‘उस टाइपराइटर पर उंगलियाँ सधी हुईं थीं’

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- Author, अतुल चंद्रा
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
- प्रकाशित
'उस टाइपराइटर पर हमारी उंगलियाँ सधी हुईं थीं.’
शनिवार को लखनऊ में पुलिस के दारोग़ा ने पैर की ठोकर से तोड़ दिया था बुज़ुर्ग का टाइपराइटर.
"साहब शनिवार 19 सितम्बर को हमारे जिस टाइपराइटर को दरोग़ा जी ने अपने पैरों से तोड़ा था उसे सालों पहले हमने 4000 रुपए में ख़रीदा था. उसका की बोर्ड प्लास्टिक का था इसलिए जब दरोग़ा जी ने उसे ज़मीन पर पटका और फिर चार-पांच बार जूते की ठोकर से मारा तो वो टूट गया. बड़ी मेहनत से पैसा जोड़-जोड़ कर ख़रीदा था उसे."
एसएसपी ने माफ़ी मांगी
शनिवार को लखनऊ में जनरल पोस्ट ऑफ़िस के बाहर फ़ुटपाथ पर टाइपिंग कर गुज़ारा करने वाले कृष्ण कुमार का टाइपराइटर एक दारोग़ा ने तोड़ दिया था.
इस घटना की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वाइरल होने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के निर्देश पर डीएम और एसएसपी ने कृष्ण कुमार के घर जाकर उन्हें नया टाइपराइटर दिया था और घटना के लिए माफ़ी भी मांगी थी.

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21 सितम्बर को कृष्ण कुमार को किसी ने फ़ोन पर उन्हें धमकी दी, "तुमने जो किया वो ठीक नहीं किया."
लेकिन घटना के बाद कृष्ण कुमार के पास इतने फ़ोन आ रहे हैं कि वो उस नंबर को सेव नहीं कर पाए.
सुरक्षा का आश्वासन
यह पूछे जाने पर कि आपको डर नहीं लग रहा है? कृष्ण कुमार ने कहा, "जब डीएम और एसएसपी साहब ने ख़ुद सुरक्षा का आश्वासन दिया है तो डरना कैसा? और फिर होनी को तो हम टाल नहीं सकते."
शनिवार की घटना को भी वो इसी नज़र से देखते हैं. फ़ुटपाथ पर अपने बग़ल में बैठे एक अन्य टाइपिस्ट की तरफ़ इशारा करते हुए कृष्ण कुमार ने कहा, "दारोग़ा ने इसे गाली दी और उसके टाइपराइटर पर पैर चलाया, लेकिन पता नहीं क्यों उसने मेरा टाइपराइटर उठा कर सड़क पर फेंक दिया. जब मैंने हाथ जोड़कर उससे कहा कि साहब ये हमारी रोज़ी-रोटी है तो उसने उसे ठोकर मार कर तोड़ दिया."

अपने पुराने टाइपराइटर को याद कर 65 वर्षीय टाइपिस्ट कृष्ण कुमार बताते हैं कि कई बार वो टाइपराइटर बिगड़ा लेकिन हर बार मरम्मत कराने के बाद काम करने लगता था. "उस पर हमारी उंगलियां सध गईं थीं."
जो नया टाइपराइटर उनको दिया गया है उसकी तरफ़ इशारा करके कृष्ण कुमार कहते हैं, "उंगलियां ठीक से नहीं पड़ रही हैं."
वैसे तो कृष्ण कुमार को उनका पहला टाइपराइटर उनके पिताजी ने 500 रुपए में ख़रीद कर दिया था, जिसको लेकर उन्होंने 35 साल पहले लखनऊ के जनरल पोस्ट ऑफ़िस के बाहर फ़ुटपाथ पर अपना काम शुरू कर दिया था. दारोग़ा ने जिसको तोड़ा था उसे उन्होंने ख़ुद ख़रीदा था.
हिंदी टाइपिंग ही जीविका
फ़ुटपाथ पर बैठ कर 35 साल हिंदी टाइपिंग से अपनी जीविका चलाने वाले कृष्ण कुमार कहते हैं, "इतने सालों में कितने मुख्यमंत्री आए, कितने राज्यपाल आए लेकिन वीआईपी मूवमेंट होने पर पुलिस वाले जैसे ही कहते थे हम अपना टाइपराइटर हटा कर काम रोक देते थे."
कृष्ण कुमार की आर्थिक सहायता के लिए कई लोग आगे आ रहे हैं. वो कहते हैं, "अगर आर्थिक मदद मिल जाती है तो अपने घर के आसपास कोई और काम कर लूंगा. अब उम्र तो हो ही गई है."
जिस दारोग़ा ने उनके टाइपराइटर को बेरहमी से तोड़ा और उनको गालियां दीं उसे कृष्ण कुमार ने माफ़ कर दिया है.
वो कहते हैं, "हमने अधिकारियों से कह दिया है कि हमें उसके ख़िलाफ़ कोई शिकायत नहीं लिखवानी है. हम नहीं चाहते कि हमारी वजह से उसके घर वालों को कोई परेशानी हो."
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