बस थोड़ा डर और थोड़ी पागलपंती चाहिए!

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- Author, एरिक बार्टन
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
- प्रकाशित
लोग कहते हैं कि डर के आगे जीत है. मगर हम आपसे कहते हैं कि डर के साथ ही जीत है. चौंकिए नहीं! दिल में डर का होना उतनी बुरी बात नहीं जितना हम सुनते आए हैं. बल्कि डर, हमारी कामयाबी की राह का साथी बन सकता है.
आप पूछेंगे कि कैसे? तो, चलिए हम बताते हैं.
हमने बड़ों को अक्सर कहते सुना है कि कोई भी काम करो डंके की चोट पर करो. बिना किसी ख़ौफ़ या डर के. लेकिन अगर हम आपसे कहें कि आपके दिल में थोड़ा सा डर रहे, तो भी आप दुनिया से टक्कर लेने में पीछे नहीं रहेंगे, तो क्या आप यक़ीन करेंगे.
यक़ीनन आपको ये बात अटपटी लग सकती है. लेकिन ये बात बिल्कुल सही है. अपने विरोधियों से थोड़ा डरकर रहना और अपने काम के लिए पागलपंती पालना दोनों आगे बढ़ने के लिए फ़ायदेमंद साबित हो सकता है.
कैथरीन अलरिच दुनिया की जानी मानी स्टॉक इमेज कंपनी में काम करती हैं. अपने काम से और तरक़्क़ी से वे खुश भी हैं.
लेकिन उन पर अपने काम को लेकर एक डर और पागलपन सवार रहता है.
उन्हें इस बात का डर रहता है कि कहीं कस्टमर बेहतर प्रोडक्ट की तलाश में किसी और दुकान पर ना चला जाए. ऐसा हुआ तो एक कस्टमर उनकी कंपनी के लिए कम हो जाएगा.
हो सकता है कैथरीन का ये पागलपन आपको अजीब लगे लेकिन मार्केट में मुक़ाबले में बने रहने के लिए ये ज़रूरी है.
अगर आप कारोबार में टॉप पर बने रहना चाहते हैं तो आपको अपने विरोधियों की हर हरकत पर नज़र रखनी ही होगी. अगर आप अपने डर को सही दिशा में तराशते हैं, तो ये डर आगे बढ़ने में आपकी मदद करता है.
दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शेयर बाज़ार नैस्डेक के उपाध्यक्ष ब्रूस ऑस्ट कहते हैं कि वो जब भी सीनियर मैनेजमेंट के लोगो के साथ मीटिंग में जाते हैं, तो दिमाग में एक ही बात रखते हैं कि वहां उनसे क्या-क्या सवाल पूछे जा सकते हैं. साथ ही विरोधी कंपनियां उनकी हर मीटिंग के बारे में क्या क्या पता लगा सकती हैं.

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अपने विरोधियों को लेकर डर, आशंका और घबराहट आपको नए आइडिया के साथ काम करने में मदद करता है.
ऑस्ट कहते हैं कि नैस्डेक अपने कर्मचारियों को नए आइडिया के लिए हौसलाई अफ़ज़ाई करती है. उन्हें गिफ्ट दिये जाते हैं, और बदले में ऐसे आइडिया मांगे जाते हैं, जिन पर अमल करके मार्केट में अपनी अलग पहचान बनाकर टॉप पर रहा जा सके.
इसमें एक बात का ख्याल रखा जाता है कि जो भी आइडिया दिया जाएगा वो हवा-हवाई न हो, बल्कि उस आइडिया को अमल में कैसे लाया जाएगा इसका पूरा ख़ाका तैयार करके देना होता है.
कंपनी के सीनियर कर्मचारी उस पर ग़ौर करते हैं. दूसरे कर्मचारियों की राय भी ली जाती है. फिर वो आइडिया मंज़ूर होता है. उसके लिए फंड दिया जाता है.
ऑस्ट कहते हैं नैस्डेक का प्राइवेट मार्केट फंड का बिज़नेस ऐसे ही आइडिया का नतीजा है. ऐसा नहीं है कि इसके लिए कोई बहुत नया तरीक़ा अपनाया गया था. लेकिन ये इत्मीनान दिलाने के लिए काफ़ी था कि आप मार्केट के साथ मुक़ाबले में बने हुए हैं.
ऑस्ट कहते हैं "ये ज़रूरी नहीं है कि सभी आइडिया पसंद ही किए जाएं. बहुत मर्तबा नाकामी का सामना भी होता है. लेकिन ये नाकामी भी नई सोच को जन्म देने में मददगार होती है".
ब्रिटिश मैनेजमेंट कंसलटेंट क्रिस एडमंड का कहना है कि अगर एक बार आपने अपने डर और पागलपन को सही दिशा दे दी, तो फिर, कंपनी के दूसरे कर्मचारियों को भी उसके लिए तैयार रहना होगा.
क्रिस कहते है कि अक्सर छोटी कंपनियां ही मार्केट में नए आइडिया और प्रोडक्ट के साथ आती हैं और बड़ी कंपनियों को मुक़ाबला देती हैं. इसलिए ज़रूरी है कि सिर्फ बड़ी कंपनियों को ही अपनी विरोधी नहीं समझा जाए, बल्कि हर छोटी कंपनी पर भी नज़र हो.
एडमंड कहते हैं कि अगर आप सीनियर पोज़िशन पर हैं तो आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप अपनी टीम को भी मज़बूत बनाएं.
फिर अगर आपके ऑफिस में लालफीताशाही का माहौल है तो फिर आपको जोखिम उठाने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए. वैसे मुक़ाबले में बने रहने के लिए ज़रूरी है कि कंपनी में सीनियर पोज़िशन पर उन्हीं लोगों को रखा जाना चाहिए जो तुरंत फ़ैसला लेने की ताक़त रखते हों.
नए विचारों का हमेशा स्वागत किया जाना चाहिए. आगे बढ़ने के लिए डर को, पागलपन को पालना ज़रूरी है. क्योंकि डर के साथ ही जीत है!
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