दफ़्तर आना-जाना ऐसे बनाएं कम तनावपूर्ण

दफ़्तर आने-जाने

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    • Author, मार्क जोहानसन
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल
  • प्रकाशित

हम में से बहुत से लोग दफ़्तर जाने के लिए लंबा सफ़र तय करते हैं. दफ़्तर आने-जाने में कई लोग घंटों सफ़र में गुज़ारते हैं.

अक्सर ये सफ़र थकाऊ और उबाऊ होता है. वक़्त की बर्बादी लगता है. दुनिया में बहुत से लोग दफ़्तर आने-जाने के दौरान ये तनाव झेलते हैं.

इस बारे में इयान गेटली ने एक क़िताब लिखी है. इसका नाम है, 'रश ऑवर: हाऊ 500 मिलियन कम्यूटर्स सर्वाइव द डेली जर्नी टू वर्क.'

गेटली कहते हैं कि दफ़्तर जाने के लिए लंबी दूरी तय करना तनाव भरा है और तनाव के बहुत सारे साइड इफेक्ट होते हैं.

वो कहते हैं कि इस लंबे सफ़र के दौरान बहुत से लोग ख़ुद को लाचार महसूस करते हैं.

क्योंकि अक्सर आप ट्रेन में या मेट्रो में या सड़क पर जाम में फंस जाते हैं और आप इनसे बचने के लिए कुछ कर भी नहीं सकते.

दफ़्तर के लिए लंबा सफ़र तय करने के बहुत सारे नुक़सान हैं. अमरीका की जेसिका पैच को ही लीजिए.

उन्हें सैन फ्रैंसिस्को शहर में मोटी तनख़्वाह वाली नौकरी मिली. इस नौकरी में नई चुनौती थी. ज़्यादा पैसे मिलने थे.

जेसिका, अपनी प्रेगनेंसी के लिए इलाज करा रही थीं, सो उन्हें लगा कि चलो इलाज के लिए कुछ ज़्यादा पैसे मिल जाएंगे.

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दिक़्क़त बस एक थी. उनके घर से दफ़्तर की दूरी क़रीब 55 मील या 88 किलोमीटर थी.

रोज़ दफ़्तर आने-जाने में जेसिका को चार घंटे लगते थे. इस दौरान कभी वो गाने सुनकर, तो कभी रेडियो पर ओप्रा विन्फ्रे का थेरेपी शो सुनकर वक़्त गुज़ारती थीं.

मगर सफ़र का तनाव दिनो़ं-दिन बढ़ता गया. ख़ासतौर से ऑफिस में थकान भरा दिन गुज़ारने के बाद घर वापसी का सफ़र बेहद तकलीफ़देह होता था.

कुछ ही महीनों में जेसिका को कई और बीमारियां हो गईं. तनाव की वजह से पेट गड़बड़ रहने लगा.

घंटों कार में बैठे रहने से कमर में दर्द की भयानक परेशानी हो गई और प्रेगनेंसी की बात तो भूल ही जाओ.

नौ महीने तक ये तनाव और तकलीफ़ झेलने के बाद आख़िर जेसिका ने नौकरी छोड़ दी.

वो घर से काम करती हैं. पैसे भले ही कम मिलते हैं, मगर सुकून है. अगले कुछ महीनों में जेसिका अपने पहले बच्चे को जन्म देंगी.

तो क्या काम करने के लिए लंबा सफ़र करना हमारी सेहत पर इतना बुरा असर डालता है? इस बारे में तमाम देशों में रिसर्च हुआ है.

कमोबेश सभी का यही नतीजा रहा है कि दफ़्तर जाने के लिए लंबी दूरी तय करने से लोगों को थकान, नींद न आने की परेशानी होती है.

वो सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ जाते हैं. उन्हें जज़्बाती दिक़्क़तें झेलनी पड़ती हैं.

इस तनाव का असर उनकी निजी ज़िंदगी, उनके परिवार और बच्चों पर भी पड़ता है.

अमरीका में हुए एक सर्वे के मुताबिक़ अगर कोई हफ़्ते में पंद्रह घंटे दफ़्तर आने जाने में ख़र्च करता है, तो वो रोज़ाना आधे घंटे की नींद का नुक़सान उठाता है.

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हालांकि कुछ ताज़ा रिसर्च ये भी कह रहे हैं कि इस लंबे सफ़र का नुक़सान कम भी किया जा सकता है, अगर हम कुछ बातों पर अमल करें.

घर और दफ़्तर के बीच की दूरी, हमें मौक़ा देती है कि घर और दफ़्तर की चुनौतियों को अलग करके देखें.

जानकार कहते हैं कि दफ़्तर आने-जाने के वक़्त को बिताने के कई ऐसे तरीक़े हैं जो सफ़र का तनाव कम कर सकते हैं.

सफ़र के दौरान प्लानिंग कीजिए. लंदन में अभी एक बड़ी मीडिया कंपनी के 225 कर्मचारियों के बीच सर्वे हुआ.

पता चला कि वो घर से दफ़्तर के लिए जितनी ज़्यादा दूरी तय करते थे, उतने ही वो नाख़ुश और अपने काम से असंतुष्ट थे.

मगर कुछ लोग ऐसे भी थे, जिनका ख़ुद पर क़ाबू था. ये लोग उतना तनाव नहीं झेलते थे.

इयान गेटली के साथ रश ऑवर क़िताब लिखने वाले जॉन जाकिमोविच कहते हैं कि अगर ख़ुद पर क़ाबू हो तो नेगेटिव बातों के बजाय, लोग आगे की सोचते हैं.

इससे सफ़र का तनाव कम हो जाता है. सफ़र के दौरान आप दफ़्तर के काम की फॉरवर्ड प्लानिंग कर सकते हैं.

ये सोच सकते हैं कि दिन में आपको क्या करना है. कौन से टारगेट पूरे करने हैं. यही ख़याल आप अपने निजी काम के बारे में भी अपने दिमाग़ में ला सकते हैं.

पूरे हफ्ते की प्लानिंग करके, उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांटने की बातें सोच सकते हैं. अपने करियर को लेकर आगे की प्लानिंग भी आप कर सकते हैं.

रोज़ाना कुछ मिनटों तक ये दिमाग़ी वर्ज़िश करके, आप सफ़र के तनाव से बच सकते हैं.

इससे दफ़्तर जाते वक़्त आप घरेलू ज़िम्मेदारी का ख़याल दिल से निकालकर, पेशेवर चुनौतियों के लिए तैयार होंगे.

घर वापसी के वक़्त दफ़्तर का तनाव छोड़कर, निजी ज़िंदगी के मसलों पर ध्यान लगा सकेंगे.

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जो लोग अपनी गाड़ी से दफ़्तर नहीं जाते, वो सफ़र के दौरान क़िताबें पढ़कर वक़्त गुज़ारते हैं.

कई लोग ई-मेल चेक करके उसका जवाब देने में वक़्त काट लेते हैं. वहीं कुछ लोग सोशल मीडिया पर वक़्त गुज़ारते हैं.

कुछ लोग सफ़र के दौरान दूसरों से न बातें करते हैं, न घुलते-मिलते हैं. ये लंबे सफ़र की सबसे ख़राब बात है.

जो लोग अपनी गाड़ी से दफ़्तर जाते हैं, उन्हें पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सफ़र करने वालों के मुक़ाबले कम वक़्त लगता है.

वहीं पब्लिक ट्रांसपोर्ट से आने-जाने वालों को सफ़र में ज़्यादा वक़्त गुज़ारने के साथ अनजान लोगों की भीड़ के साथ वक़्त बिताना पड़ता है.

आमतौर पर इंसान जब अनजान लोगों के बीच रहता है तो वो एक हाथ की दूरी बनाए रखता है.

लेकिन मेट्रो में, बस में या ट्रेन में सफ़र के दौरान ऐसा कर पाना मुमकिन नहीं होता.

इयान गेटली कहते हैं कि अक्सर पब्लिक ट्रांसपोर्ट में लोग अमानवीय हालात में सफ़र करते हैं.

टोक्यो, बीजिंग, दिल्ली-मुंबई या मॉस्को जैसे शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट में इतनी भीड़ होती है कि आप अनजान लोगों से टकराते चलते हैं.

इससे आपकी निजता में दखल होता है. ऐसे हालात में ज़्यादातर लोग साथी मुसाफ़िर को एक फ़र्नीचर से ज़्यादा कुछ नहीं समझते.

जिससे बिना बातें किए भी काम चल जाना है. इतने क़रीब होने पर भी लोग एक दूसरे से हाय-हैलो भी नहीं करते.

लेकिन, अगर आप साथी मुसाफ़िर से बातें करना शुरू करेंगे तो आपको सफ़र का तनाव कम करने का अच्छा ज़रिया मिल जाएगा.

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शिकागो यूनिवर्सिटी के निकोलस एप्ले कहते हैं कि सफ़र के दौरान किसी से बात न करना, तनाव की सबसे बड़ी वजह है.

जो हम अक्सर मेट्रो में, लोकल ट्रेन में या फिर बसों में झेलते हैं जब आप भीड़ के बीच अकेले महसूस करते हैं.

हर इंसान दूसरे के बारे में यही सोचता है कि वो बात नहीं करना चाहता और इस तरह कोई भी एक-दूसरे से बात करने की कोशिश नहीं करता.

निकोलस एप्ले कहते हैं कि अगर आप लंबे सफ़र के दौरान अनजान लोगों से बातें करेंगे तो आपका तनाव छू मंतर हो जाएगा.

एप्ले के मुताबिक़, इंसान सामाजिक प्राणी है. वो लोगों से जुड़ना चाहता है.

लेकिन हम ये नहीं जानते कि अनजान लोग हमसे बात करने को कितने बेताब रहते हैं.

अभी शिकागो में हुए सर्वे में पता चला कि सफ़र के दौरान लोगों को लगता है कि केवल 40 फ़ीसद अनजान मुसाफ़िर उनसे बात करेंगे.

मगर सच तो ये है कि ये आंकड़ा सौ फ़ीसद है. यानी हर कोई अनजान साथी मुसाफ़िर से बात करने को राज़ी था.

निकोलस एप्ले सलाह देते हैं कि वक़्त पूछकर, किसी की तारीफ़ करके, या कोई क़िताब पढ़ रहा हो तो उस बारे में सवाल करके, बातचीत शुरू की जा सकती है.

फिर आपका भी सफ़र आसान होगा और उसका भी जिससे आपने बातें कीं. यक़ीन जानिए आप बेहतर महसूस करेंगे.

तो, अनजान मुसाफ़िरों से बात करके देखिए. क्योंकि, बात करने से ही तो बात बनती है.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href=" http://www.bbc.com/capital/story/20160718-this-mindset-will-improve-even-the-worst-commute-to-work" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल </caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link>पर उपलब्ध है.)

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