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कोरोना: 'मैं वायरस नहीं हूं, मैं कोलकाता में जन्मा हूं'
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, कोलकाता से
- प्रकाशित
कोलकाता में कोरोना वारयस के मरीज़ों की बढ़ती तादाद और इससे एक व्यक्ति की मौत होने के बाद 'मिनी चाइना' कहे जाने वाले कोलकाता के 'चाइना टाउन' इलाके में रहने वाले चीनियों का जीना दूभर हो गया है.
इनमें से ज़्यादातर लोग ऐसे हैं जो कभी चीन नहीं गए हैं. लेकिन बावजूद इसके इन लोगों को राह चलते स्थानीय लोगों की कटु टिप्पणियों का सामना करना पड़ रहा है.
नतीजतन इन लोगों ने घर से निकलना ही कम कर दिया है. अब आलम यह है कि कैमरा देखते ही यह लोग मुंह छिपाने लगते हैं और बात करने से भी मना कर देते हैं.
स्थिति यहां तक हो गई है कि कई लोगों ने अब अपनी टीशर्ट पर एक संदेश छपवाया है. इसमें कहा गया है कि 'मैं कोई कोरोना वायरस नहीं हूं. मेरा जन्म कोलकाता में हुआ है और मैं कभी चीन नहीं गया.'
चीनी मूल के भारतीय फ्रांसिस यी लेप्चा का परिवार तीन पीढ़ियों से कोलकाता के चाइना टाउन कहे जाने वाले टेंगरा इलाके में रह रहा है.
उनको इससे पहले अपने रंग-रूप की वजह से कभी जातिगत भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा था. लेकिन कोरोना वायरस का संक्रमण बढ़ने के बाद अक्सर स्थानीय लोग उनको कोरोना कह कर पुकारने लगे हैं.
ख़ासकर बीते दो सप्ताह के दौरान स्थिति काफ़ी बदल गई है. अब उनका चीनी मूल का होना ही उनका दुश्मन बन गया है.
ऐसी फ़ब्तियों से तंग आकर उन्होंने अपने टी-शर्ट पर ही लिखवा लिया है: "मैं कोई कोरोना वायरस नहीं हूं. मेरा जन्म कोलकाता में हुआ है और मैं कभी चीन नहीं गया."
फ्रांसिस बताते हैं, "मैं तो 100 फ़ीसदी चीनी भी नहीं हूं. मेरे दादा जी ने भारत आने के बाद दार्जिलिंग की लेप्चा जनजाति की एक लड़की से शादी की थी."
हाल में ओडिशा के पुरी के दौरे में उनको वहां और ट्रेन में ऐसी ही नस्लभेदी टिप्पणियों का सामना करना पड़ा. अपनी छुट्टियों आधी कर वो कोलकाता लौटे जिसके बाद उन्होंने टी-शर्ट पर उक्त बातें लिखवाईं.
उनकी देखादेखी कई अन्य लोगों ने भी यही तरीका अपनाया. फ्रांसिस को उम्मीद है कि शायद इससे स्थानीय लोगों की सोच बदले.
परेशान करने वाला माहौल
फ्रांसिस इस मामले में अकेले नहीं हैं. उनकी तरह 'चाइना टाउन' के कई युवक-युवतियों को भी हाल के दिनों में बस, मेट्रो या सार्वजनिक स्थानों पर ऐसी टिप्पणियां सहनी पड़ी हैं.
यहां रहने वाले ज़्यादातर चीनी लोगों का अब चीन से कोई वास्ता नहीं है. वह लोग कभी चीन भी नहीं गए हैं लेकिन अपने मंगोलीय स्वरूप की वजह से उनको नस्लभेदी टिप्पणियां झेलनी पड़ रही हैं. विडंबना यह है कि नेपाली मूल के अलावा पूर्वोत्तर राज्यों को कई युवक-युवतियों को भी चीनी जैसा दिखने की वजह से ऐसी ही टिप्पणियां सुनने को मिल रही हैं.
फ्रांसिस कहते हैं, "मैं दार्जिलिंग या पूर्वोत्तर के लोगों के लिए ज्यादा दुखी हूं. भारतीय नागरिक होने के बावजूद उनको पहले चिंकी कहा जाता रहा और अब सबको कोरोना के नाम से पुकारा जाता है."
'चाइना टाउन' का इतिहास
कोलकाता में चीनी समुदाय की जड़ें लगभग ढाई सौ साल पुरानी हैं. ब्रिटिश भारत के पहले गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के कार्यकाल के दौरान वर्ष 1778 में चीनियों का पहला जत्था कोलकाता से लगभग 65 किलोमीटर दूर डायमंड हार्बर के पास उतरा था.
बाद में उन लोगों ने कलकत्ता बंदरगाह में मज़दूरों के तौर पर काम शुरू किया था. उसके बाद रोजगार की तलाश में धीरे-धीरे और लोग कोलकाता आए और फिर वह लोग यहीं के होकर रह गए.
इन लोगों ने आगे चल कर डेंटिस्ट, चमड़े और सिल्क का व्यापार शुरू किया. कई चीनियों ने महानगर के पूर्वी छोर पर अपनी टैनरियां (चमड़े का कारखाना) भी खोल लीं.
एक चीनी नागरिक यांग ताई चो (जिन्हें लोग टोंग एच्यू के नाम से जानते हैं) उन्होंने यहां चीनी की फैक्टरी भी लगा ली थी. वह मूल रूप से चाय के व्यापारी थे.
वॉरेन हेस्टिंग्स ने कोलकाता से लगभग 30 किमी दूर बजबज इलाके में गन्ने की खेती और चीनी मिल लगाने के लिए उन्हें काफी जमीन किराए पर दे दी थी. ईस्ट इंडिया कंपनी के वर्ष 1778 के रिकार्ड के मुताबिक टोंग को हुगली के किनारे 45 रुपए सालाना पर लगभग 650 बीघा जमीन दी गई थी.
उसने फैक्टरी में काम करने के लिए धीरे-धीरे अपने गांव से दूसरे लोगों को भी बुला लिया. यह लोग मूल रूप से दो इलाकों में बसे. वह थे मध्य कोलकाता का तिरट्टी बाजार और पूर्वी छोर पर बसे टेंगरा में जो आगे चल कर 'चाइना टाउन' के नाम से मशहूर हुआ.
वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक़ कोलकाता में 1640 चीनी थे. लेकिन वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद तस्वीर बदलने लगी.
उस समय सैकड़ों चीनियों को यहां से वापस भेज दिया गया. बाकी लोग रोज़गार की तलाश में यूरोप औ अमेरिका का रुख करने लगे.
किसी जमाने में यहाँ चीनियों की आबादी 20 हजार से ज्यादा थी. लेकिन अब यह घट कर दो हज़ार से भी कम रह गई है.
80 साल के मिंग कहते हैं, "मिनी चाइना के नाम से मशहूर यह इलाका संक्रमण के गहरे दौर से गुजर रहा है. कभी यहां हमेशा चहल-पहल बनी रहती थी. लेकिन हाल के वर्षों में खासकर युवा लोगों के रोजगार की तलाश में पश्चिमी देशों में पलायन की प्रक्रिया तेज होने के कारण अब इसकी रौनक फीकी पड़ गई है."
दरअसल, बीते चार-पांच दशक से कोलकाता में रोज़गार के लगातार घटते अवसरों की वजह से ख़ासकर तमाम युवा किसी तरह विदेश जाने की जुगत में जुटे रहते हैं. हर महीने इनमें से कुछ लोग अमेरिका और कनाडा चले जाते हैं.
अब इलाके में चीनी व्यंजनों के कुछ रेस्तरां खाने-पीने के शौकीनों में काफ़ी लोकप्रिय हैं. लेकिन कोरोना की मार से तमाम ऐसे होटल और रेस्तरां बंद होने के कगार पर पहुंच गए हैं.
अब कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप ने इनका जीवन और मुश्किल बना दिया है लेकिन प्रतिकूल हालात में भी फ्रांसिस जैसे युवा स्थानीय लोगों की सोच को बदलने की पहल कर रहे हैं.
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