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सोनिया गांधी की किताब से भारत के 'सबसे ताक़तवर राजनीतिक परिवार' के बारे में क्या पता चलेगा?
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 12 मिनट
1998 में जब सोनिया गांधी भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं, तब उनके बारे में और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के बारे में बहुत कम जानकारी थी. उस वक़्त उन्हें अनिच्छुक राजनेता के तौर पर देखा जा रहा था.
इटली में जन्मीं, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी ने इससे पहले कई साल तक राजनीतिक सुर्खियों से दूर रहने की कोशिश की थी. इसके बाद उन्होंने उस पार्टी की कमान संभाली, जिसका आज़ाद भारत के इतिहास के बड़े हिस्से पर दबदबा रहा था.
अपने शुरुआती महीनों में इंडिया टुडे पत्रिका ने सोनिया गांधी को "अपनी पार्टी के नेताओं के लिए काफ़ी रहस्यमयी" बताया था.
पत्रिका ने उन्हें सुरक्षा घेरे में दुनिया से अलग रहने वाली एक महिला बताया जो "विदेशी लहजे में छोटे-छोटे जवाब" देती थीं.
पत्रिका के मुताबिक़, हालांकि, अपनी इस चुप्पी के पीछे वो पहले ही सत्ता का इस्तेमाल करना सीख रही थीं. वो अलग-अलग पक्षों की दलीलें सुनती थीं. जानकारी जुटाती थीं. इसके बाद अपना फ़ैसला करती थीं.
पत्रिका ने लिखा था, "फ़ैसला लेने की प्रक्रिया से किसी को बाहर नहीं रखा जाता और किसी की आवाज़ नहीं दबाई जाती. लेकिन आख़िरी फ़ैसला उन्हीं का होता है."
करीब तीन दशक बाद, कांग्रेस की राजनीति में एक अनिच्छुक बाहरी व्यक्ति से देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी की सबसे ताक़तवर नेता बनने तक के सफ़र के बाद, सोनिया गांधी अब अपनी कहानी ख़ुद बता रही हैं.
किताब में क्या है?
79 वर्षीय सोनिया गांधी की निजी ज़िंदगी बेहद दुख और उतार-चढ़ाव से भरी रही है. उनके सुरक्षा गार्डों ने जब उनकी सास इंदिरा गांधी को गोली मारी, तो सोनिया गांधी उन्हें अस्पताल लेकर गई थीं.
सात साल बाद, एक आत्मघाती हमलावर ने उनके पति राजीव गांधी की हत्या कर दी. इसके बाद सोनिया गांधी उनके शव को घर लेकर आई थीं.
उनकी आत्मकथा 'बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ़ लव' नवंबर में प्रकाशित होगी.
इसे अमेरिका में अल्फ्रेड ए नॉफ़ और ब्रिटेन में विलियम कॉलिन्स प्रकाशित करेंगे.
भारत में पब्लिश होने से पहले ही इस किताब की काफ़ी चर्चा हो रही है.
अल्फ्रेड ए नॉफ़ के ज़रिए जारी एक बयान में सोनिया गांधी ने कहा है कि वो चाहती हैं कि यह संस्मरण "मेरे दिल के उस सफ़र की गवाही बने, जिसमें मेरी ज़िंदगी की ख़ुशियाँ और गहरी निराशा शामिल रही हैं."
विलियम कॉलिन्स के मुताबिक़, किताब की शुरुआत 1965 में कैंब्रिज से होती है. उस समय 19 साल की इतालवी छात्रा सोनिया मैनो राजीव गांधी के प्यार में पड़ जाती हैं.
प्रकाशकों के मुताबिक़, किताब के इस हिस्से में सोनिया गांधी अपनी ज़िंदगी को बड़े गर्मजोशी और बेबाकी के अंदाज़ में देखती हैं.
उनकी ज़िंदगी की शुरुआत इटली के एक छोटे शहर में उनके बचपन से होती है. इसके बाद वह अप्रत्याशित रूप से भारतीय राजनीति के केंद्र तक पहुंचीं.
पाठक क्या जानेंगे?
इस संस्मरण को लेकर भारत में पहले ही विवाद शुरू हो चुका है.
ख़बरों के मुताबिक़, पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया ने पांडुलिपि के कुछ हिस्सों में बदलाव करने को कहा था. इसके बाद कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रकाशक पर सरकार की आलोचना करने वाले अंशों को बदलने के लिए राजनीतिक दबाव डाला गया था.
पेंग्विन ने इस दावे से इनकार किया है. उसका कहना है कि वह "किताब पब्लिश करने के लिए हमेशा तैयार रहा" और इसे लेकर चर्चाएं चल रही थीं.
लेकिन पाठक सिर्फ़ उस कहानी को जानने में दिलचस्पी नहीं रखेंगे कि एक युवा विदेशी महिला भारत के सबसे ताक़तवर राजनीतिक परिवार का हिस्सा कैसे बनी. वे आधुनिक भारतीय राजनीति के कुछ सबसे बड़े अनसुलझे सवालों के जवाब भी तलाशेंगे.
आख़िर वो क्या चीज़ थी जो सोनिया गांधी को राजनीति में खींच लाई? और 2004 में जब कांग्रेस आठ साल तक सत्ता से बाहर रहने के बाद दोबारा सत्ता में लौटी, तब पर्दे के पीछे क्या हुआ था?
सबसे बड़ा रहस्य शायद यही है कि सोनिया गांधी ने अपनी पार्टी और सहयोगियों का समर्थन होने के बावजूद प्रधानमंत्री पद को क्यों ठुकरा दिया और इसके बजाय भारत के आर्थिक उदारीकरण के जनक मनमोहन सिंह को क्यों चुना.
क्या उन्हें इस बात का डर था कि उनकी विदेशी पृष्ठभूमि उनकी सरकार को स्थायी रूप से कमज़ोर कर देगी?
पत्रकार और लेखिका नीरजा चौधरी कहती हैं, "मुझे लगता है कि यही सबसे बड़ा अनुत्तरित प्रश्न है. वह आसानी से प्रधानमंत्री बन सकती थीं. उन्हें अपनी पार्टी और सहयोगियों का पूरा समर्थन हासिल था, और राष्ट्रपति कार्यालय ने उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रण वाला पत्र तैयार रखा था."
अपने संस्मरणों में, कांग्रेस के पूर्व नेता और विदेश मंत्री नटवर सिंह ने लिखा कि सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी अपनी मां के प्रधानमंत्री बनने के "कड़े" विरोधी थे, क्योंकि उन्हें डर था कि उनका भी वही हश्र होगा जो उनकी दादी और पिता का हुआ था.
नटवर सिंह ने लिखा है कि मामला तब चरम पर पहुंच गया जब राहुल ने कहा कि वह उन्हें रोकने के लिए "हर संभव क़दम" उठाने को तैयार हैं. क्या सोनिया का संस्मरण उस असाधारण फै़सले पर नई रोशनी डालेगा- या पर्दे के पीछे जो कुछ हुआ था उसका एक बिल्कुल अलग विवरण प्रस्तुत करेगा?
विपक्षी राजनेता जताते रहे हैरानी
कारण चाहे जो भी हो, उनके इस फै़सले ने भारतीय राजनीति को बदल दिया. लेकिन यह फै़सला एक बड़े रहस्य का सिर्फ़ एक हिस्सा है: आख़िर सोनिया गांधी ने राजनीति में क़दम क्यों रखा?
उन्होंने वर्षों तक राजनीतिक करियर से दूरी बनाए रखी. 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद, वह काफ़ी हद तक सार्वजनिक जीवन से दूर रहीं. लेकिन 1990 के दशक में कांग्रेस के चुनावों में लगातार कमज़ोर प्रदर्शन के बाद, वो 1997 में पार्टी में शामिल हुईं और एक साल से भी कम समय में इसकी अध्यक्ष बन गईं.
उस समय उनके प्रतिद्वंद्वियों ने उन्हें बड़े पैमाने पर ख़ारिज कर दिया था. दिसंबर 1998 में, इंडिया टुडे ने रिपोर्ट की कि शुरुआत में प्रमुख विपक्षी राजनेता उन्हें "गृहिणी" या "इटैलियन वंडर" से अधिक कुछ नहीं कहते थे. फिर भी, कुछ ही महीनों में उन्होंने अपनी पार्टी को बदलना शुरू कर दिया था.
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने स्वीकार किया: "मैंने कभी नहीं सोचा था कि यह महिला इतना बड़ा उलटफेर कर सकती है."
पत्रिका ने उन्हें बाहर से नरम दिखने वालीं एक सख़्त महिला बताया और कहा कि वे "पहाड़ जैसे अहंकार को धूल में मिटाना है" यह जानती हैं.
फिर वे दुखद घटनाएं भी हैं जिनकी वजह से राजनीति में उनका सफ़र शुरू हुआ.
सोनिया ने 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद अपने परिवार में आए बदलावों को देखा. सात साल बाद, उन्होंने राजीव गांधी को एक आत्मघाती हमलावर के हाथों खो दिया. इन मौतों ने भारतीय राजनीति और उनके अपने जीवन की दिशा बदल दी.
उन वर्षों के बारे में वह क्या कहेंगी? राजीव के राजनीतिक करियर के बारे में, जिसका उन्होंने पुरज़ोर विरोध किया था? अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर व्याप्त चिंताओं के बारे में? और उस क्षण के बारे में जब उन्होंने यह निर्णय लिया कि गांधी परिवार की राजनीतिक विरासत को यूं ही नहीं छोड़ा जा सकता?
कुछ असहज सवाल भी हैं.
क्या वह बोफोर्स कांड पर चर्चा करेंगी, जिसने राजीव गांधी की सरकार को बुरी तरह से नुक़सान पहुंचाया और इतालवी व्यवसायी ओटावियो क्वाट्रोची के साथ परिवार के संबंधों को लेकर दशकों तक विवाद खड़ा किया? क्या वह आरोपों पर फिर से विचार करेंगी और बताएंगी कि उन्हें क्या पता था?
और उनके इतालवी मूल को लेकर मचे हंगामे का क्या?
कई वर्षों तक सोनिया गांधी की इस आधार पर आलोचना की गई कि वे एक विदेशी हैं और भारत का नेतृत्व करने के योग्य नहीं हैं.
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की नेता सुषमा स्वराज ने 2004 में घोषणा की थी कि विदेशी मूल की किसी व्यक्ति का प्रधानमंत्री बनना "राष्ट्र का अपमान होगा". उन्होंने सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर इस्तीफ़ा देने, सिर मुंडवाने, सफे़द कपड़े पहनने और तपस्वी जीवन जीने की क़सम खाई थी.
सरकार का 'रिमोट कंट्रोल'?
पत्रकार और लेखक रशीद किदवई कहते हैं, "1999 में कांग्रेस के ही कुछ नेताओं ने उनके विदेशी मूल पर सवाल उठाए थे. क्या उन्होंने कभी देश छोड़ने के बारे में सोचा था?"
राजनीतिक पर्यवेक्षकों को यह भी आश्चर्य होता है कि क्या यह पुस्तक 2004 और 2014 के बीच कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के विरोधाभासों पर प्रकाश डाल सकती है.
सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने लगातार दो राष्ट्रीय चुनाव जीते और सूचना के अधिकार क़ानून और ग्रामीण रोज़गार गारंटी कार्यक्रम सहित कई महत्वपूर्ण उपायों का समर्थन किया.
फिर भी, इसका दूसरा कार्यकाल भ्रष्टाचार के आरोपों, नीतिगत गतिरोध और इस सवाल से घिरा रहा कि पार्टी अपने ही नेतृत्व की ग़ुलाम बन गई है.
सोनिया के आलोचक उन्हें सरकार का "रिमोट कंट्रोल" कहते थे. वे इस बात पर संदेह करते थे कि मनमोहन सिंह पर उनका कितना नियंत्रण है. उनके समर्थक उन्हें एक बेहद मुश्किल गठबंधन को एकजुट रखने वाली राजनीतिक शक्ति के रूप में देखते थे.
आख़िरकार सोनिया ने 2017 में कांग्रेस की बागडोर अपने बेटे राहुल गांधी को सौंप दी. कई लोगों का मानना है कि पार्टी को पुनर्जीवित करने में उनकी विफलता गांधी परिवार के पतन की कहानी का केंद्रीय बिंदु है.
1994 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'राजीव' में सोनिया ने लिखा था कि उन्होंने राजीव को राजनीति में आने से रोकने के लिए "बहुत संघर्ष" किया था. फिर भी आख़िरकार उन्होंने यह विरासत राहुल को सौंप दी.
राहुल का राजनीतिक सफ़र आसान नहीं रहा है: उन्हें एक समय अनिच्छुक राजनीतिज्ञ कहकर ख़ारिज कर दिया गया था और प्रतिद्वंद्वी अक्सर उन्हें एक ऐसा नेता कहकर मज़ाक उड़ाते थे जो अहम मौक़ों पर ग़ैर-हाज़िर रहता है.
किदवई कहते हैं, "सोनिया अपने बेटे की बिल्कुल अलग राजनीतिक शैली और ग्लोबल पर्सपेक्टिव को कैसे देखती हैं? और वह उनकी राजनीति का कितना समर्थन करती हैं? मुझे उम्मीद है कि यह किताब इन सवालों के जवाब देगी."
एक और सवाल यह है कि सोनिया ने परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए राहुल गांधी को क्यों चुना, न कि उनकी बहन प्रियंका को, जो स्वाभाविक रूप से ज़्यादा करिश्माई हैं.
और प्रियंका ने, राजनीतिक भूमिका के बारे में वर्षों की अटकलों के बावजूद, औपचारिक रूप से 2019 में ही चुनावी राजनीति में प्रवेश क्यों किया.
किदवई कहते हैं, "सोनिया का हमेशा यही जवाब होता था कि राजनीति में शामिल होना है या नहीं, यह फ़ैसला मेरे बच्चों को करना होगा."
एक बड़ा सवाल यह भी है: सोनिया गांधी उस भारत के बारे में क्या सोचती हैं जिसे आकार देने में उन्होंने मदद की?
उन्होंने कांग्रेस का नेतृत्व ऐसे समय में किया जब भारतीय राजनीति गठबंधन सरकारों और आर्थिक उदारीकरण से हटकर नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीति की ओर अग्रसर हुई.
लेकिन शायद सबसे अहम सवाल यह है कि सोनिया की आत्मकथा में क्या कहा जाएगा और क्या अनकहा रह जाएगा. नीरजा चौधरी को लगता है कि इसका जवाब किताब के शीर्षक (बिलॉन्गिंग) में ही छिपा है.
चौधरी कहती हैं, "वह इस बात को लेकर सजग रही हैं कि वह नेहरू-गांधी परिवार की विरासत की उत्तराधिकारी हैं. इस विरासत को ज़िंदा रखना है."
उन्हें उम्मीद है कि यह संस्मरण परिवार और उसके इतिहास की ओर लौटेगा. लेकिन सबसे बढ़कर, इसमें सोनिया गांधी के इस एहसास के बारे में बात होगी कि वह इस राजनीतिक परिवार का हिस्सा हैं. साथ ही, कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्होंने इस परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी कैसे संभाली.
वह विरासत, निश्चित रूप से, अब लगातार हमलों के घेरे में है.
सत्ताधारी बीजेपी ने "कांग्रेस-मुक्त भारत" के लिए अभियान चलाया है.
हाल के कई सालों में कांग्रेस को लगातार चुनावी हार का सामना करना पड़ा है और उसके कई नेता विरोधी दलों में शामिल हो गए हैं.
ऐसे में सवाल सिर्फ़ यह नहीं रह गया है कि क्या गांधी परिवार पार्टी को पुनर्जीवित कर सकता है, बल्कि यह भी है कि क्या वह इसे एकजुट रख सकता है.
यह एक ऐसा प्रश्न है जो उस बात के मूल में जाता है जिसे सोनिया अपने संस्मरण में जांचने की कोशिश कर रही हैं.
सोनिया गांधी ने इस किताब के बारे में कहा, "मेरे परिवार के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है. लेकिन बहुत कम लेख ऐसे रहे हैं, जो उनकी सोच, उनके काम और उनकी इंसानी कमज़ोरियों की सचाई तक पहुंच पाए. कई मायनों में, यह किताब उनकी इंसानियत को सम्मान देने की कोशिश है."
इसलिए उनका संस्मरण शायद राजनीतिक हिसाब-किताब से ज़्यादा उस विरासत से अपने जुड़ाव को समझाने की कोशिश होगा. वह बताना चाहती हैं कि नेहरू-गांधी परिवार से मिली विरासत का उनके लिए क्या मतलब रहा है. और वह क्यों मानती हैं कि यह विरासत आज भी मायने रखती है.
हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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