'पाक सेना भारत को हावी नहीं होने देगी'

इमेज स्रोत, AFP
- Author, आयशा सिद्दीका
- पदनाम, रक्षा विशेषज्ञ, हिंदी डॉट कॉम के लिए
- प्रकाशित
पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज़ मुर्शरफ़ ने कश्मीर समस्या के निपटारे के लिए 'आउट ऑफ़ बॉक्स' यानी लीक से हट कर जो पहल की थी, क्या दिल्ली और इस्लामाबाद ने उस पर दुबारा कभी सोचा?
क्या पाकिस्तान का कोई नेता संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव से हट कर कश्मीर पर अब फिर कभी कुछ सोचेगा? निकट भविष्य में तो ऐसा नहीं ही होने जा रहा है.
भारत राजनीतिक फ़ैसले लेने में काफ़ी सुस्त था और पाकिस्तानी सेना के जनरलों से मुशर्रफ़ ने जो मुहलत ली थी, वह ख़त्म हो चुकी है.
साल 2007 तक मुशर्रफ़ को सत्ता से हटाने की कोशिश शुरू हो चुकी थी और उनके ख़िलाफ़ राजनीतिक आंदोलन खड़ा हो चुका था.
नापसंद कश्मीर पहल

इमेज स्रोत, THINKSTOCK
मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ चले वकीलों के आंदोलन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण लोग कितने सच्चे थे, यह आज तक नहीं मालूम पड़ा है.
पर इतना तो तय है कि मणिशंकर अय्यर के दावों के उलट, मुशर्रफ़ की कश्मीर पहल पाकिस्तानी सेना मुख्यालय में बहुत लोकप्रिय नहीं थी.
वरिष्ठ पाकिस्तानी राजनयिक रियाज़ खोखर ने रावलपिंडी में कमान बदलने के तुरत बाद वरिष्ठ जनरलों से बात की थी.
इन जनरलों ने खोखर से कहा था कि उन्हें कश्मीर पर की गई पहल पसंद नहीं थी. ज़ाहिर है, उन्होंने इस फ़ार्मूले पर गंभीरता से विचार किए बग़ैर ही अपने प्रमुख का समर्थन कर दिया था.
मुहाजिर मुर्शरफ़

इमेज स्रोत, Reuters
पाकिस्तानी सेना के मौजूदा प्रमुख राहील शरीफ़ ने बाग़डोर संभाली थी, उसके तुरंत बाद मेरे एक दोस्त ने मज़ाक किया था कि रावलपिंडी एक बार फिर 'लीक से हट कर' नई पहल कर सकता है.
राहील शरीफ़ का सेना पर पूरा नियंत्रण है और देश में वे काफ़ी लोकप्रिय भी हैं. मेरा दोस्त शायद हल्के फुल्के लहजे में यह बता रहा था कि किस तरह मुशर्रफ़ ने करगिल अभियान के बाद कश्मीर पर पहल की थी.
मुशर्रफ़ का जन्म दिल्ली में हुआ था और वे मुहाजिर समुदाय के हैं, शायद इस वजह से भी उनका दिल पसीजा होगा और मन बदला होगा.
समझा जाता है कि मुहाजिर उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली और दूसरी जगहों का प्रतिनिधित्व करते हैं.
पर ज़्यादातर लोगों के मुताबिक़, बड़ी वजह यह थी कि मुशर्रफ़ इतिहास में ऐसे आदमी के रूप में याद किया जाना चाहते थे जिसने भारत पाकिस्तान दुश्मनी ख़त्म कर दी.
पाकिस्तान को ख़तरा ..?

इमेज स्रोत, ROBIN SINGH
मुशर्रफ़ के लिए यह बिल्कुल उल्टी दिशा में काम करने जैसा था. जब 1990 के दशक में वे मिलिट्री ऑपरेशन्स के महानिदेशक थे, तब भी उन्होंने ऐसा ही किया था.
उन्होंने एक इंटरव्यू में मुझसे कहा था, "यदि कश्मीर मुद्दे का निपटारा हो गया तो भी भारत के साथ दूसरे मुद्दे तो रहेंगे ही."
इस बयान से पाकिस्तानी सेना में भारत के प्रति अविश्वास की सामान्य धारणा का पता चलता है.
मुशर्रफ़ के उत्तराधिकारी जनरल अशफ़ाक क़ियानी उनकी तुष्टिकरण की नीति से दूर हो गए. हालांकि उनके बारे में लोग यह कहते थे कि वे भारत के साथ व्यापार करने पर राज़ी थे.
खैर, क़ियानी ने कुछ नए विचार दिए. उन्होंने बार बार यह ज़रूर कहा कि पाकिस्तान को ख़तरा बाहर से नहीं बल्कि अपने अंदर से ही है.
भारत पर पारंपरिक फॉर्मूला

इमेज स्रोत, Vinod naib
लेकिन समझा जाता है कि जनरल रहील शरीफ़ ने भारत से ख़तरे पर काफ़ी दकियानूसी फॉर्मूला अपना रखा है. यह सेना के मक़सद की एकरूपता बनाए रखने के लिए ज़रूरी है. ऐसा लगता है कि पाकिस्तानी सेना तालिबान और अदंरूनी ख़तरों जैसे मुद्दों पर बंटी हुई है.
एक छोटी वजह यह भी हो सकती है कि 1965 की लड़ाई में उनका एक भाई मेजर शब्बीर मारा गया था.
पर सेना को सामाजिक और राजनीतिक रूप से नए तरीक़े से एकबद्ध करने के लिए भारत को लेकर पारंपरिक फॉर्मूले पर चलना महत्वपूर्ण है. साल 2007 से ही सेना की साख गिरी है.
हालांकि कियानी ने सेना की प्रतिष्ठा एक बार फिर अर्जित की, लगता है कि जनरल शरीफ़ ने इससे ज़्यादा हासिल कर लिया है.
'हाइब्रिड मिलिटरी रूल'

इमेज स्रोत, AFP
मौजूदा प्रमुख ने सेना के लिए एक ऐसा माहौल तैयार किया है, जिसमें सारे अहम फ़ैसले उनके और उनकी सेना के होते हैं, पर सारा दोष कमज़ोर सरकार के सिर मढ़ा जाता है.
असल में यह 'हाइब्रिड मिलिटरी रूल' है.
यह सेना के लिए काफ़ी सुविधाजनक स्थिति है. उसकी साख बुलंदियों पर है और जनता की राय अपने हिसाब से तैयार करने की उसकी क्षमता बढ़ी हुई है.
इस क्षमता का इस्तेमाल वो सिर्फ़ जनता की राय अपने पक्ष में करने के लिए नहीं, बल्कि राजनेताओं और सिविल सोसाइटी के महत्वपूर्ण हिस्से के ख़िलाफ़ माहौल तैयार करने में कर सकती है.
अयूब ख़ान से तुलना

इमेज स्रोत, L B Memorial
जनरल शरीफ़ की लोकप्रियता की तुलना जनरल अयूब ख़ान की लोकप्रियता से की जा सकती है.
जनरल अयूब 1960 की दशक में सेना प्रमुख थे और उन्हें राष्ट्र निर्माता के रूप में देखा जाता था.
फ़िलहाल हालत यह है कि यदि कोई सेना और उसके प्रमुख की आलोचना करता है तो वह ख़ुद के लिए ख़तरा मोल लेगा.
एक ख़ास किस्म के चरमपंथियों का सफ़ाया कर और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा कर सेना ने सैन्य और रणनीतिक मामलों में अपने लिए काफ़ी जगह बना ली है.
फौज है मज़बूत

इमेज स्रोत, AFP
किसी भी सूरत में सेना पहले से बेहतर और निर्णायक स्थिति में है.
इसने अपने को एक मज़बूत ताक़त के रूप में स्थापित कर लिया है, जिस पर चमक दमक और दक्षिणपंथियों के प्रभाव वाला भारत हावी नहीं हो सकता है.
पाकिस्तान निश्चित रूप से किसी तरह के दवाब में नहीं है और न ही मुशर्रफ़ की पहल के साथ वो सहज महसूस करता है.
फ़िलहाल तो कश्मीर समस्या पर कोई समाधान और भारत-पाकिस्तान शांति प्रक्रिया एक और गंवाया हुआ मौक़ा ही लगता है.
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> आप यहां</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> क्लिक कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>


























