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अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान के 100 दिन और बेशुमार चुनौतियां
किसी देश के हाल को परखने के लिए सौ दिन बहुत ज़्यादा नहीं होते लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के लिए बीते सौ दिन बेहद ख़ास रहे हैं.
इस दौरान अफ़ग़ानिस्तान में बहुत कुछ बदल चुका है. राष्ट्रपति अशरफ ग़नी की अगुवाई में चलने वाली सरकार की जगह तालिबान की अंतरिम सरकार ले चुकी है.
दुनिया के किसी देश ने इस सरकार को मान्यता नहीं दी है. महिलाओं के काम करने और लड़कियों की पढ़ाई पर लगाई गई पाबंदी की वजह से अमेरिका समेत पश्चिम देशों ने अफ़ग़ानिस्तान की मदद बंद कर दी है.
संयुक्त राष्ट्र ने आगाह किया है कि अफ़ग़ानिस्तान के 2.2 करोड़ से अधिक लोगों को भूख से बचाने के लिए वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (डब्ल्यूएफपी) को अनाज की आपूर्ति बढ़ानी होगी. यदि देश का मौसम उतना ही ख़राब हो जाए, जैसा कि विशेषज्ञ भविष्यवाणी कर रहे हैं, तो अफ़ग़ानिस्तान में गंभीर भुखमरी और अकाल का ख़तरा पैदा होने की आशंका है. दिक्कतें और भी हैं.
पश्चिमी देशों के मदद बंद करने से अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई है. लाखों की संख्या में अफ़ग़ानिस्तान के नागरिक देश छोड़कर जा चुके हैं. इस्लामिक स्टेट से सुरक्षा के मोर्चे पर लगातार चुनौती मिल रही है.
काबुल पर कब्ज़े के 100 दिन
तालिबान ने 15 अगस्त को काबुल पर कब्ज़ा किया था. उस दिन अमेरिकी हथियारों से लैस तालिबान के लड़ाके राष्ट्रपति भवन में दाखिल हुए थे.
इसके कुछ देर पहले तत्कालीन राष्ट्रपति अशरफ ग़नी ने एक छोटा सा भाषण दिया और देश के बाहर चले गए.
तालिबान के काबुल पर कब्ज़े के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों की सेनाओं की वापसी के काम में तेज़ी आई. बीस साल बाद अमेरिकी सेना अफ़ग़ानिस्तान से वापस लौटी. ये वापसी 31 अगस्त की तय डेडलाइन के भीतर हुई.
इसके बाद तालिबान के प्रवक्ता ज़बीउल्लाह मुजाहिद ने एलान किया, "तालिबान दुनिया के साथ अच्छे रिश्ते रखना चाहते हैं."
सौ दिन के दौरान तालिबान ने कितने वादे पूरे किए और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की कितनी मांगों को पूरा किया है, इसे लेकर कई सवाल हैं. रूस, अमेरिका, चीन, भारत और पाकिस्तान जैसे कई देश अफ़ग़ानिस्तान को लेकर लगातार बैठकें कर रहे हैं. तालिबान के प्रतिनिधियों के चीन, रूस, कतर और पाकिस्तान के दौरे भी हुए हैं लेकिन अब तक वो उम्मीद के मुताबिक मदद हासिल नहीं कर सके हैं.
इस्लामिक स्टेट को लेकर चिंता
तालिबान ने एक अहम वादा सुरक्षा को लेकर किया था. लेकिन स्थितियां तालिबान के काबू में नहीं दिखती हैं. सबसे बड़ी चुनौती इस्लामिक स्टेट की ओर से मिल रही है. हाल में संयुक्त राष्ट्र ने बताया है कि अफ़ग़ानिस्तान में लगभग हर जगह इस्लामिक स्टेट मौजूद है. इसके संकेत अगस्त से ही मिल रहे हैं.
तालिबान के काबुल पर कब्ज़े के बाद पहला बड़ा हमला काबुल एयरपोर्ट पर हुआ. इसमें सौ से ज़्यादा लोगों की मौत हुई. मरने वालों में अमेरिकी नागरिक भी शामिल थे. इस्लामिक स्टेट ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली.
सुरक्षा के मोर्चे पर ये तालिबान के सामने पहली बड़ी चुनौती थी. इसके बाद इस्लामिक स्टेट ने कुंदुज, कंधार और काबुल पर हमले किए. इन हमलों में कई और लोगों की मौत हुई. इस्लामिक स्टेट ने तालिबान लड़ाकों पर भी हमले किए.
हाल में तालिबान ने इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ पूर्व अफ़ग़ानिस्तान में अभियान शुरू करने की जानकारी दी थी. तालिबान ने पूर्व सरकार के ख़िलाफ़ जो रणनीति आजमाई थी, रिपोर्टों के मुताबिक इस्लामिक स्टेट के लड़ाके उनके ख़िलाफ़ वही तरीके आजमा रहे हैं.
इस्लामिक स्टेट जिसे स्थानीय स्तर पर लोग "दाएश" कहते हैं, उसके लड़ाके हमला कर छिप जाने की रणनीति का इस्तेमाल कर रहे हैं. इससे पहले अफ़ग़ानिस्तान की पूर्व सरकार पर हमले करने के लिए तालिबान सफलतापूर्वक इसी तरह की रणनीति अपना चुका है, जिसमें सड़कों के किनारे बम लगाना और छिप कर हत्याएं करना शामिल है.
इस्लामिक स्टेट का आरोप है कि तालिबान "विश्वासघाती" है क्योंकि वह इस्लाम को लेकर कट्टर नहीं है, वहीं तालिबान आईएस पर विधर्मी और चरमपंथी होने का आरोप लगाता है.
अंतरिम सरकार को मान्यता नहीं
तालिबान ने सितंबर में अंतरिम सरकार के गठन का एलान किया लेकिन इस सरकार को अब तक किसी देश ने मान्यता नहीं दी है.
तालिबान से अमेरिका समेत दूसरे देश एक समावेशी सरकार के गठन की मांग कर रहे थे लेकिन सितंबर में तालिबान ने जब अतंरिम सरकार के गठन का एलान किया और जो तस्वीर सामने आई वो तालिबान से चर्चा कर रहे देशों की उम्मीद के मुताबिक नहीं थी . तालिबान की अंतरिम सरकार में कई ऐसे चेहरे थे जो अमेरिकी एजेंसी एफ़बीआई के 'वांछित आतंकवादियों' की लिस्ट में रहे हैं. अंतरिम सरकार में किसी महिला को शामिल नहीं किया. गया.
अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा, "तालिबान का आकलन उनके लिए गए फ़ैसले के आधार पर किया जाएगा."
तालिबान की तमाम कोशिशों और अपील के बाद भी दुनिया के किसी देश ने अभी तक अंतरिम सरकार को मान्यता नहीं दी है.
दुनिया के कई देशों ने कहा है कि जब तक तालिबान एक समावेशी सरकार का गठन नहीं करते हैं, महिलाओं को काम करने और लड़कियों को पढ़ने की इजाज़त नहीं देते हैं तब तक उनकी सरकार को मान्यता नहीं दी जाएगी. तालिबान के काबुल पर कब्ज़े के बाद से अधिकतर महिला कर्मचारी अपने घरों तक सीमित हैं. काबुल में महिलाओं ने लगातार प्रदर्शन किए हैं लेकिन स्थिति में ज़्यादा बदलाव नहीं हुआ है. महिला पत्रकारों को भी काम करने की इजाज़त नहीं है. स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं समेत कुछ ही महिलाओं को काम करने की अनुमति है.
इस बीच तमाम देशों की ओर से तालिबान को ये भी कहा गया है कि वो अपनी ज़मीन का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए नहीं होने दें.
भूख और ग़रीबी
तालिबान के काबुल पर कब्ज़े के बाद से अफ़ग़ानिस्तान के सामने भुखमरी की समस्या भी खड़ी हो गई है. देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ा गई है. पश्चिमी देशों ने अफ़ग़ानिस्तान को मिलने वाली मदद पर रोक लगा दी है. संयुक्त राष्ट्र ने आगाह किया है कि अफ़ग़ानिस्तान में लाखों लोगों के सामने भुखमरी का ख़तरा है. सर्दी के मौसम में लोगों की चुनौती और बढ़ सकती है. संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया से अपील की है कि वो अफ़गानिस्तान की ओर से मुंह न फेरें और दिक्कत में घिरे लोगों की मदद करें.
हाल में अफ़ग़ानिस्तान का दौरा करने वाले डब्ल्यूएफपी के कार्यकारी निदेशक डेविड बेस्ली ने कहा, "यहां के हालात आप जितना सोच सकते हैं, उससे ज़्यादा बुरे हैं. वास्तव में, हम अब धरती के सबसे ख़राब मानवीय संकट पैदा होने के ख़तरे को देख रहे हैं.''
उनके मुताबिक, "यहां के 95 फ़ीसदी लोगों के पास पर्याप्त भोजन नहीं हैं. हम यहां के 2.3 करोड़ लोगों को भुखमरी की ओर बढ़ते हुए देख रहे हैं. देश के लिए अगले 6 महीने विनाशकारी होने वाले हैं. ये देश पृथ्वी पर नरक बनने जा रहा है."
अगस्त में तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में आने से पहले, माना जा रहा था कि राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी की सरकार अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मदद से सर्दियों के दौरान आने वाले ख़तरे से निपट लेगी. लेकिन जब उनकी सरकार गिर गई तो मदद मिलने का भरोसा भी गायब हो गया.
पश्चिमी देशों ने अफ़ग़ानिस्तान को मदद पर रोक लगा दी है. वे एक ऐसे शासन की मदद नहीं करना चाहते, जो लड़कियों को शिक्षा हासिल करने से रोके और देश में शरिया क़ानून फिर से लागू करे.
संयुक्त राष्ट्र और उसके सहयोगी संगठन दुनिया के तमाम देशों और अमीर मुल्कों के अरबपतियों से अफ़ग़ानिस्तान की तत्काल मदद करने की अपील कर रहे हैं.
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