क्या हुआ उस लड़की का जो पढ़ना-लिखना भूल गई थी?

    • Author, दिव्या आर्या
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

राधिका कुमारी अपने पुराने प्राइमरी स्कूल के सामने खड़ी होकर दीवार पर लिखे सरकारी संदेश को पढ़ने की कोशिश करती हैं. लिखा है- गंदगी जानलेवा है, स्वच्छता ही सेवा है.

लेकिन 16 साल की राधिका बहुत मुश्किल से पहला शब्द ही पढ़ पाती हैं.

बाक़ी पढ़ने की जगह वो आसपास पड़े कचरे की ओर इशारा कर देती हैं.

राधिका से हम पाँच साल पहले मिले थे, जब कोविड महामारी के दौरान हम शिक्षा के मानकों में पिछड़े और देश के सबसे ग़रीब राज्यों में से एक झारखंड के लातेहार ज़िले गए. वो वहाँ के एक छोटे से गाँव, डुंबी में रहती हैं.

पाँच साल बाद जब हम फिर उनसे मिलने गए तो लगा कि वो ऊपर की क्लास में तो पहुँच गई हैं पर पढ़ाई पीछे छूट गई है.

राधिका के ज़रिए हम जानना चाहते थे कि कोविड महामारी में बंद हुए स्कूलों का, पिछड़े इलाक़ों में कम संसाधनों के बीच रह रहे बच्चियों की पढ़ाई पर कैसा असर पड़ा है.

साल 2024 में स्कूली शिक्षा पर देशव्यापी सर्वे में पाया गया कि औसतन बच्चों के सीखने का स्तर बेहतर हो गया है, लेकिन ये सभी बच्चों का अनुभव नहीं है.

महामारी में बंद रहे स्कूलों के बच्चों पर असर को समझने के लिए झारखंड के गांव-गांव घूमे अर्थशास्त्री ज़ॉं ड्रेज़ के मुताबिक, "आंकड़ों की औसत में बड़ी असमानताएं छिपी हैं".

साल 2021 में जब हम राधिका से मिले तब कोविड महामारी की रोकथाम के लिए लगाए लॉकडाउन में उनके स्कूल समेत देश के सभी स्कूल क़रीब डेढ़ साल तक बंद थे. राधिका का स्कूल दो साल बाद खुला.

प्राइवेट स्कूल और शहरी इलाक़ों के स्कूलों में ऑनलाइन क्लास के ज़रिए पढ़ाई जारी रही लेकिन दूर-दराज़ के सरकारी स्कूलों में रुक गई थी.

उस व़क्त तक राधिका के गाँव में ना इंटरनेट था, ना ही उसके परिवार के पास स्मार्टफोन.

पूरी तरह से स्कूली शिक्षा रुक जाने के चलते राधिका की पढ़ने-लिखने की क्षमता इतनी कम हो गई कि वो हिन्दी के अक्षर पहचानना भूल गई थीं.

दलित-आदीवासी गाँव में पल-बढ़ रहीं राधिका के लिए कोविड में पढ़ाई में पिछड़ने के बाद आने वाले वर्षों में कई और चुनौतियों की वजह से आगे आना मुशिकल हो गया.

महामारी में लंबे समय तक स्कूल बंद रखे जाने का बच्चों की पढ़ाई पर असर समझने के लिए कई सर्वे किए गए.

देश में शिक्षा के सबसे बड़े एनजीओ में से एक 'प्रथम' की शिक्षा पर सालाना रिपोर्ट, असर 2022 ने पाया कि सरकारी और प्राइवेट स्कूलों, दोनों में पढ़ने की क्षमता को भारी नुक़सान हुआ है" और इसे "बड़ा धक्का" क़रार दिया.

रिपोर्ट के मुताबिक़, "साल 2014 में पांचवी क्लास के बच्चों में से 48% दूसरी क्लास के स्तर की पढ़ाई की क्षमता रखते थे. साल 2018 में ये दर बढ़कर 50.4% हुई लेकिन साल 2022 में घट कर 42.8% पर आ गई. राष्ट्रीय स्तर पर सात प्रतिशत की ये गिरावट बहुत बड़ी है क्येंकि ये आंकड़ा बहुत धीरे-धीरे ही बदलता है, और ये महामारी में पढ़ाई में हुए नुक़सान की आशंकाओं की पुष्टि भी करता है."

इसके बावजूद, जब स्कूल खुले तो राधिका को आगे की क्लास में बढ़ा दिया गया.

भारत के शिक्षा के अधिकार क़ानून के तहत, बच्चों पर पढ़ाई का ज़्यादा बोझ ना बने इसके लिए उन्हें पांचवी और आठवीं क्लास में पास करना अनिवार्य था. लेकिन क़ानून के इस प्रावधान की आलोचना हुई कि इसका पढ़ाई पर बुरा असर पड़ रहा है. साल 2024 में इसे हटा दिया गया.

लेकिन तब तक राधिका नौवीं क्लास तक पहुँच गई थीं.

अर्थशास्त्री ज़्याँ द्रेज़ कहते हैं राधिका जैसे बच्चों के लिए झारखंड के स्कूलों में टीचरों की कमी भी एक बड़ी चुनौती है.

वो कहते हैं, "कोविड लॉकडाउन के दौरान स्कूल बंद रहने का असर ये हुआ कि जिन बच्चों को कम सुविधाओं वाले एक-टीचर वाले सरकारी स्कूल में कम शिक्षा मिली थी, उनसे वो भी छूट गई."

भारत में सरकारी स्कूल हमेशा से ही कम सुविधाओं से जूझते रहे हैं और वहाँ हो रही पढ़ाई की ख़राब स्थिति के लिए उनकी आलोचना भी हुई है, लेकिन झारखंड में परिस्थिति और बुरी है क्योंकि शिक्षा के मानकों में ये सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है.

स्कूली शिक्षा पर शिक्षा मंत्रालय के सेंट्रल डेटाबेस, यूडाइज़ प्लस, के मुताबिक़ झारखंड के 40 प्रतिशत सरकारी प्राइमरी स्कूलों में एक टीचर ही हैं.

देशभर में ये एक-टीचर वाले स्कूल घटकर साल 2025-26 में एक लाख तक आ गए हैं. लेकिन झारखंड में ये बढ़ रहे हैं.

जब हम साल 2021 में राधिका से मिले थे, तब वो हिंदी वर्णमाला के कई अक्षर ना सही पहचान पा रही थीं, ना ही लिख नहीं पा रही थीं.

पाँच साल बाद वो दसवीं क्लास का अपना सर्टिफिकेट हमें दिखाती हैं. हालांकि राधिका को हिंदी-अंग्रेज़ी पढ़ने, साधारण गणित करने, वो कौन-कौनसे विषय पढ़ रही हैं, ये याद करने में दिक्क़त होती है.

राधिका अब मनिका ब्लॉक के 75 गाँवों के लिए बने इकलौते हायर सेकेंड्री स्कूल में पढ़ रही हैं. इसमें 2,000 बच्चों को पढ़ाने के लिए 20 टीचर हैं, यानी हर 100 बच्चों के लिए एक टीचर. ये हायर सेकेंड्री के देश के औसत, 23 बच्चों के लिए एक टीचर, से काफ़ी बुरा है.

स्कूल के प्रिंसिपल, मृगेंद्र नारायण सिंह मानते हैं कि बड़ी क्लास होने की वजह से टीचर के लिए उन छात्रों पर अलग से ध्यान देना मुश्किल होता है, जो पिछड़ रहे हों.

वो कहते हैं, "हम उनकी पहचान करने की पूरी कोशिश करते हैं, उन्हें क्लास में आगे बैठाते हैं ताकि ज़रूरत पड़ने पर उनकी मदद की जा सके."

पर ये सब राधिका के लिए काफ़ी नहीं रहा है. जब हम उससे पूछते हैं कि वो अपने स्कूल में क्या बदलाव चाहती है, वो कहती हैं, "मुझे और टीचर चाहिए".

ताज़ा सरकारी आंकड़े बताते हैं कि झारखंड में टीचरों के एक लाख ख़ाली पद हैं.

राज्य में साल 2016 से नए टीचर्स की नियुक्ति नहीं हुई थी. फिर साल 2025 में ज़्याँ द्रेज़ ने टीचर की कमी के बारे में जनहित याचिका दायर की, जिसके बाद झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को 26,000 टीचरों की नियुक्ति का आदेश दिया.

झारखंड सरकार ने लंबे समय से रुकी नियुक्तियों की वजह योग्यता पर चल रहा क़ानूनी विवाद बताई और "निष्पक्ष, पारदर्शी और सामयिक" तरीक़े से नियुक्तियां करने का वादा किया.

कम संसाधन वाले और पिछड़े समुदायों के बच्चों के लिए टीचर की उप्लब्धता बहुत मायने रखती है.

राधिका का छोटा भाई विष्णु ट्यूशन पढ़ने जाता है और उससे पढ़ाई-लिखाई और समझ में कहीं आगे है.

गांव के ज़्यादातर बच्चों की तरह विष्णु और उसकी पाँच बहनें अपने परिवार में स्कूल जाने वाली पहली पीढ़ी हैं. मां-बाप पढ़े-लिखे नहीं हैं. इसलिए स्कूल के बाद ट्यूशन से ही मदद मिल पाती है.

लेकिन जैसा कई भारतीय परिवारों में होता आया है, संसाधनों की कमी के चलते ज़्यादा खर्च बेटे पर किया जाता है, इसलिए ट्यूशन की मदद सिर्फ़ विष्णु को मिल रही है.

कोविड लॉकडाउन के दौरान भी जब हम विष्णु से मिले थे तो वो ट्यूशन पढ़ रहा था, जिस वजह से स्कूल बंद होने का उसकी पढ़ाई पर बुरा असर कम दिखा.

असर 2022 की रिपोर्ट बताती है कि लॉकडाउन के व़क्त देशभर में ट्यूशन का औसत साल 2018 में 25% से साल 2022 में 30% पहुँच गया. झारखंड जैसे राज्यों में ये और भी ज़्यादा 45% था.

प्रिंसिपल सिंह तब टीचर थे और याद करते हैं कि, "पूरी कोशिश के बावजूद हम केवल 10% बच्चों तक पहुंच पाए और कुछ कमज़ोर बच्चों पर इसका बुरा असर पड़ा."

वो कहते हैं, "सरकारी स्कूल के टीचरों को महामारी से जुड़े काम पर भी लगाया गया. मैंने भी बाहर से आ रहे लोगों की जानकारी जमा करने के लिए तीन महीने एक पेड़ के नीचे बैठकर काम किया था."

असर 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक़ समय के साथ बच्चों की पढ़ाई के स्तर फिर से बेहतर हो गए हैं. इसकी एक वजह रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2020 में केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति है.

शिक्षा मंत्रालय की इस नीति के मुताबिक़, "हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है साल 2025 तक प्राइमरी स्कूल में 'यूनिवर्सल फाउंडेशनल लिट्रेसी एंड न्यूमरेसी' (एफएलएन) हासिल करना."

दिसंबर 2024 में शिक्षा मंत्रालय ने देशभर में तीसरी, छठी और नौवीं क्लास के तय मानकों पर बच्चों की पढ़ाई के स्तर को आंका.

सर्वे में राज्यों के स्तर पर काफ़ी अंतर दिखा. 'फाउंडेशनल' स्तर पर झारखंड सबसे नीचे था और आगे की क्लास में भी निचले ग्रुप में ही रहा.

रिपोर्ट के मुताबिक़, "जो राज्य शुरुआती ग्रेड्स में अच्छा कर रहे हैं वो आगे के वर्षों में बढ़त कायम रखते हैं, वहीं जिनकी शुरुआत कमज़ोर होती है, वहाँ आगे जाकर भी छात्रों को दिक्क़त आती है."

अब राधिका के सामने और चुनौतियां भी हैं. उसके गाँव से पैदल चलकर हायर सेकेंड्री स्कूल पहुँचने में एक घंटा लगता है. कोई सहेली ना हो तो वो अकेले उस रास्ते से नहीं निकलतीं. यानी उस दिन स्कूल नहीं जातीं.

राधिका की मां कुन्ती देवी बच्चों को स्कूल ले जानेवाले टेम्पो का किराया नहीं देना चाहतीं.

वो कहती हैं, "मेरे पास इन चीज़ों के लिए पैसे नहीं हैं, अगर राधिका सचमुच स्कूल जाना चाहती है तो पैदल चलकर जा सकती है."

इन सब मुश्किलों के बावजूद झारखंड में हायर सेकेंड्री क्लास में छात्रों का दाखिला बढ़ा है. राज्य का ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो साल 2014-15 में 37.5 से 20 पर्सेनटेज पॉइंट बढ़कर साल 2025-26 में 55 पर पहुँच गया है. देशभर में दाखिलों का ऐसा ही चलन है.

लेकिन बच्चों को स्कूल तक पहुँचना ही काफ़ी नहीं.

ज़्याँ द्रेज़ कहते हैं, "कम पढ़ाई का नतीजा है कि ये बच्चे ज़्यादा सीखते नहीं हैं और बड़े होकर दूसरे राज्यों में पलायन करते हैं. उनके पास स्किल्स तो हैं लेकिन वैसी नहीं जो एक मॉडर्न इकॉनॉमी में काम दिला सकती हैं."

जब राधिका से पूछते हैं कि वो ज़िंदगी में क्या बनना चाहती हैं तो वो मुस्कुरा कर सिर झुकाते हुए कहती हैं, "मैं नौकरी कर, पैसे कमा कर अपने परिवार की मदद करना चाहती हूं".

हालांकि ये भी कहती है कि अभी उसे पता नहीं कि ये होगा कैसे?

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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