भारत और कश्मीर के बीच कौन बढ़ा रहा खाई?

    • Author, शिवम विज
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को श्रीनगर में कर्फ़्यू लगा होता है. मोबाइल सेवाएं बाधित हो जाती हैं और बम धमाकों का डर होता है.

राज्य सरकार भारत के राष्ट्रीय दिवस का जश्न मनाती हैं जबकि अलगाववादी इसे काला दिवस घोषित करते हैं. जनता अपने घरों में दुबकी रहती है.

इस बार स्वाधीनता दिवस तब आया है, जब बीते छह सप्ताह से कर्फ़्यू की स्थिति है. जुलाई में एक अहम चरमपंथी के मारे जाने के बाद कश्मीर कश्मीरियों के लिए कैदख़ाना बन गया है. करीब सत्तर लाख की आबादी को अधिकांश दिन अपने घर से निकलने की इज़ाजत नहीं है और इंटरनेट की सुविधा भी प्रतिबंधित है.

भारत और कश्मीर के बीच खाई लगातार बढ़ रही है. भारत के लिए ये कहना बेहद आसान है कि ये सब पाकिस्तान करा रहा है. वहीं कश्मीरी इस बात का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं कि पाकिस्तान उनकी मदद के लिए क्या करता है.

ऐसी मुश्किल के बीच, केवल एक चीज़, हठी भारत, विद्रोह पर उतारू कश्मीर और अवसरवादी पाकिस्तान को एकजुट कर सकता है.

लगभग मौत जैसी स्थिति को बताने वाला एक ही शब्द है, जिसे आप राष्ट्रवाद का शैतान भी कह सकते हैं.

जब कश्मीरी कर्फ़्यू को अपनी आज़ादी के संघर्ष का एक और एपिसोड बता रहे हैं, उसी वक्त भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह उत्तर प्रदेश के लखनऊ के नज़दीक काकोरी पहुंचे.

राज्य में होने वाले चुनाव को देखते हुए वे वहां भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शहीद हुए लोगों को श्रदांजलि देने पहुंचे. यह भारतीय जनता पार्टी के दो सप्ताह तक चलने वाले कार्यक्रम ‘आज़ादी 70- याद करो कुर्बानी’ का हिस्सा था.

पुराने तरीकों से कश्मीर की स्थिति के साथ न्याय नहीं हो रहा है. भारत के कश्मीर से कर्फ़्यू नहीं उठाने का कारण हिंसक विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि प्रदर्शन करने वालों की आवाज़ को दबाना है. भारत नहीं चाहता कि कश्मीरी युवा आज़ादी को लेकर नारे लगाएं और दुनिया उसे सुने.

यही वजह है कि कश्मीरियों को गलियों में आज़ादी के नारे लगाने की इज़ाजत नहीं है, उन्हें घरों में बंद रहने के कहा गया है. अगर वे इसका उल्लंघन करते हुए सेंट्रल रिजर्व पुलिस फ़ोर्स के जवानों पर पत्थर फेंकते हैं तो उन्हें आंसू गैस, पैलेट गन, बुलेट और क्राउड कंट्रोल के तमाम नए तरीकों का सामना करना पड़ता है.

इस कर्फ़्यू के दौरान इंटरनेट सेवाओं को भी बाधित किया गया है, जो ये बताता है कि समस्या केवल भीड़ नियंत्रित करने की नहीं है, बल्कि आज़ादी को भी नियंत्रित करना है.

कश्मीरियों के साथ समस्या क्या है, ये सवाल हम करते हैं. भारतीयों के साथ समस्या क्या है, ये सवाल कश्मीरियों का है. इसमें पाकिस्तान कहां से आ गया, ये भी हम हाथ मरोड़ते हुए पूछते हैं. दरअसल हम सबकी एक ही समस्या है वह है राष्ट्रवाद.

चूंकि मोदी सरकार अति राष्ट्रवादी है, इसलिए उसे ये ध्यान रखने की ज़्यादा ज़रूरत है जिसके बारे में स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख चिंतक रवींद्र नाथ टैगोर ने चेताया था, उन्होंने राष्ट्रवाद की बीमारियों के प्रति आगाह किया था.

विभिन्न यूरोपीय देशों में अपना अपना उपनिवेश बनाने की होड़ लगी थी. ब्रिटिश राष्ट्रवाद के नाम पर लंदन से अंग्रेज भारत पर शासन करने आए थे. टैगोर ने अपने एक व्याख्यान में कहा था, “राष्ट्रवाद एक गंभीर ख़तरा है. यह वही चीज़ है जो भारत की समस्याओं की मूल में सालों से रहा है.”

उन्होंने आगे कहा था, “हमारी वास्तविक समस्या केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि सामाजिक है. ये केवल भारत की बात नहीं है, बल्कि सभी देशों में ऐसा है.”

टैगोर के लिए राष्ट्रवाद एक तरह से व्यक्ति या फिर देश के लालच का सिद्धांत था, जो संगठित और प्राशसनिक रूप में था.

टैगोर के शब्दों में राष्ट्रवाद के चलते मनुष्य अपनी अंतरात्मा की आवाज़ से मुक्त हो जाता है जब वह अपनी ज़िम्मेदारी इस राष्ट्रवाद पर सौंप देता है, जो उसकी बुद्धिमता की उपज है लेकिन पूरी नैतिक शख्सियत की उपज नहीं है.

उन्होंने इसे उपनिवेशिक चलन बताते हुए लिखा था, “भारत में कभी राष्ट्रवाद का वास्तविक नज़रिया रहा ही नहीं. मेरा विश्वास है कि मेरे देशवासी उस शिक्षा के ख़िलाफ़ जो ये बताती है कि देश मानवता के आदर्शों से बड़ा है, लड़कर अपना भारत हासिल कर लेंगे.”

पहले विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने राष्ट्रवाद के ख़तरों पर ख़ूब लिखा. उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ये भी माना था कि विभिन्न लोगों को एक साथ रखना बड़ी चुनौती होगी.

उन्होंने तबके भारतीय राष्ट्रवादियों को चेताते हुए कहा था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल करने से भारत मुक्त नहीं होगा.

उन्होंने तब कहा था, “जब हमारे राष्ट्रवादी आदर्शों की बात करते हैं, वे राष्ट्रवाद के आधार को भूल जाते हैं. वे लोग जो आदर्शों को उठाने की बात करते हैं वे अपने सामाजिक चलन में सबसे ज़्यादा संकीर्ण हैं. मैं एक देश के ख़िलाफ़ नहीं हूं लेकिन सभी देशों को लेकर जो आम विचार है, उसके ख़िलाफ़ हूं."

टैगोर के ये शब्द आज भी प्रासंगिक हैं. वे सब लोग जो ख़ुद को राष्ट्रवादी मानते हैं- वैसे भारतीय जो कश्मीर को प्यार करते है, लेकिन कश्मीरियों को नहीं, वैसे कश्मीरी जो राष्ट्रवाद के नाम पर मरना चाहते हैं, वैसे पाकिस्तानी जिनका राष्ट्रवाद श्रीनगर में पाकिस्तानी झंडा फैलाए बिना पूरा नहीं होता- उन सबको टैगोर को पढ़ने की ज़रूरत है.

उस टैगोर को पढ़ने की जरूरत है जिन्होंने भारत और बांग्लादेश ही नहीं बल्कि श्रीलंका का भी राष्ट्रगीत लिखा था.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)