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उपग्रह से नज़र रखी जाएगी कछुओं पर | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हिंद महासागर में एक विलुप्त प्रजाति के कछुओं पर उपग्रह से नज़र रखने की योजना बनाई गई है. इस अध्ययन से कछुओं के संरक्षण में मदद मिलेगी. हॉक्सबिल प्रजाति के इन कछुओं की प्रजाति अवैध शिकार, अनियंत्रित रूप से मछली मारे जाने और अपने परिवास के सीमित होते जाने के चलते ख़तरे में बताई जाती है. ज़ूलॉजिकल सोसायटी ऑफ़ लंदन के वैज्ञानिकों ने हिंद महासागर में कुछ कछुओं में इलेक्ट्रॉनिक टैग लगा दिए हैं. इन इलेक्ट्रॉनिक टैग का संपर्क उपग्रह से होने के कारण कछुओं की गतिविधि पर नज़र रखी जा सकेगी. इससे ये जाना जा सकेगा कि ये कछुए साल में आठ बार तक अंडे देने के लिए तट पर आते हैं, लेकिन बाकी समय में ये कहाँ-कहाँ जाते हैं. ज़ूलॉजिकल सोसायटी की वेबसाइट पर हिंद महासागर में इन कछुओं के विचरण को मॉनिटर किया जा सकेगा. संरक्षण में सहायता सोसायटी ने कछुओं के संरक्षण के अपने कार्यक्रम की शुरुआत तीन साल पहले तब की थी, जब उत्तरी मोज़ाम्बिक़ में इनके बसेरों पर अवैध शिकारियों की नज़र की बात साबित हुई. अब उसी कार्यक्रम की अगली कड़ी के रूप में कछुओं पर उपग्रह से नज़र रखने की योजना बनाई गई है. शुरू में दो-तीन मादा कछुओं में इलेक्ट्रॉनिक टैग लगाए जाएँगे. ज़ूलॉजिकल सोसायटी के संरक्षण प्रबंधक एलिसन शॉ ने बीबीसी को बताया कि हॉक्सबिल कछुओं की गतिविधियों को समझने के बाद उनके संरक्षण की योजना बनाने में बहुत मदद मिल सकेगी. | इससे जुड़ी ख़बरें धीरे-धीरे जिए मगर खूब जिए23 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस कछुए अंडे देने के लिए पहुँचे मगर...26 फ़रवरी, 2006 | विज्ञान हैरियट के 175वें जन्मदिन की धूम15 नवंबर, 2005 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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