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रोहिंग्या संकट: आख़िर सू ची की मजबूरी क्या?
- Author, मार्क विल्सन
- पदनाम, दक्षिण एशिया मामलों के जानकार
- प्रकाशित
बर्मा की नेता आंग सान सू ची पर रोहिंग्या मुसलमानों की हिफाज़त करने का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है.
रोहिंग्या मुसलमान, बर्मा के अल्पसंख्यक हैं और उनकी समस्या देश के रखाइन प्रांत में एक मानवीय संकट में तब्दील होती जा रही है.
इनकी तादाद दस लाख के करीब है और ये ज्यादातर गरीब लोग हैं. बर्मा का रखाइन सूबा बांग्लादेश की सीमा से लगता है.
बर्मा सरकार रोहिंग्या मुसलमानों को अपना नागरिक मानने से इनकार करती है. देश के भीतर भी एक बड़ा तबका उन्हें बांग्लादेश से आए अवैध शरणार्थी के तौर पर देखता है.
रखाइन में सरकारी सुरक्षा बलों और चरमपंथियों के बीच जारी हिंसा के चलते हाल के महीनों में तकरीबन 90 हज़ार रोहिंग्या मुसलमान अपना घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं.
इन चरमपंथियों को अराकन रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी के नाम से भी जाना जाता है.
सू ची का संघर्ष
ताजा दौर की हिंसा अगस्त में उस वक्त शुरू हुई जब चरमपंथियों ने 30 पुलिस चौकियों को निशाना बनाया. चरमपंथियों के इस हमले में 12 सुरक्षा कर्मी मारे गए.
सालों तक हिरासत में रहने के बाद सू ची 2015 में सत्ता में आईं थीं. दशकों तक सैनिक शासन में रहे बर्मा में लोकतंत्र बहाली के लिए उन्होंने लंबा संघर्ष किया था.
जब वे हिरासत में थीं तो उन्हें मानवाधिकार के लिए संघर्ष के प्रतीक के तौर पर देखा गया.
सत्तारूढ़ जुंटा सरकार के ख़िलाफ़ सू ची के संघर्ष के लिए उन्हें 1991 में नोबेल प्राइज़ दिया गया.
लेकिन अब जब उनके अपने ही मुल्क में उनकी अपनी ही सरकार के तले रोहिंग्या मुसलमानों के मानवाधिकार का सरेआम उल्लंघन हो रहा है तो ये सवाल पूछा जा रहा है कि आख़िर वे इतनी लाचार क्यों दिख रही हैं?
इसकी तीन वजहें हो सकती हैं.
पहला कारण: संवैधानिक सीमाएं
बर्मा में लोकतंत्र बहाली की प्रक्रिया को सैनिक शासन ने बड़े करीने से अंजाम दिया था. साल 2008 में फौज के जनरलों ने संविधान का मसौदा तैयार किया. इसमें ये साफ तौर पर लिखा गया कि बर्मा के सभी सुरक्षा बल आर्मी के कंट्रोल में रखेंगे.
इस दस्तावेज़ में किसी आंतरिक संकट की स्थिति में भी पुलिस की बजाय मिलिट्री को निर्णायक अधिकार दिए गए.
इसलिए जब रखाइन प्रांत में जारी संकट को सुलझाने की बारी आती है तो सू ची की सरकार की हैसियत मिलिट्री के बाद ही आती है.
यहां तक कि अगर सरकार अपने लिए कुछ सैनिक अधिकार चाहे भी तो उसे संविधान के मुताबिक ऐसे किसी कदम से पहले बर्मा की नेशनल डिफेंस एंड सिक्योरिटी काउंसिल से इसकी इजाजत लेनी होगी.
दूसरा कारण: सेना के कंट्रोल वाले मंत्रालय
मार्च 2016 में सू ची ने जब सरकार की लगाम थामी थी तो उन्होंने सत्ता मिलिट्री के साथ शेयर करने का वादा किया था.
व्याहारिक तौर पर सू ची के इस वादे का मतलब था कि सुरक्षा से जुड़े सभी अहम मंत्रालयों पर मिलिट्री का कंट्रोल होगा.
यानी ये तय हुआ कि बर्मा की सेना के जनरल गृह, रक्षा और सीमा मामलों से जुड़े मंत्रालय की कमान संभालेंगे.
और बर्मा की सेना के कमांडर-इन-चीफ़ सीनियर जनरल मिन ऑन्ग ह्लांग वो व्यक्ति हैं जो ये सारी जिम्मेदारियां देखते हैं.
रोहिंग्या संकट की शुरुआत में सू ची की सरकार ने एक प्रभावशाली स्टैंड लिया लेकिन जल्द ही ताकतवर सेना इस मुद्दे पर हावी हो गई और 4 सितंबर को रखाइन को मिलिट्री का ऑपरेशन एरिया घोषित कर दिया गया.
तीसरा कारण: राजनीतिक समर्थन बरकरार रखना
सू ची न केवल रोहिंग्या मुसलमानों के सवाल पर खामोश रहीं बल्कि उन्होंने हर वो कदम उठाया जिससे उनके बारे में ये न कहा जा सके कि वो रोहिंग्या मुसलमानों के मानवाधिकारों की वकालत कर रही हैं.
अप्रैल में उन्होंने रखाइव में सेना की भूमिका का एक तरह से समर्थन किया. सू ची ने बयान दिया कि रखाइन में किसी तरह की नस्ली हिंसा नहीं हो रही है.
उनके इस राजनीतिक समझौते की वजहें भी हैं. सू ची की सत्तारूढ़ पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी को सेना का राजनीतिक समर्थन मिलते रहना उनके लिए जरूरी है.
भले ही 2015 में उनकी पार्टी एक ऐतिहासिक बहुमत से सत्ता में आई थी लेकिन अप्रैल 2017 के उपचुनाव में उन्हें करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था.
अगर सू ची रोहिंग्या मुसलमानों का समर्थन करतीं तो उनकी पार्टी का बौद्ध समुदाय के बीच राजनीतिक जनाधार खिसक सकता था. बौद्ध देश की 90 फीसदी आबादी है.
फिलहाल तो ये एक ऐसा राजनीतिक सौदा दिखता है जो उन्हें मजबूरी में करना पड़ा है.
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