस्कारों को भी राजनीति के चश्मे से देखा जाने लगा तो इनका रहा सहा महत्व भी जाता रहेगा.

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