कोटद्वार में 'मोहम्मद दीपक' की गिरफ़्तारी: शिकायतकर्ता और बचाव पक्ष के दावे अलग क्यों?

इमेज स्रोत, Asif Ali
- Author, आसिफ़ अली
- पदनाम, देहरादून से बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल ज़िले के कोटद्वार में व्यापारी संजीव टोंक की शिकायत पर दीपक कुमार उर्फ़ 'मोहम्मद दीपक' को ज़िला पुलिस ने गिरफ़्तार किया है.
व्यापारी का आरोप है कि सोशल मीडिया पर उनकी एक टिप्पणी से नाराज़ होकर दीपक उनकी दुकान पर आए, उनके साथ गाली-गलौज की और जान से मारने की धमकी दी.
वहीं, दीपक के वकील अरविंद कुमार वर्मा का कहना है कि दोनों के बीच सिर्फ़ कहासुनी हुई थी और न तो मारपीट हुई और न ही गाली-गलौज या जान से मारने की धमकी दी गई.
कोटद्वार एएसपी मनोज ठाकुर के मुताबिक़, "व्यापारी के साथ धक्का-मुक्की और गाली-गलौज की शिकायत मिली थी, जिस पर तत्काल संज्ञान लेते हुए मामला रजिस्टर्ड किया गया है. सुरक्षा के लिहाज से अभियुक्त दीपक कुमार को धारा 151 के तहत गिरफ़्तार किया गया है."
इस विवाद की शुरुआत सोशल मीडिया पर मध्य प्रदेश के उज्जैन की शाही मस्जिद से जुड़े घटनाक्रम को लेकर की गई टिप्पणी को माना जा रहा है.

इसी मामले में पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता यानी बीएनएस की अलग-अलग धाराओं के तहत मुक़दमा दर्ज किया है और बाद में दीपक को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस की धारा 170 के तहत गिरफ़्तार किया.
जनवरी में एक मुस्लिम दुकानदार के समर्थन में बजरंग दल के सदस्यों के विरोध के बाद दीपक कुमार चर्चा में आए थे. उस समय उन्होंने अपना नाम 'मोहम्मद दीपक' बताया था. अब व्यापारी की शिकायत पर हुई उनकी गिरफ़्तारी के बाद यह मामला फिर चर्चा में है.
पुलिस ने क्या बताया?

इमेज स्रोत, Asif Ali
पौड़ी पुलिस के मुताबिक़, व्यापारी संजीव टोंक ने गुरुवार, एक अक्तूबर को कोटद्वार कोतवाली में शिकायत दी थी. पुलिस के मुताबिक़, शिकायत में दीपक कुमार उर्फ़ अक्की उर्फ़ मोहम्मद दीपक पर अभद्रता, गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी देने के आरोप लगाए गए थे.
पुलिस ने शिकायत के आधार पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 351(2) और 352 के तहत मुक़दमा दर्ज किया. पुलिस के प्रेस नोट के मुताबिक़, जांच के दौरान धारा 196 और 115 भी जोड़ी गईं.
पुलिस का कहना है कि जांच के दौरान घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज के साथ उपलब्ध तस्वीरों और वीडियो साक्ष्यों की भी पड़ताल की गई.
पुलिस के मुताबिक़, घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज़ और उपलब्ध तस्वीरों से पहली नज़र में यह सामने आया कि मोहम्मद दीपक ने शिकायतकर्ता के साथ गाली-गलौज की और धमकी दी.
पुलिस ने यह भी कहा कि दीपक की गतिविधियों और क्षेत्र में शांति एवं कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका को देखते हुए उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई.
पुलिस के मुताबिक़, दीपक को बीएनएसएस की धारा 170 के तहत गिरफ़्तार किया गया. धारा 170 किसी संज्ञेय अपराध को होने से रोकने के लिए निवारक (प्रिवेंटिव) कार्रवाई से संबंधित है. पुलिस की ओर से इस प्रावधान के इस्तेमाल का आधार कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका बताया गया है.
पुलिस ने अपने बयान में कहा है कि समाज में शत्रुता फैलाने, धमकी देने या शांति व्यवस्था भंग करने की कोशिश करने वालों के ख़िलाफ़ क़ानून के मुताबिक़ कार्रवाई जारी रहेगी.
हालांकि, पुलिस की ओर से बताए गए आरोप और जांच में सामने आए शुरुआती निष्कर्ष अभी केवल पुलिस का पक्ष है. इन आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होगी.
शिकायतकर्ता कारोबारी का क्या कहना है?

कारोबारी संजीव टोंक का कहना है कि विवाद सोशल मीडिया पर की गई एक टिप्पणी से शुरू हुआ था.
उनके मुताबिक़, दीपक ने घटना से क़रीब चार-पांच दिन पहले सोशल मीडिया पर मध्य प्रदेश के उज्जैन की एक मस्जिद से जुड़े घटनाक्रम का वीडियो साझा किया था.
टोंक का दावा है कि उस वीडियो में सुरक्षाबलों पर पथराव का दृश्य भी था.
उनके अनुसार, उन्होंने इस वीडियो पर टिप्पणी करते हुए लिखा था, "दीपक भाई, क्या आपको यह पत्थरबाज़ी दिखाई नहीं देती?"
टोंक का आरोप है कि इसी टिप्पणी से नाराज़ होकर दीपक एक अक्तूबर की सुबह क़रीब 9 बजकर 45 मिनट पर उनकी दुकान पर पहुंचे.
व्यापारी के मुताबिक़, दुकान पर पहुंचने के बाद दीपक ने उनके साथ गाली-गलौज की और उन्हें कोटद्वार में नहीं रहने देने की बात कहते हुए जान से मारने की धमकी दी.
टोंक ने यह भी बताया कि क़रीब तीन महीने पहले उनकी बाइपास सर्जरी हुई थी.
उनका कहना है कि घटना के दौरान स्थानीय लोगों ने बीच-बचाव किया, जिसके कारण मामला आगे नहीं बढ़ा.
टोंक के मुताबिक़, घटना के बाद उन्होंने पुलिस से शिकायत की. इसके बाद स्थानीय व्यापार मंडल ने भी मामले में हस्तक्षेप किया और पुलिस ने मुक़दमा दर्ज कर कार्रवाई की.
इस तरह शिकायतकर्ता के मुताबिक़, सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी से शुरू हुआ विवाद बाद में उनकी दुकान तक पहुंचा.
दीपक के वकील ने क्या बताया?

इमेज स्रोत, Asif Ali
दीपक के वकील एडवोकेट अरविंद कुमार वर्मा ने इस कारोबारी के आरोपों को ख़ारिज किया है.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में वर्मा ने कहा कि दीपक का कोटद्वार की 'भाई जी की सेल वाली गली' में पुराना निवास रहा है और उनकी मां की भी वहीं चाय की दुकान है.
वकील के मुताबिक़, पास में दुकान चलाने वाले एक अन्य व्यापारी से दीपक की पुरानी जान-पहचान है.
वर्मा का कहना है कि एक अक्तूबर को दोनों के बीच किसी बात को लेकर सामान्य बातचीत हुई और इसी दौरान कहासुनी हो गई.
उन्होंने कहा कि दीपक ने सिर्फ़ इतना कहा था कि यह उसका व्यक्तिगत मामला है और इसमें किसी को बेवजह हस्तक्षेप या टोका-टाकी नहीं करनी चाहिए.
वकील का दावा है कि वहां न तो मारपीट हुई और न ही गाली-गलौज या जान से मारने की धमकी दी गई.
वर्मा का आरोप है कि इसके बाद व्यापार मंडल ने माहौल बनाकर पुलिस में शिकायत दी और उसी के आधार पर दीपक के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया.
उन्होंने यह भी दावा किया कि मामले में धार्मिक उन्माद फैलाने, गाली-गलौज और धमकी से संबंधित धाराएं जोड़ी गई हैं.
वर्मा ने आरोप लगाया कि दीपक के ख़िलाफ़ कार्रवाई के पीछे राजनीतिक और अन्य दबाव हो सकते हैं.
हालांकि, दबाव के इस दावे के समर्थन में वकील ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में कोई स्वतंत्र साक्ष्य पेश नहीं किया है.
दूसरी ओर, पुलिस ने अपनी कार्रवाई की वजह जांच के दौरान सामने आए तथ्यों और शांति एवं कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका को बताया है.
गिरफ़्तारी की प्रक्रिया पर वकील के सवाल

इमेज स्रोत, Asif Ali
दीपक के वकील अरविंद कुमार वर्मा ने उनकी गिरफ़्तारी की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं.
उनका कहना है कि जिन मामलों में सात साल तक की सज़ा का प्रावधान है, वहां अगर गिरफ़्तारी ज़रूरी नहीं है तो पुलिस बीएनएसएस की धारा 35 के तहत अभियुक्त को नोटिस जारी कर जांच में शामिल होने के लिए कह सकती है.
वर्मा के मुताबिक़, दीपक को नोटिस देकर जांच में शामिल होने का अवसर दिया जा सकता था.
उनका दावा है कि इसके बजाय पुलिस ने दीपक को गिरफ़्तार किया और उन्हें रातभर हिरासत में रखा.
वकील ने यह भी दावा किया कि इस मामले में आने वाले समय में कुछ और धाराएं जोड़ी जा सकती हैं. उन्होंने कहा कि बचाव पक्ष अदालत में दीपक का पक्ष रखेगा और ज़मानत की याचिका दाखिल करेगा.
हालांकि, सिर्फ़ इस आधार पर कि किसी मामले में सात साल तक की सज़ा का प्रावधान है, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि गिरफ़्तारी हर परिस्थिति में ग़लत या अवैध है.
बीएनएसएस की धारा 35 में कुछ परिस्थितियों में गिरफ़्तारी के प्रावधान हैं और जहां गिरफ़्तारी ज़रूरी नहीं है, वहां नोटिस जारी करने का प्रावधान भी है.
इस मामले में गिरफ़्तारी की वैधता और उसकी आवश्यकता का अंतिम आकलन उपलब्ध रिकॉर्ड और अदालत के सामने रखे गए तथ्यों के आधार पर ही किया जा सकता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.



























