ज्वालामुखी के अंदर हज़ारों फुट गहरा बोरिंग!

शहर
    • Author, जोनाथन फ्रॉक्टवाजग
    • पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
  • प्रकाशित

इटली का एक शहर है नेपल्स. नेपल्स की खाड़ी के किनारे बसा ये शहर, ज्वालामुखियों वाला शहर कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा.

इस शहर के क़रीब है इटली का बदनाम ज्वालामुखी, माउंट विसूवियस. ये एक सक्रिय ज्वालामुखी है. सिर्फ़ यही नहीं, नेपल्स के तट के क़रीब समंदर के भीतर एक भयानक ज्वालामुखी है. इसका नाम है, कैम्पी फ्लेग्री.

वैज्ञानिक

कैम्पी फ्लेग्री, एक ऐसा ज्वालामुखी है, जिसके एक दो नहीं कई मुंह हैं. और ये समंदर के भीतर है. माना जाता है कि इसकी कोख में अभी भी भयंकर आग धधक रही है. और ये कभी भी फट सकता है. इससे नेपल्स शहर के तबाह होने का ख़तरा है.

कोई ज्वालामुखी कब फटेगा, इसकी भविष्यवाणी करनी मुश्किल है. लेकिन अब वैज्ञानिक इस कोशिश में हैं कि इसका कोई तोड़ निकाला जाए. इसके लिए नेपल्स शहर में कोशिशें शुरू हुई हैं. समंदर के भीतर छुपे कैम्पी फ्लैग्री, ज्वालामुखी के भीतर झांकने की कोशिश हो रही है.

एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसका नाम है कैम्पी फ्लैग्री डीप ड्रिलिंग प्रोजेक्ट. इसका मक़सद है, ज्वालामुखी के अंदर 10 हज़ार फुट तक की बोरिंग करना. इटली के जियोलॉजिस्ट स्टीफानो कार्लिनो, इस मिशन में शामिल हैं. मिशन के लोगों ने नेपल्स शहर के बार एक पुरानी फैक्ट्री के कैम्पस में एक बोरवेल बनाया है, जिसके ज़रिए ज्वालामुखी के भीतर बोरिंग करके झांकने का इरादा है.

ज्वालामुखी

कैम्पी फ्लैग्री के बारे में कहा जाता है कि ये दुनिया के सबसे ख़तरनाक ज्वालामुखियों में से एक था. इसमें आख़िरी विस्फोट आज से पंद्रह हज़ार साल पहले हुआ था. वैज्ञानिक दावा करते हैं कि ये इतने भयानक विस्फोट थे कि इससे दुनिया का मौसम बदल गया.

ज्वालामुखी

माना जाता है कि इंसानों के रिश्तेदार कहे जाने वाले नियंडरथल मानव, कैम्पी फ्लैग्री में 39 हज़ार साल पहले हुए विस्फोट की वजह से ही ख़त्म हुए. सोलहवीं सदी में यानी 1538 में भी इसमें एक छोटा सा विस्फोट हुआ था.

यानी पिछले क़रीब पांच सौ सालों से ये ज्वालामुखी शांत है. लेकिन कब के फट पड़ेगा और आग उगलने लगेगा कहना मुश्किल है. इसीलिए नेपल्स शहर के पास ही स्थित वेधशाला से माउंट विसूवियस और कैम्पी फ्लैग्री पर लगातार निगरानी होती रहती है. ताकि अगर किसी ज्वालामुखी में विस्फोट का डर हो, तो लोगों को वक़्त रहते आगाह किया जा सके.

शहर आम लोग

नेपल्स शहर के आस पास ज़मीन के अंदर लगातार उठा-पटक चलती रहती है. शहर का ऊबड़-खाबड़ धरातल इस बात की गवाही देता है. अभी 1982 से 1984 के बीच पास का ही एक क़स्बा पोज़ुली, क़रीब दो मीटर तक ऊपर उठ गया था. दहशत के मारे लोग क़स्बा छोड़कर भाग गए थे. कई लोग तो फिर वापस नहीं आए.

जब ऐसा हो रहा था तो वैज्ञानिकों को लगा कि कैम्पी फ्लैग्री में विस्फोट होने वाला है. मगर कुछ सालों बाद धरती अपने आप शांत हो गई. इससे साफ़ हो गया कि क़ुदरत के बहुत से कारनामे, इंसान की समझ से परे हैं.

इसी चीज़ को परखने के लिए स्टीफ़नो कार्लिन और ब्रिटेन के वैज्ञानिक क्रिस्टोफर किलबर्न ने कैम्पी फ्लैग्री की बोरिंग का प्रस्ताव 2008 में रखा था. उस वक़्त इसे मंज़ूरी भी मिल गई.

पॉम्पेय में पाए गए कंकाल

मगर जब तक पैसे मिलते, सामान जमा होता, मीडिया मे हंगामा बरपा हो गया. एक स्थानीय वैज्ञानिक बेनेडेटो डे विवो ने इसे 'रेसिपी ऑफ डिज़ैस्टर' या तबाही का मिशन बताकर इस पर तुरंत रोक लगाने की मांग कर दी.

बेनेडेटो डे विवो का कहना था कि कैम्पी फ्लैग्री के भीतर अभी भी आग धधक रही है ये तो तय है. अगर इसमें बोरिंग की गई तो ज़बरदस्त विस्फोट के ज़रिए लावा बाहर आने का डर है.

शहर

हालांकि स्टीफेनो और किलबर्न का मानना है कि इसकी आशंका कम ही है. मगर बेनेडेटो कहते हैं कि कोई ये पक्के तौर पर नहीं कह सकता है कि ऐसा नहीं होगा. किलबर्न और कार्लिन भी इसकी गारंटी नहीं ले सकते. ऐसे में इस ख़तरे को उठाने की ज़रूरत नहीं. इसके बाद कई सालों तक ज्वालामुखी की बोरिंग के इस प्रोजेक्ट पर रोक लगी रही.

एक साल तक ये नोक-झोंक चलती रही. फिर नेपल्स शहर के लोगों ने एक नया मेयर चुना, जिसने स्टीफेनो और किलबर्न के प्रोजेक्ट को एक बार फिर से हरी झंडी दे दी. इसी के बाद शहर के बाहर वीरान पड़ी एक फैक्ट्री में बोरवेल बनाकर, ज्वालामुखी की बोरिंग का पायलट प्रोजेक्ट फिर से शुरू किया गया है.

वैज्ञानिक

वैसे ड्रिलिंग कोई आसान काम नहीं. आज अंतरिक्ष में जहां इंसान ने अरबों किलोमीटर का फ़ासला तय कर लिया है, वहीं ज़मीन के अंदर बोरिंग में उसे ज़्यादा कामयाबी नहीं मिली है. धरती की कोख में झांकने की ज़्यादातर कोशिशें नाकाम रही हैं.

आज तक अगर इंसान ने धरती के भीतर सबसे गहरी खुदाई की है, तो, वो बारह किलोमीटर से थोड़ी ही ज़्यादा गहराई तक जा सका है. इसके बाद भयंकर गर्म तापमान की वजह से खुदाई का काम आगे नहीं बढ़ सका है.

साठ के दशक में अमरीका ने प्रोजेक्ट मोहोल के ज़रिए समंदर की गहराई में खुदाई शुरू की थी. ये प्रोजेक्ट सिर्फ़ 183 मीटर अंदर तक जा सका. इसके ख़र्च को देखते हुए अमरीकी संसद ने प्रोजेक्ट पर रोक लगा दी थी.

वैज्ञानिक

इसके बंद होने के चार साल बाद सोवियत वैज्ञानिकों ने धरती के भीतर खुदाई की कोशिश शुरू की. क़रीब बीस बरस की मशक़्क़त के बाद सोवियत वैज्ञानिक 12 हज़ार 262 मीटर की गहराई तक जाने में कामयाब हुए. 1992 में ये खुदाई भी 180 डिग्री तापमान से सामना होने के चलते रोकनी पड़ी.

ज्वालामुखी

इक्कीसवीं सदी में जापान का ड्रिलिंग जहाज़ चिक्यू समंदर के भीतर क़रीब दो किलोमीटर की गहराई तक ड्रिलिंग कर चुका है. वैसे अमरीका के क़रीब, समंदर में तेल की खोज में डीपवाटर होराइज़न नाम के मिशन के तहत खुदाई की गई थी. मगर वहां से भारी मात्रा में तेल निकलकर समंदर में फैल गया था. जिसके बाद उसका मुंह बंद करने में ही महीनों लग गए.

धरती के भीतर ख़ुदाई में बड़ी मशीनें चाहिए. ढेर सारा पैसा चाहिए. इसमें ख़तरे भी बहुत हैं. इसी वजह से कैम्पी फ्लैग्री ज्वालामुखी की बोरिंग के मिशन को लेकर वैज्ञानिकों में आम राय नहीं है. मगर स्टीफेनो और किलबर्न को लगता कि कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है.

कंप्यूटर

कैम्पी फ्लैग्री जैसे ज्वालामुखियों में विस्फोट की भविष्यवाणी करने के लिए ज़रूरी है कि उनके अंदर झांक कर देखा जाए. किलबर्न मानते हैं कि इसमें ख़तरा है. मगर, बिना ख़तरा मोल लिए कोई काम हो नहीं सकता.

वैसे नेपल्स के लोगों को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उनके आस-पास दो भयंकर ज्वालामुखी हैं. वो इस बात से भी बेपरवाह हैं कि ज्वालामुखी की बोरिंग में कितना जोखिम है. वो तो अपनी मस्त ज़िंदगी जीने में व्यस्त हैं.

इधर, स्टीफेनो और क्रिस्टोफर किलबर्न की टीम, कैम्पी फ्लैग्री के भीतर झांकने के लिए संसाधन और आत्मविश्वास जुटा रही है.

हमारी शुभकामनाएं उनके साथ हैं.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20160902-the-bold-and-controversial-plan-to-drill-into-a-supervolcano" platform="highweb"/></link> करें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

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