बमों से छलनी ग़ज़ा में कमाल करती ये औरतें !

    • Author, जूही चक्रवर्ती
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल
  • प्रकाशित

दिल दहलाने वाले रॉकेट लांचरों के हमले, बम धमाके, ढही इमारतें, खस्ताहाल सड़कें और बिजली-पानी का संकट ग़ज़ा की कुछ औरतों को अपने सपने पूरे करने से नहीं रोक पाए हैं.

हर पल मंडराता संकट भी, इसराइल और मिस्र के बीच स्थित ग़ज़ा की इन फ़लस्तीनी महिलाओं के हौसले को डिगा नहीं पाया है.

ग़ज़ा में शुरू हो रहे स्टार्टअप कारोबार में 50 फ़ीसदी की संस्थापक महिलाएँ हैं. अमरीका में तकनीकी स्टार्टअप के संस्थापकों में से औरतें 5 फ़ीसदी के कम हैं.

कैसे कर रही हैं ग़ज़ा पट्टी की महिलाएं ये कमाल?

बूम बेबीबूम की 17 वर्षीय संस्थापक

17 साल की सोफ़िया मूसलम की उम्र कारोबार करने की नहीं है. लेकिन बच्चों की चीज़ों और गर्भवती माताओं को जानकारी प्रदान करने के लिए सोफ़िया ऑनलाइन स्टोर बूम बेबी बूम शुरु करने जा रही हैं.

सोफ़िया कहती हैं, "लोग मुझे कहते थे कि तुम अभी छोटी हो, लड़की हो, ऐसे समय बर्बाद करने का कोई फ़ायदा नहीं होगा, टेक का बिज़नेस केवल लड़कों के लिए है."

सोफ़िया ने इन लोगों की सलाह नहीं मानी और उन्हें अब मिसाल के तौर पर देखा जा रहा है.

फ़लस्तीनी ब्यूरो ऑफ़ लेबर स्टेटिसटिक्स के मुताबिक ग़ज़ा की 18 लाख की आबादी में कामकाजी महिलाओं लेबर फोर्स का 20 फ़ीसदी हिस्सा हैं.

औरतों के लिए बड़ी चुनौती

फलीस्तीनी सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स की मुखिया मोना शाव कहती हैं, "हम पुरुष प्रधान समाज में रहते हैं और महिलाओं को भेदभाव का सामना करना पड़ता है."

महिलाओं के लिए हालात कितने मुश्किल भरे हैं, इसका अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि ग़ज़ा पट्टी पिछले छह साल में तीन युद्ध झेल चुका है.

हमास की सरकार ने लड़के और लड़कियों के स्कूल अलग-अलग कर दिए हैं.

यूनिवर्सिटी की छात्राओं के लिए ड्रेस कोड लागू कर दिया है और ग़ज़ा मैराथन में महिलाओं के भाग लेने पर पाबंदी लगा दी गई है.

मर्सी कोर जैसी सहायता एजेंसी और गूगल की मदद से शुरू हुई ग़ज़ा स्काई गीक्स की मुहिम में महिलाओं टेक स्टार्टअप शुरू करने के लिए आगे आ रही हैं.

ग़ज़ा की महिलाओं को कारोबार की दुनिया से जोड़ने की इस मुहिम की शुरुआत 2011 में हुई थी, 2014 के आते आते इसका असर साफ दिखने लगा है.

न्यू टून की 24 वर्षीय संस्थापक

हादिल अल सफ़ादी ऑनलाइन एनिमेशन सुविधा देने वाली वेबसाइट न्यू टून की फाउंडर है.

वो बताती हैं कि ग़ज़ा स्काई गीक्स (जीएसजी) ने बिजली, कंप्यूटर और इंटरनेट की सुविधा दी, जिसके चलते उनका काम चल निकला है.

उन्होंने बताया, "जीएसजी ने सोशल मीडिया और ग़ज़ा के बाहर दुनिया के अन्य हिस्सों से संपर्क का दायरा भी उपलब्ध कराया है."

आज न्यू टून के ग्राहक मिस्र, जॉर्डन और सऊदी अरब में भी हैं. हादिल का इरादा अब इसे मध्य पूर्व के दूसरे देशों तक फैलाने का है.

हादिल कहती हैं, "अगर आपका कोई सपना हो और उसे पूरा करने का आइडिया भी तो कोई बाधा आपको रोक नहीं सकती है."

24 वर्षीय तमिर का रेसिपी शेयरिंग एप

2014 की गर्मियों में जब उनके घर के बाहर बम गिर रहे थे, तब 24 वर्षीय तमिर जमा रेसिपी शेयर करने के एप को लॉन्च करने के लिए सिलिकॉन वैली के विशेषज्ञों से सलाह ले रही थीं.

इनकी रेसिपी शेयरिंग ऐप ज़ाकी काफी कामयाब है और इसके फ़ेसबुक ग्रुप से 60 हज़ार लोग जुड़ चुके हैं.

इन महिलाओं की कामयाबी के बारे में ग़ज़ा स्काई गीक्स के कम्यूनिकेशन कंसलटेंट सईद हसन कहते हैं, "महिलाओं को एक चीज़ का फ़ायदा तो मिलता है, उनके ग़ज़ा से बाहर निकलने पर कोई पाबंदी नहीं."

सोफ़िया मूसलम कहती हैं, "महिलाएँ काफी कुछ कर सकती हैं. हम वो सब कर सकते हैं जो पुरुष कर सकते हैं, ग़ज़ा में भी और पूरी दुनिया में भी."

<italic><bold>अंग्रेज़ी में <link type="page"><caption> मूल लेख </caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20150415-young-and-female-in-gaza" platform="highweb"/></link>यहाँ पढ़ें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल</caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.</bold></italic>

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