अभिव्यक्ति की आज़ादी का सवाल

द हिन्दूज

इमेज स्रोत, Penguin India

इमेज कैप्शन, इस किताब पर हिन्दुओं की भावनाओं का आहत करने का आरोप है.
प्रकाशित

हाल ही में एक अमरीकी लेखक की हिंदू धर्म पर लिखी गई पुस्तक को उसके प्रकाशक पेंगुइन इंडिया ने वापस ले लिया. साथ ही उसकी बाक़ी बची प्रतियों को नष्ट करने के लिए सहमति जताई.

वेंडी डॉनिगर की किताब ‘द हिंदूज़: एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री’ को ये कहते हुए क़ानूनी रूप से चुनौती दी गई है कि इससे हिंदुओं की भावनाओं को कथित रूप से ठेस लगी है.

इस विवादास्पद किताब को दो साल पहले रामनाथ गोयनका पुरस्कार दिया गया था और बीते चार सालों से ये किताब बाज़ार में बिक रही है और तभी से इसके ख़िलाफ़ अभियान भी चल रहा है.

लेकिन ये पहला मौक़ा नहीं है जब किसी किताब पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगा है.

जब सलमान रुशदी की किताब 'द सैटेनिक वर्सेज़' आई थी तो मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने ने इसे मुसलमानों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ बताया था और ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता इमाम ख़ुमैनी ने लेखक के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी कर दिया था.

सवाल अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम ईशनिंदा का है.

क्यों जब-जब धर्म की बात आती है तो लोग सहिष्णु नहीं हो पाते?

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