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उपराष्ट्रपति पद के लिए क्यों सही हैं वेंकैया नायडू?
- Author, राधिका रामाशेषन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
- प्रकाशित
सोमवार को राष्ट्रपति पद के लिए मतदान ख़त्म होने के थोड़ी देर बाद संसदीय बोर्ड की बैठक हुई. बैठक के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने घोषणा की कि एनडीए की ओर से भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू उपराष्ट्रपति पद के प्रत्याशी होंगे.
कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने इस पद के लिए महात्मा गांधी के पोते गोपालकृष्ण गांधी को अपना उम्मीदवार बनाया है.
वेंकैया नायडू मंगलवार को अपना नामांकन दाखिल करेंगे. उपराष्ट्रपति चुनने के लिए 5 अगस्त को वोटिंग होगी.
जहां तक उपराष्ट्रपति के पद का सवाल है वो संसदीय तौर पर देश का दूसरा सबसे बड़ा पद है, लेकिन उपराष्ट्रपति का मुख्य काम होता है राज्य सभा को चलाना.
विपक्ष को ध्यान में रखते हुए चुना
इसके लिए ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो राज्य सभा को अच्छी तरह से संभाल पाएं क्योंकि यहाँ अभी तक एनडीए को पूरा बहुमत नहीं है.
संसदीय कार्य के दौरान सरकार के लिए जितनी समस्याएं पैदा होती हैं वो राज्य सभा से ही होती हैं.
ज़रूरी विधेयक अटक जाते हैं, कांग्रेस और विपक्ष के एकजुट होते हैं और सरकार को कटघरे में खड़ा कर देते हैं, जिसके चलते सदन कई कई दिन तक नहीं चल पाता है.
इस भूमिका में देखा जाए तो पार्टी को एक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी जो सदन को ठीक से चला पाएं.
दूसरी ख़ास बात ये कि जब वेंकैया नायडू संसदीय मामलों के मंत्री थे तो उनके कई सारे मित्र हैं अन्य पार्टियों में.
ऐसा नहीं है कि वेंकैया नायडू केवल बीजेपी या एनडीए तक ही सीमित हैं. उनके कांग्रेस में भी मित्र हैं, समाजवादी पार्टी और जदयू में मित्र हैं. तो ये जो दोस्ती उन्होंने बनाई है वो उनके लिए फायदेमंद हो सकती है.
क्या ये दक्षिण में पैर पसारने का मौक़ा है?
माना जा रहा है कि भाजपा दक्षिण भारत में अपना विस्तार करना चाहती है और ऐसे में वेंकैया नायडू का आंध्र प्रदेश से होना उनके चयन की बड़ी वजह हो सकता है.
ये बात सच है कि वेंकैया नायडू दक्षिण भारत से भाजपा के बहुत पुराने नेता है. वो वैसे तो आंध्र प्रदेश से हैं और वहां से विधानसभा सदस्य रह चुके हैं. आंध्रप्रदेश से वो एक बार एमपी चुनाव भी लड़े थे लेकिन हार गए थे.
लेकिन तमिलनाडु में उनकी अच्छी पकड़ है, उनका परिवार चैन्नई में बस गया है.
वो कई बार कर्नाटक से राज्य सभा में सासंद रह चुके हैं तो वो उस राज्य को भी बेहतर समझते हैं.
इसे एक संकेत माना जा रहा है कि जब राष्ट्रपति उत्तर भारत से हैं तो उपराष्ट्रपति तो दक्षिण भारत से ही होना था. लेकिन उनका दक्षिण भारत पर अच्छी पकड़ होना एक कारक ज़रूर है.
कैबिनेट में फेरबदल की कितनी उम्मीद?
फिलहाल वेंकैया नायडू मोदी सरकार में दो अहम मंत्रालय देख रहे हैं. इस साल जब मनोहर पर्रिकर को गोवा का मुख्यमंत्री बनाया गया था तो केंद्रीय मंत्रिमंडल में उनके स्थान पर नए मंत्री को नहीं लाया गया था.
पर्रिकर के जाने के बाद रक्षा मंत्रालय की ज़िम्मेदारी अरुण जेटली को दे दी गई थी. तो क्या वेंकैया नायडू के मातहत मंत्रालयों की ज़िम्मेदारी नए मंत्रियों को दी जाएगी?
अगर वेंकैया उपराष्ट्रपति चुने गए तो तीन-चार अहम मंत्रालय खाली होने वाले हैं.
वो सूचना और प्रसारण मंत्री भी थे और शहरी विकास मंत्रालय भी उनके पास था. स्मार्ट सिटी परियोजना को उन्होंने ही हरी झंडी दिखाई थी.
अरुण जेटली के पास फिलहाल रक्षा और वित्त दो बेहद अहम मंत्रालय हैं.
कैबिनेट में फेरबदल या फिर उसका विस्तार तो होना तय है. राष्ट्रपति और उपराष्ट्रति के चुनाव की पूरी प्रक्रिया हो जाने के बाद जब मॉनसून सत्र समाप्त हो जाएगा उसके बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल होना ही है.
हो सकता है कि सत्र के बीच में भी ऐसा हो. ऐसी कोई बाधा नहीं है कि सत्र चल रहा हो तो कैबिनेट में ज़िम्मेदारियों का बंटवारा नहीं हो सकता. मोदी सरकार के सामने ये एक बेहद ज़रूरी काम है.
अभी फुलटाइम रक्षा मंत्री नहीं है और चीन के साथ सीमा पर जो तनाव के हालात हैं उसे देखते हुए देश को एक फुलटाइम रक्षामंत्री का ज़रूरत है और मोदी सरकार जो जल्दी फेरबदल करना होगा.
(राधिका रामाशेषन से बातचीत पर आधारित. उनसे बात की बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय ने.)
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