बेहतर इंसान बनाना है तो हंसी-मज़ाक़ कीजिए

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- Author, मैरी ओ हारा
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
- प्रकाशित
हंसी-मज़ाक़ सबको अच्छा लगता है. थोड़ी ठिठोली, थोड़ा व्यंग, कुछ चुटकुले हमारी ज़िंदगी में रंग भर देते हैं. हंसने-हंसाने वाले लोग सबको पसंद आते हैं. मगर, आप ये जानकर हैरान होंगे कि हंसी-मज़ाक़ से हम बेहतर इंसान भी बनते हैं.
कॉमेडी या हंसी मज़ाक़ सिर्फ़ कुछ अच्छा वक़्त गुज़ारने के लिए नहीं होता. वो हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है. चाहे आप दूसरे का मज़ाक़ उड़ा रहे हों, या फिर अपने पर ही कोई व्यंग कर रहे हों. दोस्तों की महफिल में छेड़-छाड़ चल रही हो या किसी गंभीर बहस वाली बैठक में आप खुसर-फुसर में छेड़खानी कर रहे हों, हास्य हर जगह मौजूद होता है.
तो क्या हम जिस तरह सोचते हैं हंसी मज़ाक़ उसको बदलने की ताक़त रखता है?
बरसों से इंसान इस सवाल का जवाब तलाश रहा है. ग्रीस के मशहूर दार्शनिक अरस्तू और प्लेटो ने कॉमेडी का मतलब समझने की कोशिश की. इसी तरह ब्रिटिश वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन गुदगुदाने पर चिंपैंजी के बच्चों के हंसने का सबब जानना चाहते थे. मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रॉयड किसी चुटकुले पर हंसने का मनोविज्ञान समझना चाहते थे.

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इस बारे में सबसे लंबे वक़्त तक चलने वाला सिद्धांत सोलहवीं सदी के ब्रिटिश दार्शनिक थॉमस हॉब्स ने दिया था. उन्होंने कहा था कि हास्य-व्यंग असल में कमज़ोर का मज़ाक़ उड़ाना और अपनी श्रेष्ठता दिखाना होता है. हालांकि बहुत से लोग आज हॉब्स की थ्योरी से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते.
हंसी-मज़ाक़ पर रिसर्च करने वाले न्यूरोसाइंटिस्ट स्कॉट वीम्स कहते हैं कि हंसी-मज़ाक़ ऐसा ज़रिया है जिससे हम इंसानों को हर बार दूसरे को छड़ी से पीटने की ज़रूरत नहीं पड़ती. हम मज़ाक़ उड़ाकर उसे सता लेते हैं.
वीम्स ने इस बारे में काफ़ी तजुर्बे किये हैं. वो बताते हैं कि हमारे दिमाग़ का जो हिस्सा हंसी-मज़ाक़ को समझता है, वो बहुत पेचीदा और घुमावदार मसलों को समझने का भी काम करता है. यानी मज़ाक़ करना और मज़ाक़ समझना कोई हंसी-खेल नहीं! हंसी-मज़ाक़ के ज़रिए हम मुश्किल बातों या ख़यालों के जाल से निकलने की कोशिश करते हैं.

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अमरीकी मनोवैज्ञानिक एवनर ज़िव ने कॉमेडी पर क़िताब लिखी है, 'पर्सनैलिटी एंड सेंस ऑफ ह्यूमर'. वो कहते हैं कि कॉमेडी और हास्य लेखन के ज़रिए मज़ाक़-मज़ाक में समाज में सुधार की कोशिश की जाती है. दोनों के ज़रिए हमें ये समझ में आता है कि समाज में हास्य की कितनी अहम जगह है.
ईरानी मूल की अमरीकी कॉमेडियन नेगिन फरसाद एवनर की थ्योरी की तस्दीक़ करती हैं. उन्होंने अपनी क़िताब, 'हाऊ टू मेक पीपुल लॉफ' में लिखा है कि समाज के बुरे चलन का मज़ाक़ बनाकर, उस पर व्यंग से कड़ी चोट करके बदलाव का रास्ता निकाला जा सकता है.
ब्रिटेन में बीबीसी पर रेडियो शो करने वाली जोसी लॉन्ग यही करती हैं. वो राजनैतिक, सामाजिक मुद्दे उठाकर व्यंग करती हैं. बुरी बातों पर चोट करती हैं. लोगों के ज़हन में बदलाव की सोच जगाती हैं. जोसी कहती हैं कि व्यंग का मतलब, पीड़ित को राहत देना और सताने वालों पर चोट करना है.

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अमरीका में भी राजनैतिक मुद्दों पर मज़ाक़ का चलन तेज़ी से बढ़ा है. आज अमरीका में मनोरंजन के कारोबार में कॉमेडी का अच्छा ख़ासा हिस्सा हो गया है. इसमें से एक बड़ा शेयर राजनैतिक मुद्दों पर हास्य-व्यंग का भी है. नेताओं के सताए हुए लोग उनका मज़ाक़ बनते देखकर राहत महसूस करते हैं.
लोगों को लगता है कि कोई उनके दिल की बात उठा रहा है. इसलिए आज के दौर में कॉमेडी की जगह समाज में और बढ़ती जा रही है.
मशहूर ब्रिटिश कॉमेडियन स्टीफन के एमोस लोगों में बेहद लोकप्रिय हैं. उनके तमाम शो हाउसफुल होते हैं. वो कहते हैं कि कॉमेडी के ज़रिए समाज के विवादित मुद्दों को हल किया जा सकता है. जैसे कि ब्रिटिश समाज में दर्जे का भेदभाव या फिर नस्लवाद पर कॉमेडियन गहरी चोट करते हैं. इससे लोगों की सोच पर भी असर पड़ता है.
स्टीफन ने अपने स्टैंड अप कॉमेडी शोज़ के ज़रिए समलैंगिकता को लेकर कई लोगों की राय बदली है.

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यही तजुर्बा एक और ब्रिटिश कॉमेडियन एल्फी मूर का है. एल्फी पहले पुलिस में थे. जब वो सिपाही थे तो उनकी बातों को कोई भी गंभीरता से नहीं लेता था.
उनके सीनियर अफ़सर उनकी राय नहीं मांगते थे. मूर के राय देने पर भी वो नहीं सुनते थे. लेकिन जब से एल्फी ने पुलिस की नौकरी छोड़कर स्टैंड अप कॉमेडी शुरू की है, बड़े-बड़े लोग उनकी बातों में दिलचस्पी लेते हैं. उनके ख़यालों को गंभीरता से सुनते हैं. यहां तक कि उनके पुराने सीनियर अफ़सर भी अब एल्फ़ी को ख़त लिखने लगे हैं.
आज एल्फ़ी का शो इतना पसंद किया जाने लगा है कि लोग पुलिस के बारे में ख़ुद ही आकर कई मज़ाक़िया बातें उन्हें बता जाते हैं. उन गड़बड़ियों को बेहतर करने के तरीक़े भी लोग एल्फ़ी को सुझा जाते हैं.
आज तो ऑनलाइन कॉमेडी का भी ख़ूब चलन बढ़ा है, जाआइएफ और वाइन लूप वीडियो के ज़रिए तमाम लोग, इंसान को हंसाने की कोशिशों में जुटे हैं. बहुत से लोग अपने मसखरी के वीडियो यू-ट्यूब पर अपलोड करते हैं. इन्हें ख़ूब हिट्स मिलते हैं. अमरीका की कोलोरा़डो यूनिवर्सिटी में तो बाक़ायदा हंसी पर रिसर्च के लिए अलग डिपार्टमेंट बना दिया गया है. इसी तरह ब्रिटेन की ब्रुनेल यूनिवर्सिटी में भी एक रिसर्च सेंटर हंसी-मज़ाक़ पर रिसर्च के लिए खोला गया है.

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इंसान अपनी ज़िंदगी के हर मोड़ पर हंसी मज़ाक़ का सामना करता है. लोगों को गुदगुदाने वाले क़िस्से, चुटकुले पसंद आते हैं. इससे उनकी राय भी बदलती है. कई बार बहुत सीरियस बात भी हंसी-मज़ाक़ में कही जाए तो गहरा असर छोड़ती है. अब रिसर्च के ज़रिए ये समझने की कोशिश हो रही है कि हंसी-मज़ाक़ का हमारे दिल-दिमाग़ पर कैसा असर होता है? हमारी सेहत को इससे कितना फ़ायदा पहुंचता है?
जैसे पिछली पीढ़ी के लोगों ने इंसान की बुद्धिमानी पर रिसर्च की थी, ठीक उसी तरह नई पीढ़ी के वैज्ञानिक मज़ाक़ पर रिसर्च कर रहे हैं. परिहास को समझने की कोशिश कर रहे हैं.
ईरानी मूल के अमरीकी मसखरे जेमी मसादा कहते हैं कि इंसान को कॉमेडी की वैसी ही ज़रूरत है जैसी उसे सांस लेने के लिए हवा की. मसादा के मुताबिक़, किसी को हंसा पाना, इंसान की सबसे बड़ी ताक़त है.
तो, आप भी हंसते रहिए और हंसाते रहिए. और हां, आज से ये न सोचिएगा कि हंसना-हंसाना हंसी खेल है जनाब!
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