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हाफ़िज़ सईद का संगठन जमात-उद-दावा बनाएगा राजनीतिक दल
- Author, रियाज़ सुहैल
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, कराची
- प्रकाशित
पाकिस्तानी संगठन जमात-उद-दावा के प्रवक्ता ने बीबीसी से बात करते हुए इस बात की पुष्टि की है कि उनके संगठन ने एक राजनीतिक पार्टी बनाने का फ़ैसला किया है. इसको लेकर विचार-विमर्श जारी है और जल्द ही इसकी घोषणा की जाएगी.
हालांकि, इस संगठन में जमात-उद-दावा प्रमुख हाफ़िज़ सईद की क्या भूमिका होगी और किन-किन दलों के साथ गठजोड़ किया जाएगा इन सवालों को लेकर कोई जवाब नहीं दिया गया है.
फिलहाल हाफ़िज़ सईद हैं नज़रबंद
जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफ़िज़ सईद इस समय पाकिस्तान में अपने कुछ साथियों समेत नज़रबंद हैं. उन्हें भारत प्रशासित कश्मीर में सक्रिय चरमपंथी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का संस्थापक माना जाता है. नवंबर 2008 में मुंबई हमलों के बाद संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने जमात-उद-दावा पर प्रतिबंध लगा दिया था.
यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया में प्रोफेसर और जमात-उद-दावा पर 'जिहाद-उद-दावा' नामक किताब लिखने वाली समीना यास्मीन का कहना है कि जमात-उद-दावा ने पिछले छह-सात सालों से ऐसे इशारे देना शुरू कर दिया था कि वह राजनीति में आना चाह रहे हैं.
वह कहती हैं, "जमात-उद-दावा केवल कश्मीर पर ही केंद्रित नहीं रहना चाहता है बल्कि वह राजनीति में आना चाहता है और इसके संकेत पहले से मिल रहे थे. पिछले दो-तीन सालों से और ज़्यादा संकेत देने शुरू कर दिए थे क्योंकि इसको लेकर उन्होंने बात शुरू कर दी थी. कई इस्लामी संगठनों के साथ उन्होंने बात की थी ताकि यह दिखाया जा सके कि राजनीतिक रूप से वह भी मौजूद हैं."
'जमात-उद-दावा का लोकतंत्र से रहा है मतभेद'
यास्मीन का कहना है कि जमात-उद-दावा का एक संकेत इस ओर से भी दिखता है कि इस संगठन ने नागरिकता के ऊपर बात करनी शुरू कर दी थी जो बिलकुल अलग था क्योंकि आज तक इसने राजनीति और नागरिकता पर बात नहीं की थी.
इस संगठन को राजनीतिक दल बनाने की ज़रूरत क्यों पड़ी इसका जवाब तो इस संगठन ने नहीं दिया लेकिन विश्लेषक डॉ. आएशा सिद्दीक़ी का कहना है कि इतिहास में जमात-उद-दावा का लोकतंत्र से मतभेद रहा है जिससे पता चलता है कि यह उनकी नहीं बल्कि उनके मेहरबानों की ज़रूरत है.
वह कहती हैं, "पहली बात तो यह है कि इनकी जो खेप है वह उनको और कामों में लगा रहे हैं और दूसरी बात यह कि इनकी जो छवि है, वह उसे बेहतर करने के लिए यह कर रहे हैं. इसके अलावा कोई वजह नज़र नहीं आती."
कल्याणकारी कामों के लिए भी है पहचान
जमात-उद-दावा का ज़िक्र जहां कथित तौर पर जिहादी गतिविधियों में आता है. वहीं, उसकी स्थानीय पहचान कल्याणकारी काम करने वाली संस्था के रूप में है. इसके संस्थान कराची और लाहौर समेत कई शहरों में मौजूद हैं जो शिक्षा और स्वास्थ्य के अलावा आपदा और दुर्घटनाओं में लोगों की सहायता करते हैं.
प्रोफ़ेसर यास्मीन का कहना है कि कई इलाकों में इस संगठन का असर मौजूद है और लोग जमात-उद-दावा को ही पाकिस्तान समझते हैं. वह कहती हैं, "इस संगठन ने अस्पताल, डिस्पेंसरी बनाई और आपदाओं के समय मदद की है. खाना न मिलने पर इन्होंने लोगों को खाना खिलाया है. उनकी दृष्टि से लोग इन्हें अपना नेतृत्व सौंपना चाहते हैं लेकिन पूरे देश के लोग जमात-उद-दावा या मिल्ली मुस्लिम लीग की ओर जाएंगे यह मुश्किल है."
कई वेबसाइटों पर जमात-उद-दावा के राजनीतिक दल का नाम मिल्ली मुस्लिम लीग मौजूद है जबकि जमात-उद-दावा के प्रवक्ता का कहना है कि दो-चार नामों पर ग़ौर किया जा रहा है और अभी अंतिम नाम तय नहीं किया गया है.
अहल-ए-हदीस पंथ का है पैरोकार
पाकिस्तान में मुस्लिम पंथों की बुनियाद पर कई दल मौजूद हैं, जिनमें अहल-ए-सुन्नतुल जमात, मजलिस-ए-वहदत-अल-मुस्लिमीन, सुन्नी तहरीक़ जैसे दल शामिल हैं. इसी तरह जमीयत उलेमा इस्लाम देवबंद पंथ का दल समझा जाता है.
जमात-उद-दावा अहल-ए-हदीस पंथ की पैरोकार है. डॉ. सिद्दीक़ी कहती हैं कि इस पंथ के पैरोकारों की पाकिस्तान में बड़ी तादाद मौजूद नहीं है. वह कहती हैं, "अहल-ए-हदीस से ज़्यादा पूरे पंजाब और अधिकतर पाकिस्तान में अहल-ए-सुन्नत जमात का वोट है. हर ज़िले में दस से पंद्रह हज़ार वोट इनका मिल जाएगा."
वहीं, पत्रकार और विश्लेषक सुबूक सैयद का कहना है कि जमात-उद-दावा ख़ुद राजनीति में आना चाहती है और कई संगठनों के साथ गठजोड़ करने की सोच रही है लेकिन हाफ़िज़ सईद के नज़रबंदी से लौटने के बाद ही इस पर फ़ैसला हो पाएगा.
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