मध्य प्रदेश के 'चिता आंदोलन' से चर्चा में आईं दिव्या अहिरवार कौन हैं?

    • Author, विष्णुकांत तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

चिताओं पर लेटी महिलाएं और सूली पर लटके लोग, कुछ समय पहले मध्य प्रदेश से आई इन तस्वीरों ने पूरे देश का ध्यान खींचा था.

अब इसी आंदोलन के कुछ प्रदर्शनकारियों पर हत्या की कोशिश का आरोप लगा है. इनमें 25 साल की दिव्या अहिरवार भी शामिल हैं, जो क़रीब एक महीने से जेल में हैं.

मध्य प्रदेश के पन्ना ज़िले की पुलिस के मुताबिक़, 28 सितंबर को प्रदर्शन के दौरान दिव्या अहिरवार और 12 अन्य लोगों ने पुलिसकर्मी भूपाल सिंह भदौरिया की गर्दन दबाई और उन्हें जान से मारने की कोशिश की.

ये सभी लोग केन-बेतवा परियोजना के बाद अब पन्ना ज़िले की मझगांव बांध परियोजना से प्रभावित परिवारों के साथ 'चिता आंदोलन' कर रहे थे.

इस मामले में दिव्या अहिरवार और अन्य लोगों के ख़िलाफ़ बीएनएस की धारा 190, 191(2), 191(3), 109(1), 296(बी) और 351(3) के तहत मामला दर्ज किया गया है.

इनमें हत्या की कोशिश, दंगा करने और आपराधिक धमकी देने जैसे आरोप शामिल हैं. दिव्या क़रीब एक महीने से जेल में हैं.

एफ़आईआर में कुल 13 लोगों के नाम

दिव्या के अलावा इस मामले की एफ़आईआर में कुल 13 लोगों के नाम हैं. इनमें आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अमित भटनागर, हिसाबी राजपूत और प्रभावित परिवार के सदस्य दीपक द्विवेदी भी शामिल हैं.

दिव्या की वकील अंजना कुररिया ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया कि ज़िला अदालत ने उनकी ज़मानत याचिका ख़ारिज कर दी है.

बचाव पक्ष ने अदालत में वीडियो फ़ुटेज और अख़बारों की कटिंग समेत कई चीज़ें पेश की थीं.

वकील के मुताबिक़, "अदालत ने आरोपों को प्रथम दृष्टया गंभीर मानते हुए ज़मानत देने से इनकार कर दिया."

वकील ने 27 अक्तूबर को इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी.

पन्ना की पुलिस अधीक्षक निवेदिता नायडू ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "पुलिस ने क़ानून के मुताबिक़ कार्रवाई की है और जांच तेज़ी से जारी है."

उन्होंने कहा कि जांच के दौरान जुटाए जा रहे सबूतों की जानकारी फ़िलहाल सार्वजनिक नहीं की जा सकती.

आख़िर इस साल अप्रैल में 'चिता आंदोलन' के बाद चर्चा में आईं दिव्या और अन्य लोगों पर हत्या की कोशिश का मुक़दमा कैसे दर्ज हुआ और दिव्या की गिरफ़्तारी पर क्या सवाल उठ रहे हैं?

पुलिस पर झूठी एफ़आईआर दर्ज करने का आरोप

दिव्या की वकील अंजना कुररिया ने एफ़आईआर में कई ख़ामियां होने और पुलिस पर झूठी एफ़आईआर दर्ज करने का आरोप लगाया है.

उन्होंने कहा, "एफ़आईआर में एक पुलिसकर्मी की हत्या की कोशिश का ज़िक्र है. हालांकि, इस कथित घटना में दिव्या की क्या भूमिका है, यह कहीं नहीं लिखा है."

उन्होंने दावा किया कि जिस अभियुक्त पर दिव्या की तुलना में ज़्यादा गंभीर आरोप लगे हैं उसे 10 दिन में ही ज़मानत मिल गई जबकि दिव्या अब भी जेल में हैं.

पन्ना पुलिस की ओर से दर्ज एफ़आईआर में लिखा गया है कि 28 सितंबर को पुलिस को सूचना मिली कि हत्या की कोशिश के मामले में फ़रार अभियुक्त दिव्या अहिरवार और हिसाबी राजपूत बनहरीकला गांव आए हैं.

दिव्या अहिरवार, हिसाबी राजपूत, अमित भटनागर और अन्य लोगों के ख़िलाफ़ मई 2026 में पुलिस पर पथराव और हत्या की कोशिश का मामला छतरपुर के किशनगढ़ थाने में दर्ज हुआ था.

'चिता आंदोलन' का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर ने कहा, "देखिए, हम लोग सितंबर की शुरुआत से बनहरीकला गांव में मझगांव बांध से प्रभावित परिवारों के हक़ के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं."

"इस दौरान कई बार पुलिस और प्रशासन यहां आया. ऐसे में पुलिस का यह कहना कि मुख़बिर के माध्यम से सूचना मिली, भद्दे मज़ाक जैसा लगता है."

अमित ने आगे कहा, "दूसरी बात यह है कि दिव्या और हम लोगों पर किशनगढ़ थाने में मामला दर्ज है. इस एफ़आईआर के बाद भी हम लोग किशनगढ़ थाना क्षेत्र में ही प्रदर्शन करते रहे हैं."

"तो सवाल यह उठता है कि पुलिस तब तक क्या कर रही थी?"

अंजना ने पुलिस पर बदला लेने की भावना से काम करने का आरोप लगाया.

उन्होंने कहा, "पुलिस दिव्या को जेल में रखकर बाक़ी आंदोलनकारियों की हिम्मत तोड़ना चाहती है. यह पुलिस को मिले अधिकारों का सरासर दुरुपयोग है."

"हमने अब इस मामले को हाई कोर्ट के सामने रखा है."

पुलिस ने आरोपों पर क्या कहा?

इस पूरे मामले पर जब बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने पन्ना की पुलिस अधीक्षक (एसपी) निवेदिता नायडू से सवाल किए, तो उन्होंने कहा, "पुलिस ने क़ानून और तय प्रक्रिया का पालन करते हुए कार्रवाई की है."

उन्होंने आगे कहा, "एफ़आईआर सार्वजनिक दस्तावेज़ है और उसके तथ्यों को पढ़कर समझा जा सकता है."

उन्होंने यह भी कहा, "मामले की जांच जारी है और जांच के दौरान जुटाए जा रहे सबूत सार्वजनिक नहीं किए जा सकते."

पुलिस अधीक्षक ने अपने जवाब में यह स्पष्ट नहीं किया कि एफ़आईआर में नामज़द बाक़ी लोगों के ख़िलाफ़ अब तक क्या कार्रवाई हुई है.

उन्होंने यह भी नहीं बताया कि दिव्या की गिरफ़्तारी और हिरासत के संबंध में पुलिस को अब तक ऐसे कौन-से सबूत मिले हैं, जिनके कारण पुलिस ने उनकी ज़मानत याचिका का विरोध किया है.

दूसरी ओर, दिव्या की मां गोरीबाई अहिरवार और उनका परिवार दिव्या की सुरक्षा को लेकर बहुत चिंतित है.

'मेरी बेटी कुछ ग़लत नहीं कर रही है'

दिव्या की मां ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से फ़ोन पर बातचीत में कहा कि उनकी बेटी ग़रीबों और मज़दूरों के लिए आवाज़ उठा रही थी और उसने कुछ ग़लत नहीं किया है.

बात करते हुए वह रो पड़ीं.

उन्होंने बताया कि दिव्या के पिता की साल 2013 में मौत हो गई थी. इसके बाद उन्होंने मज़दूरी करके अपने पांच बच्चों को पाला और पढ़ाया.

दिव्या की मां के मुताबिक़, उनकी बेटी घर की होनहार लड़की रही है.

जब दिव्या ने पहली बार चुनाव लड़ने की बात कही, तो उन्हें हैरानी हुई थी.

वह कहती हैं, "भैया, मेरा परिवार इतना ग़रीब था कि मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरे घर का कोई व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है."

"मुझे तो यह भी नहीं पता था कि वोट डालने जाने पर हम लोगों की गिनती होती है या नहीं."

लेकिन दिव्या ने चुनाव लड़ा और पार्षद बनीं.

उनकी मां के मुताबिक़, इसके बाद से वह अपने इलाक़े के परेशान और शोषित लोगों की मदद करने लगीं.

दिव्या की मां ने कहा, "मैं रो रही हूं क्योंकि बेटी से प्रेम है. मैं अपनी बेटी को नहीं देख पा रही हूं. मेरी बेटी को जेल में बहुत समय हो गया है."

"मुझे उसके लिए डर भी लगता है कि कहीं उसे कुछ न हो जाए. अपने बच्चे को जेल में देखना किसी मां के लिए आसान नहीं है."

"लेकिन मैं उसका पूरा समर्थन करूंगी. उसके हर फ़ैसले के साथ खड़ी हूं क्योंकि वह कुछ भी ग़लत नहीं कर रही है."

मुआवज़े और पुनर्वास को लेकर आंदोलन

पन्ना और छतरपुर क्षेत्र में बांध परियोजनाओं से प्रभावित परिवार लंबे समय से मुआवज़े और पुनर्वास की मांग कर रहे हैं.

आंदोलन में शामिल लोगों का आरोप है कि बांध में पानी भरने और घरों के डूब क्षेत्र में आने के बावजूद कई परिवारों को पूरा मुआवज़ा नहीं मिला है.

उनका यह भी कहना है कि प्रशासन ने पहले जो आश्वासन दिए थे, वे पूरे नहीं हुए.

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा कि मुआवज़े के वितरण में अनियमितताएं हुई हैं.

उनका आरोप है कि कई योग्य परिवारों को उचित मुआवज़ा नहीं मिला और प्रभावित लोगों की शिकायतों पर सुनवाई नहीं हुई.

दिव्या के अलावा इस मामले में दर्ज एफ़आईआर में मझगांव बांध परियोजना से प्रभावित एक परिवार के सदस्य दीपक द्विवेदी का नाम भी है.

दीपक ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा कि उनके जैसे सैकड़ों परिवार लंबे समय से मुआवज़े और पुनर्वास के मुद्दे पर सरकार और प्रशासन से शिकायत कर रहे हैं, लेकिन उनकी मांगों पर सुनवाई नहीं हो रही है.

दीपक ने भी पुलिस पर फ़र्ज़ी कार्रवाई करने का आरोप लगाया है.

उन्होंने कहा, "पुलिस के मुताबिक़, जिस वक़्त घटना हुई, उस समय न तो मैं और न ही अमित भटनागर घटनास्थल पर मौजूद थे."

"इसके बावजूद हम दोनों के नाम एफ़आईआर में दर्ज किए गए हैं. अब इससे बड़ा सबूत इस मामले के फ़र्ज़ी होने का क्या होगा?"

दिव्या को चुनकर निशाना बनाने का आरोप

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा कि पुलिस ने दिव्या को निशाना बनाकर गिरफ़्तार किया है.

उन्होंने दावा किया, "एफ़आईआर में नामज़द 13 लोगों में से आठ लोग ख़ुद अपनी गिरफ़्तारी देने पुलिस के पास गए थे."

"लेकिन पुलिस ने हम लोगों के ख़िलाफ़ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस की धारा 170 के तहत कार्रवाई की और बाद में हमें छोड़ दिया, जबकि दिव्या अब भी जेल में हैं."

बीएनएसएस की धारा 170 पुलिस को किसी अपराध को रोकने के लिए कुछ परिस्थितियों में गिरफ़्तार करने का अधिकार देती है. यह पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 151 के समकक्ष है.

एक अन्य प्रभावित ग्रामीण गया सिंह कोंदर ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "सर, दिक़्क़त यह है कि हम लोग शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं."

"हम अपनी ख़ुशी के लिए नहीं, बल्कि अपने हक़ के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं. हम लोग हटने वाले नहीं हैं, इसलिए अब हम सरकार और अफ़सरों को खटक रहे हैं."

दिव्या की गिरफ़्तारी के बाद भी पन्ना में मुआवज़े और पुनर्वास की मांग को लेकर प्रभावित परिवारों का आंदोलन जारी है.

दिव्या अहिरवार और इस आंदोलन को अब राजनीतिक समर्थन भी मिल रहा है.

मंगलवार को पूर्व राज्यसभा सांसद और सीपीआई(एम) की वरिष्ठ नेता वृंदा करात और अमित भटनागर ने पन्ना जेल में दिव्या अहिरवार से मुलाकात की.

इससे पहले मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी भी उनसे मिल चुके हैं.

वृंदा करात और अमित भटनागर ने दिव्या से मुलाकात के बाद कहा कि दिव्या ने कहा है कि वह जेल से भी विस्थापित परिवारों के हक़ की लड़ाई जारी रखेंगी.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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