हम बेईमानी से बाज़ क्यों नहीं आते?

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पूरी दुनिया में छल-कपट, बेईमानी, भ्रष्टाचार के मुद्दे छाए हुए हैं. भारत में तमाम तरह के घोटाले सामने आ चुके हैं. खेलों में पहलवान नरसिंह यादव पर जीत के लिए प्रतिबंधित दवाएं लेने का इल्ज़ाम भी लगा.

वहीं ओलंपिक खेलों में रूस की पूरी की पूरी टीम पर पाबंदी लगा दी गई. उनकी सरकार ने ही खिलाड़ियों को प्रतिबंधित दवाएं देकर छल से जीत हासिल करने के लिए तैयार किया था.

इसी तरह ओलंपिक में अमरीकी तैराक लिली किंग ने आरोप लगाया कि रूस की यूलिया एफिमोवा ने बेईमानी की है. फिर ऑस्ट्रेलिया के तैराक मार्क हॉर्टन ने चीनी खिलाड़ी सन यांग पर प्रतिबंधित दवाएं लेने का इल्ज़ाम मढ़ा.

छल-कपट और बेईमानी सिर्फ़ खेलों की दुनिया तक सीमित नहीं. तमाम सरकारी दफ़्तरों, प्राइवेट कंपनियों में भी बेईमानी के तमाम क़िस्से सामने आते रहे हैं. निजी ज़िंदगी में भी लोग अक्सर छल-कपट, धोखेबाजी करते हैं.

कभी सोचा है कि आख़िर क्या वजह है इसकी?

सबको मालूम है कि बेईमानी करना ग़लत है. पकड़े जाने पर बदनामी होती है. फिर भी लोग बेईमानी से बाज़ नहीं आते. क्या इसके पीछे सिर्फ़ लालच ही वजह होती है? या फिर बेईमानी करने के पीछे कई कारण होते हैं?

मनोवैज्ञानिकों ने इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की है. पाया ये गया कि जीतने की ललक में लोग अक्सर बेईमानी करते हैं. इसी तरह जब कई लोग मिलकर किसी मुक़ाबले में शामिल होते हैं, तो उनके एकजुट होकर छल-कपट करने की आशंका बढ़ जाती है.

इज़राइल के मनोवैज्ञानिक एमोस शर ने बेईमानी करने की वजह तलाशने की कोशिश की है. उन्होंने एक तजुर्बा किया. कुछ लोगों को एक साथ बैठाकर एक खेल खिलाया. जिसमें जीत में ज़्यादा रक़म मिलने की उम्मीद थी. ये एक टीम का खेल था.

एमोस ने पाया कि मौक़ा मिलने पर जीतने वाली टीम ने हर बार बेईमानी करने की कोशिश की. एमोस की टीम ने देखा कि जिस टीम के बीच भाईचारा ज़्यादा था, उसके कपट करने की आशंका ज़्यादा थी.

इससे साफ़ है कि अक्सर लोग उस वक़्त बेईमानी करने को राज़ी हो जाते हैं, जब उनके साथी इसके लिए उकसाते हैं. आपसी सहयोग से अक्सर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होता है. ब्रिटेन की नॉटिंघम यूनिवर्सिटी ने भी अपने तजुर्बे में ये बात पायी है.

क्योंकि इस तरह से लोग एक-दूसरे के गुनाह के साझीदार और एक दूसरे की बेईमानी के राज़दार हो जाते हैं. दिलचस्प बात ये है कि इस बेईमानी से हासिल हुए फ़ायदे का लोग आपस में पूरी ईमानदारी से बंटवारा करते हैं.

मतलब साफ़ है कि जब लोगों को ये दिखता है कि वो आपसी सहयोग से कोई बड़ा फ़ायदा ले सकते हैं, तो इसके लिए वो गठजोड़ कर लेते हैं. बड़े घोटालों के पीछे शायद यही वजह है.

अब बेईमानी के तरीके भी बदल रहे हैं. कारोबार और राजनीति की दुनिया में लोग अलग तरीक़े से बेईमानी कर रहे हैं.

आज तकनीक की मदद से कई तरह के छल-कपट को अंजाम दिया जा रहा है. अब सिर्फ़ इम्तिहान में नक़ल नहीं हो रही है. कॉपीराइट की दुनिया में भी इसका ख़ूब चलन हो गया है. मीडिया में भी लोग जमकर नक़ल कर रहे हैं.

फ़िल्मों में, यूनिवर्सिटी में, बड़े रिसर्च संस्थानों में और ख़बरों की दुनिया में भ्रष्टाचार ने बड़े पैमाने पर जड़ें जमा ली हैं.

जानकार मानते हैं कि वैश्विकरण के कारण रहन-सहन का स्तर ऊंचा हो गया है. इससे ख़र्च भी बढ़े हैं. लोग बेहतर ज़िंदगी गुज़ारने के लिए बेईमानी का सहारा लेने से गुरेज़ नहीं कर रहे हैं.

इसी तरह पढ़ाई में भी छात्र आगे बढ़ने के लिए बेईमानी कर रहे हैं. तो खेलों की दुनिया में कामयाबी के लिए खिलाड़ी यही काम कर रहे हैं.

राहत की बात ये है कि जितने नए तरीक़े बेईमानी के ईजाद हो रहे हैं, ऐसी चोरी को पकड़ने के लिए भई उतने ही नए तरीक़े आज़माए जा रहे हैं.

अच्छी ख़बर ये है कि बेईमानी करने वाले बहुत से लोग बाद में पछताते हैं. वो सुधरने के लिए भी तैयार होते हैं. पकड़े जाने के बाद वो ईमानदारी से आगे बढ़ना चाहते हैं.

अगर दोस्त बेईमान होंगे, तो आपके भी कपटी होने की पूरी आशंका है.

तो अगर आप ईमानदारी से ज़िंदगी बसर करना चाहते हैं, तो आस-पास के बेईमान लोगों पर नज़र रखिए. उनकी हरकतें, उनकी बदनामी, आपको बेईमानी करने से रोके रखेंगी.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20160818-we-all-know-cheating-is-bad-so-why-do-we-do-it" platform="highweb"/></link> करें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल</caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

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