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सीरम इंस्टीट्यूट: कोविशील्ड के अलावा और कौन-कौन सी वैक्सीन बनाती है कंपनी?
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
पुणे स्थित 'सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड' के टीकों ने देश और विदेश में लोगों और ख़ास तौर पर बच्चों की जान बचाने का काम किया है.
इन टीकों में शामिल हैं- सांप के ज़हर को ख़त्म करने वाला टीका, डिप्थीरिया, टिटनस और परटूसिस यानी डीपीटी के टीके, तपेदिक से बचने वाले बीसीजी के टीके, मीज़ल्स, मंप और रूबेला यानी एमएमआर के टीके, रोटावायरस के टीके या फिर हेपेटाइटिस-बी के टीके.
सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया फिलहाल ख़बरों में इसलिए है क्योंकि उसने कोरोना वायरस के टीकों- कोविशील्ड का उत्पादन भी युद्ध स्तर पर किया और उन्हें भारत सरकार को सौंपना शुरू कर दिया है.
पुणे के मंजरी में जिस जगह कंपनी के कैंपस में आग लगने की घटना हुई वहाँ कोविशील्ड तो नहीं बल्कि तपेदिक और रोटावायरस के टीके बनते थे. कोविशील्ड जहाँ बन रही है वो जगह आग लगने वाली जगह से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर है.
आर्थिक नुकसान
कंपनी को इस घटना की वजह से काफी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा है. कंपनी के अधिकारियों ने समाचार एजेंसी एएनआई को कहा कि घटना की वजह से तपेदिक के बीसीजी के टीकों और रोटावायरस के टीकों के उत्पादन का काम प्रभावित हुआ है.
वहीं कंपनी के सीईओ अदार पूनावाला ने समाचार पत्र 'इंडियन एक्सप्रेस' को बताया कि आग की वजह से कोरोना वायरस की वैक्सीन के उत्पादन पर कोई असर नहीं पड़ा है.
सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया दरअसल कोरोना वायरस से लड़ने वाली ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन का भारत में कोविशील्ड के नाम से उत्पादन कर रहा है.
बाद में अदार पूनावाला ने ट्वीट कर कहा कि उनकी कंपनी के कैंपस में कई भवन मौजूद हैं जिन्हें इस तरह की आपातकालीन स्थिति में इस्तेमाल करने के लिए तैयार रखा गया है.
पुणे में वैक्सीन बनाने का काम तब से चल रहा है जब वर्ष 1966 में सायरस पूनावाला ने 'पूनावाला इन्वेस्टमेंट्स एंड इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड' नाम की कंपनी की स्थापना की थी.
सबसे ज़्यादा टीके बनाने वाली कंपनियों में एक
आज इसी कंपनी की अनुषांगिक इकाई -'सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड' ने अपनी पहचान विश्व में सबसे ज़्यादा टीके बनाने वाली कंपनियों में से एक के रूप में बना ली है. ये इंस्टीट्यूट सौ एकड़ के इलाके में फैला हुआ है.
अपनी वेबसाइट पर कंपनी ने दावा किया है कि दुनिया भर में क़रीब 65 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जिनको सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया का बनाया हुआ कोई न कोई एक टीका ज़रूर लगा है.
कंपनी का कहना है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन से मान्यता प्राप्त सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया की ओर से बनाए गए टीके विश्व के 170 देशों में लगाए जा रहे हैं जो उन देशों में चल रहे इम्यूनिटी प्रोग्राम का हिस्सा बन गए हैं.
कंपनी का कहना है, "सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया को भारत की सर्वश्रेष्ठ जैव-प्रौद्योगिकी कंपनी के रूप में रैंक किया गया है. कंपनी अत्याधुनिक जेनेटिक और सेल आधारित प्रौद्योगिकियों, एंटीसेरा और अन्य चिकित्सा विशिष्टताओं का उपयोग करके वैक्सीन जैसे अत्यधिक विशिष्ट जीवन रक्षक जैविक का निर्माण करती है."
जिस वैक्सीन के लिए सीरम इंस्टीट्यूट को जाना जाता है वो है पोलियो की वैक्सीन, जिसने दुनिया भर में चलाए जा रहे पोलियो उन्मूलन में बड़ी भूमिका निभाई है.
सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया का ये भी दावा है कि उसने 'वायरस हैंडलिंग' और टीकों के निर्माण की सुविधाओं और 'मोनोक्रोनियल एंटीबॉडी' के लिए 'रोबोट आर्म' स्थापित करके तकनीकी विकास में कई पड़ाव पार कर लिए हैं.
विकसित तकनीक
समय के साथ-साथ 'सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया' ने तकनीक को विकसित किया और अब उसका दावा है कि उसके एक से अधिक संयंत्रों में टीकों का उत्पादन करने की सुविधा विकसित हो गयी है. इसकी वजह से कम समय सीमा के अंदर बड़ी संख्या में इनका उत्पादन संभव हो गया है.
संस्थान का ये भी दावा है कि अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल की स्थिति हो या किसी महामारी का प्रकोप, टीकों के उत्पादन और उनकी आवश्यकता को पूरा करने के लिए उसके पास पर्याप्त तकनीक और संसाधन पूरी तरह से तैयार भी हैं और कार्यरत भी.
कोरोना वायरस महामारी के दौर में भी जिस तरह से सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया ने कोरोना वायरस से लड़ने वाली ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन पर काम करना शुरू किया और समय रहते उसे उपलब्ध भी करा दिया.
कंपनी के इस पहल से उसकी तारीफ़ भी हो रही है. सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया द्वारा कोरोना वायरस से लड़ने वाली ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका की वैक्सीन 'कोविशील्ड' ने ट्रायल के तीनों चरण पूरे कर लिए हैं और अब ये बड़े पैमाने पर कोविड काल के 'फ्रंटलाइन' कर्मियों के लिए उपलब्ध कराई जा रही है.
तो सवाल उठता है कि इतनी तादाद में अलग-अलग वैक्सीन का उत्पादन करते हुए सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया अपने उत्पाद की गुणवत्ता की निगरानी कैसे करता है?
इस पर कंपनी का कहना है कि सामान्य मानव दृष्टि के लिए किसी भी बारीक 'पार्टिकुलेट' पदार्थ की मौजूदगी को पता लगाने के लिए निरीक्षण किया जाता है और ये काम आधुनिकतम प्रौद्योगिकी 'स्क्रीनर' के माध्यम से किया जाता है.
सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया के अनुसार इन 'स्क्रीनर्ज़' को 'हाई रेजोल्यूशन' वाले सीसीडी कैमरों और 'इलेक्ट्रॉनिक' नियंत्रण 'पैनल' के साथ 'कॉन्फ़िगर' किया गया है. कंपनी का ये भी कहना है कि ये निरीक्षण पूरी तरह से 'ऑटोमेटिक' है जिसमें मानव त्रुटियों की संभावना कम या नहीं के बराबर है.
ग़लतफहमी दूर करने के लिए लगाई वैक्सीन
वर्ष 2011 में जेनेवा में हुए 'विश्व स्वास्थ्य सभा' के दौरान बिल गेट्स ने सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया के चेयरमैन सायरस पूनावाला की प्रशंसा 'वैक्सीन हीरो' के रूप में की.
इसी सभा में सायरस पूनावाला का कहना था कि सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया मेनिन्जाइटिस का जो टीका बनाता है वो विश्व भर में सिर्फ 50 सेंट में उपलब्ध है जिसे हर कोई ख़रीद सकता है. कंपनी का कहना है कि उसने जो टीके बनाए हैं वो दुनिया भर के ग़रीब देशों को मुफ़्त उपलब्ध कराए गए हैं ताकि लाखों बच्चों की जान बचाई जा सके.
इस बार भी जिस दिन सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया ने कोरोना महामारी से बचने के लिए कोविशील्ड वैक्सीन सरकार को सौंपा, उसी दिन कंपनी के सीईओ अदार पूनावाला ने खुद वैक्सीन लगवाई ताकि लोगों में इसे लेकर फैली भ्रांतियां दूर हो और डर ख़त्म हो सके और ज़्यादा से ज़्यादा लोग इस टीके को लगवाने के लिए आगे आएं.
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