'विदेशिनी' से टैगोर के प्रेम संबंधों पर फ़िल्म

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- Author, इंदु पांडेय
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
- प्रकाशित
"आमि चीनी गो चीनी, तोमार ए ओ गो बिदेशिनी, तूमी थाको सिंधु पारे, ओ गो बिदेशिनी."
(समुद्र पार रहने वाली ओ विदेशिनी, मैं तु्म्हें जानता हूं.)
समझा जाता है कि कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने अर्जेटीना में रहने वाली और स्पेनिश भाषा में लेख लिखने वाली अपनी मित्र विक्टोरिया ओकाम्पो को केंद्र में रख कर यह गीत लिखा था.

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बाद में सत्यजित राय ने अपनी फ़िल्म 'चारुलता' में इस गाने का इस्तेमाल किया.
उसी विक्टोरिया ओकाम्पो के साथ टैगोर की मुलाक़ात पर आधारित फ़िल्म बनाई जा रही है.
अर्जेंटीना के जाने माने फिल्मकार पाब्लो सीज़र ने अपनी अगली फिल्म का नाम 'थिकिंग ऑफ हिम ऑन रवीन्द्रनाथ टैगोर' रखा है. यह फ़िल्म टैगोर के प्रेम सम्बन्ध को बयां करेगी.

सीज़र शांति निकेतन में टैगोर के पढ़ाने के तरीके से काफ़ी प्रभावित हैं. इस फिल्म की शूटिंग इस साल फरवरी-मार्च में शुरू हो सकती है.
भारत में सूरज कुमार इस प्रोजक्ट से बतौर सहायक प्रोड्यूसर जुडे हैं. उनका कहना है कि यह फिल्म दोनों के 'प्लेटोनिक लव' (आध्यात्मिक प्रेम) को दिखाएगी.
इसकी शूटिंग भारत में शांतिनिकेतन में होगी. अर्जेंटीना में भी इस फिल्म का कुछ भाग शूट किया जाएगा. विक्टोरिया की भूमिका अर्जेंटीना की ही अभिनेत्री करेंगी.

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रवीन्द्रनाथ टैगोर जब विक्टोरिया से मिले थे, उनकी उम्र 63 थी और विक्टोरिया की उम्र तीस साल. वे शादीशुदा भी थीं.
टैगोर के भारत लौट आने के बाद भी वे दोनों ख़तों के ज़रिए एक दूसरे से जुड़े रहे.
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर श्यामा प्रसाद गांगुली का कहना है की 'बिजया' नाम से टैगोर का कविता संग्रह आया, जो उनकी इस मित्र को समर्पित था.

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टैगोर ने विक्टोरिया को यह कविता संग्रह साल 1926 में भेजा था.
विक्टोरिया की सचिव रह चुकी मरिया रेनकुरा को भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया था.
यह पुरस्कार उन्हें भारत और अर्जेंटीना के बीच रिश्तों को मजबूत करने के लिए किए गए काम पर दिया गया था.

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मारिया श्यामा प्रसाद गांगुली की दोस्त भी रही हैं.
गांगुली ने बताया की अर्जेंटीना की एक साहित्यिक पत्रिका 'सुर' निकला करती थी. उसमें टैगोर को लिखी विक्टोरिया की चिट्ठियां छपी थीं .
भारतीय मूल की अंग्रेजी की शिक्षक केतकी कुशारी डायसन ने टैगोर-विक्टोरिया के रिश्तों पर काफ़ी शोध के बाद एक किताब लिखी थी. इसका नाम था 'इन योर ब्लॉसमिंग फ़्लावर गार्डन'.

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गांगुली का कहना है कि टैगोर से जुड़े तमाम लोग भारत आए लेकिन विक्टोरिया कभी भारत नहीं आईं. हालांकि टैगोर ने कई बार भारत आने का आग्रह किया.
टैगोर ने लिखा था, "भुवन घुमिया शेषे, एसेछी तोमार देशे, आमि अतिथि तोमार द्वारे, ओ गो बिदेशिनी."
(पूरी दुनिया घूमने के बाद मैं तुम्हारे देश आया हूं, मैं तु्म्हारे दरवाज़े पर खड़ा हूं, ओ विदेशिनी)

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लेकिन विक्टोरिया कभी टैगोर के देश या उनके दरवाज़े पर उनकी अतिथि बनने नहीं आई.
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