गुलज़ार साहब का ख़ौफ़ था : शर्मिला टैगोर

इमेज स्रोत, AFP
- Author, विदित मेहरा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
"मैंने सैफ़ को गुलज़ार साहब के घर रहने भेजा था पर वो वहां से भाग गया."
ये कहना है अभिनेत्री शर्मिला टैगोर का.
उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला गुलज़ार निर्देशित फ़िल्म 'मौसम' के लिए.
शर्मिला ने गुलज़ार निर्देशित 'नमकीन' में भी काम किया. दोनों ही फ़िल्मों में उनके सह अभिनेता थे संजीव कुमार.
बीबीसी से एक ख़ास बातचीत के दौरान उन्होंने बताए गुलज़ार से जुड़े कुछ किस्से.
क़ायदे-कानून वाले गुलज़ार

गुलज़ार की शख़्सियत बयां करते हुए शर्मिला कहती हैं, "गुलज़ार जैसे दिखते हैं वैसे हैं नहीं. वो बहुत ही क़ायदे क़ानून वाले आदमी हैँ. हर वक़्त उनका ख़ौफ़ बना रहता था."
वो आगे कहती हैं," गुलज़ार समय के बड़े ही पाबंद हैं. अगर सेट पर कोई पांच मिनट भी लेट हो जाता था तो वातावरण में अजीब सी ख़ामोशी छा जाती थी. हालांकि वो वैसे बड़े ही हंसमुख इंसान हैं पर सबसे एक दूरी बनाकर चलते थे."
'अपने काम में मग्न रहते हैं'
गुलज़ार ने काफ़ी कविताएं लिखी हैं और उन्होनें मिर्ज़ा ग़ालिब को लेकर भी काफ़ी सारा शोध कार्य किया है.
पर गुलज़ार में वो ऐसी कौन सी ख़ास बात है जो उन्हेँ दूसरे गीतकारों और लेखकोँ से अलग करती है?
शर्मिला इस सवाल पर कहती हैं,"देखिए उनमें कोई ऐसी एक ख़ासियत नहीँ हैँ जिसकी वजह से वो दूसरोँ से अलग हों. गुलज़ार के शब्दों का चुनाव, उनके ख़्याल ही उन्हेँ सबसे अलग रखते हैं."
वो आगे कहती हैं,"वो पूरी तरह अपने काम में डूब जाते थे. एक दफ़े वो बता रहे थे कि वो कैसे एक ख़्याल में खो गए और वो रात भर उसके बारे में सोचते रहे. एक जगह पर आकर वो बार बार रुक जाते थे."
"उन्होंने सोचा कि अब सो जाता हूं कल सुबह उठकर इस बारे में सोचूंगा. अगले दिन जब वो सोकर उठे तो उन्होने उस रुकावट को पल भर में ही दूर कर दिया. इस हद तक वो अपने काम में मग्न रहते हैं."
'सैफ़ को सबसे पहले भेजा गुलज़ार के पास'

शर्मिला टैगोर के दोनों बच्चे सैफ़ अली ख़ान और सोहा अली ख़ान हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के सदस्य हैं.
पर अभिनेता सैफ़ अली ख़ान जब सबसे पहले मुंबई आए तो वो सबसे पहले मिले गुलज़ार से.
शर्मिला टैगोर बताती हैं, "मैंने सैफ़ को सबसे पहले मुंबई में गुलज़ार साहब के घर भेजा क्योंकि मैं उनको ही अच्छी तरह जानती थी. सैफ़ वहां कुछ दिन रुका और वो फिर वहां से भाग गया."
वो आगे कहती हैं,"मैंने जब सैफ़ से पूछा तो उसने कहा कि 'गुलज़ार साहब तो एकदम एकांतवासी हैं. मैं वहां नहीं रह सकता'. मैंने जब गुलज़ार साहब को इस बारे में बताया तो गुलज़ार बोले 'कोई नहीं बच्चा है वापस आ जाएगा'."
शर्मिला टैगोर ने हमसे बातचीत में अपने पसंदीदा गुलज़ार गीत को गुनगुनाकर भी सुनाया.
ये गाना है फ़िल्म ख़ामोशी का.
"हमने देखी है उन आंखों की महकती ख़ुशबू, हाथ से छूके इसे, रिश्तों का इल्ज़ाम न दो. सिर्फ़ एहसास है ये, रूह से महसूस करो, प्यार को प्यार ही रहने दो, कोई नाम न दो".
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