'...समझें कश्मीर क़ानून-व्यवस्था का मसला नहीं'

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कश्मीर पर शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुए सर्वदलीय बैठक का नतीजा बहुत ही निराशाजनक है.
ऐसा मानना है कश्मीर पर वार्ताकार और भारत के पूर्व चुनाव आयुक्त और एमएम अंसारी का:
बैठक में ऐसी किसी चीज़ पर बात नहीं हुई या उससे कुछ ऐसा निकलकर नहीं आया जिससे मौजूदा हालात से निपटने में सहूलियत हो.
इस परिपेक्ष में मैं समझता हूं कि इस बैठक का नतीजा बहुत ही निराशाजनक है.
प्रधानमंत्री का मानना कि जम्मू-कश्मीर में जो कुछ हो रहा है उसके लिए पाकिस्तान ज़िम्मेदार है, सीमापार चरमपंथ ज़िम्मेदार है, ये बात बहुत हद तक सही है.
कश्मीर में बाहरी हस्तक्षेप हैं. लेकिन दुनिया में जहां पर भी विद्रोह हुए हैं वहां बाहरी ताकतें काम करती रही हैं.

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लेकिन सवाल है कि जो हमारे लोग हैं आख़िर उनको हम क्यों नहीं सकून से और शांति से रख सके जिससे कि वो किसी की बातों में न आएं.
जहां तक कश्मीर के मामले में बाहरी ताक़तों की बात हो रही है तो हमें समझना चाहिए कि ये एक राजनीतिक विवाद है.
इस विवाद का पिछले 70 सालों से समाधान नहीं निकाला गया है और ये एक प्रॉक्सी वॉर के तौर पर चलता आया है.
भारत और पाकिस्तान एक दूसरे पर हस्तक्षेप के आरोप लगाते रहे हैं. ये ब्लेम-गेम काफी अर्से से चलता रहा है.
जो असल मुद्दे हैं, मानवाधिक उल्लंघन के मुद्दे हैं, राजनीतिक समाधान के वो अब तक हल नहीं हो पाया है.
उसके लिए जो मुनासिब पहल होनी चाहिए वो नहीं हो पा रही है.

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एक तरफ तो प्रधानमंत्री कहते हैं कि कश्मीर मुद्दे के समाधान के लिए सभी पक्षों से बातचीत की जाए.
लेकिन अलगाववादियों को इसमें शामिल नहीं करने से मामले का समाधान कैसे निकलेगा क्योंकि वो एक बड़े स्टेकहोल्डर हैं.
वहां की जो सत्ताधारी पार्टी है, जो विपक्षी पार्टियां हैं उन सभी से बात करनी चाहिए.
हम जब 2010 में वार्ताकार के तौर पर कश्मीर गए थे तो हमनें किसी पक्ष को नहीं छोड़ा था.
चाहे वो नागरिक हों, सेना के लोग हों, पुलिस के लोग हों, व्यापार से जुड़े लोग, राजनीतिक पार्टियां, तमाम लोगों से बात की थी.

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कश्मीर का एक मसला ऐसा है कि वहां पर हम किसी भी तरह के भेदभावपूर्ण व्यवहार नहीं कर सकते.
(बीबीसी संवाददाता अमरेश द्विवेदी से बातचीत पर आधारित)
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