'एक साड़ी ने बचा ली कई ज़िंदगियां', नेपाल की बाढ़ में बचे एक जोड़े ने बताई पूरी कहानी

    • Author, शारदा वी
    • पदनाम, बीबीसी तमिल
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

नेपाल में आई भीषण बाढ़ से बचकर निकले वेलाचेरी के मुरुगु नगर के एक दंपति ने बताया कि उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे उनका पुनर्जन्म हुआ हो.

नावू कबीरदास और उनकी पत्नी विजया भुवनेश्वरी उन 21 लोगों में शामिल थे जो शुक्रवार रात नेपाल के काठमांडू से चेन्नई पहुँचे.

कुंभकोणम की एक एजेंसी के ज़रिए यात्रा कर रहे 57 लोगों का एक समूह तीन बसों में सवार होकर रासुवा इलाके से गुज़र रहा था, जो बाढ़ की चपेट में आ गया.

वे दो पहाड़ों के बीच घुमावदार सड़क पर यात्रा करते हुए आस-पास के खूबसूरत नज़ारों का आनंद ले रहे थे.

इस सड़क मार्ग के नीचे एक नदी बह रही थी.

अचानक, कुछ ही सेकंड में रासुवा का इलाका आपदा क्षेत्र में बदल गया - तेज़ आवाज़, गिरते पत्थर-चट्टानें, कीचड़ और मलबे के साथ तेज़ी से बहता बाढ़ का पानी.

'हमारे पीछे वाली बस झुक गई'

तीनों बसों में से सिर्फ़ दूसरी बस ही बाढ़ की चपेट में आने से बची.

विजया भुवनेश्वरी कहती हैं, "कुछ मिनटों तक तो हमें समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है. मैंने देखा कि हमारे पीछे वाली बस झुक रही थी. मैं वह नज़ारा और ज़्यादा देर तक नहीं देख सकी; तभी मुझे स्थिति की गंभीरता का एहसास हुआ."

उस पल को याद करते हुए नावू कबीरदास बताते हैं, "अचानक धमाके जैसी तेज़ आवाज़ हुई और गाड़ी पर पत्थर गिरने लगे. फिर, बाढ़ का पानी तेज़ी से अंदर आने लगा, जैसे कोई बांध खोल दिया गया हो."

'हमारी गाड़ी लेट हो गई थी'

बाढ़ आने से पहले, उस इलाके से गुज़र रही उनकी बस कीचड़ में फंस गई और मरम्मत के लिए थोड़ी देर रुकी. विजया भुवनेश्वरी कहती हैं, "उन्हीं कुछ मिनटों ने हमारी जान बचाई."

उनका ड्राइवर नेपाल का रहने वाला एक स्थानीय व्यक्ति था. यह पहाड़ी इलाका था जहाँ अक्सर भूस्खलन और हिमस्खलन होते रहते थे. बाढ़ का पानी देखते ही उसे ख़तरे का अंदाज़ा हो गया.

विजया भुवनेश्वरी बताती हैं, "उसने सबसे कहा कि वैन से बाहर निकलें और ऊँची जगह पर जाना ही सबसे सुरक्षित विकल्प है, फिर वह खुद भी सुरक्षित जगह की ओर भागा. हम भी उसी रास्ते पर गए. उस समय हमारे दिमाग में सिर्फ़ हमारे बच्चे ही थे."

बचने के लिए उन्हें ऊँची जगह पर चढ़ना पड़ा - लगभग एक इमारत की मंज़िल जितनी ऊँचाई पर. कुछ लोगों को छोड़कर, बचे हुए 21 लोगों में से ज़्यादातर की उम्र 50 साल से ज़्यादा थी. अपनी जान बचाने के लिए उन्हें किसी तरह कीचड़ और गाद से ढंकी ढलान पर चढ़ना पड़ा.

विजया भुवनेश्वरी कहती हैं, "एक और महिला और मैंने चढ़ना शुरू किया, लेकिन आधे रास्ते में ही फिसलकर गिर गईं. मैं दो बार फिसली. मेरे पैर कीचड़ से सने हुए थे और पकड़ने के लिए कुछ भी नहीं था."

आखिरकार, वह एक दूसरी महिला की साड़ी को मज़बूती से पकड़कर ऊपर पहुँच पाईं -वह महिला पहले ही ऊपर पहुँच चुकी थी और उसने अपनी साड़ी उतारकर नीचे की ओर बढ़ाई थी.

वह बताती हैं, "मेरी रिश्तेदार, पूंगोडी, पहले ही ऊपर पहुँच चुकी थीं. उस दिन सिर्फ़ वही साड़ी पहने हुए थीं. उसने स्वेटर पहना, अपनी साड़ी उतारी और हमारे लिए नीचे लटका दी. हमने उस साड़ी और पास के एक केबल को पकड़कर खुद को ऊपर खींचा."

वह आगे कहती हैं, "मिट्टी के एक ऐसे टीले पर चढ़ने में हमें डेढ़ घंटा लग गया जो एक इमारत जितना ऊँचा था. एक बार तो, मैंने जिस पेड़ की टहनी को पकड़ा, वह टूट गई. उसके बाद, पेड़ों को पकड़ने के बजाय, हमने ऊपर चढ़ने के लिए साड़ियों को पकड़ा. आखिर में, एक महिला ऊपर नहीं पहुँच पा रही थी; हमने उससे कहा कि वह अपनी कमर के चारों ओर साड़ी बांध ले, और हमारे ग्रुप के सदस्यों ने उसे पकड़कर ऊपर खींच लिया."

ऊपर पहुँचने पर उन्हें एक आपदा राहत केंद्र मिला.

वहाँ मौजूद कुछ लोगों ने उन्हें ठीक होने में मदद के लिए पानी और बिस्किट दिए. जिन लोगों के मोबाइल में सिग्नल था, उनके ज़रिए उन्होंने तमिलनाडु में ख़बर भेजी कि वे सुरक्षित हैं.

विजया भुवनेश्वरी बताती हैं, "हमारे ग्रुप के एक सदस्य के रिश्तेदार सचिवालय में काम करते हैं. उनके ज़रिए हम सरकार से संपर्क कर पाए. हमने सबूत के तौर पर एक फ़ोटो भेजी कि हम सुरक्षित हैं."

ऊपर चढ़ते समय, उन्होंने कीचड़ में फँसे एक व्यक्ति को हाथ हिलाते हुए देखा. विजया भुवनेश्वरी रोते हुए बोलीं, "उसे देखने के बाद, न तो हम और ऊपर चढ़ सकते थे और न ही वहां रुक सकते थे."

बचाव दल को सूचना दी गई और बाद में उस व्यक्ति को बचा लिया गया.

उन्होंने कहा, "ऊपर चढ़ने के बाद ही हमने उस बस को ढूँढा जिससे हम आए थे. हमें सिर्फ़ अपनी बस दिखाई दी; उसके आगे कई गाड़ियाँ पलटी हुई थीं. एक गाड़ी का सिर्फ़ टायर दिख रहा था. तभी हमें मडस्लाइड (कीचड़ धंसने) की गंभीरता का एहसास हुआ."

'20 मंज़िला इमारत जितने ऊँचे, संकरे रास्ते पर चढ़ाई'

वे डेढ़ दिन तक आपदा राहत केंद्र में रहे. उनकी मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं; एक मंज़िल की ऊँचाई वाले मिट्टी के ढेर पर चढ़ने के बाद, उन्हें अब 20 मंज़िला इमारत जितनी ऊँचाई वाले खड़ी ढलान वाले पहाड़ी इलाके से गुज़रना था.

नावू कबीरदास ने कहा, "यह एक संकरा, एक कतार में चलने वाला रास्ता था. मुझे तो यह भी नहीं पता कि हम उस पर कैसे चढ़ पाए. दोनों तरफ़ घनी झाड़ियाँ थीं. हम बस ज़िंदा रहने की ज़बरदस्त इच्छाशक्ति के दम पर ऊपर चढ़े."

उन्होंने बताया कि यह सफ़र बहुत मुश्किल था क्योंकि उनमें से किसी को भी पर्वतारोहण का अनुभव नहीं था. "ज़मीन कीचड़ और दलदल से भरी थी, जिससे हम बार-बार फिसल रहे थे; एक गलत क़दम का मतलब था 50 फ़ीट नीचे गिरना."

"एक जगह हमने गलत मोड़ ले लिया. एक नेपाली व्यक्ति ने हमें रास्ता दिखाया; हमें नीचे उतरना पड़ा और फिर दूसरी दिशा में ऊपर जाना पड़ा."

"ऊपर चढ़ने से ज़्यादा मुश्किल नीचे उतरना था, मुझे बार-बार बैठकर और धीरे-धीरे खिसकते हुए नीचे उतरना पड़ा."

तीन घंटे बाद, वे तय पिकअप पॉइंट पर पहुँचे. वहाँ से उन्हें आर्मी के हेलीकॉप्टर से सुरक्षित जगह पहुँचाया गया. नेपाल में भारतीय दूतावास से संपर्क करने के बाद, वे अपने-अपने घर लौट आए.

चेन्नई, कडलोर, मयिलादुथुराई, कृष्णगिरि और त्रिची जैसे इलाकों से 21 लोग तमिलनाडु लौट आए हैं.

मंत्री राजमोहन ने शुक्रवार को बताया कि राज्य से 400 से ज़्यादा लोग नेपाल गए थे और उनमें से 90 लोगों से संपर्क नहीं हो पा रहा है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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