आप इस वेबसाइट का टेक्स्ट-ओनली वर्शन देख रहे हैं जो कम डेटा खर्च करता है. सभी तस्वीरों और वीडियो के साथ वेबसाइट का मुख्य वर्शन देखें.
ताकतवर शी जिनपिंग भारत के लिए ख़तरा या मौक़ा!
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने 19वें कांग्रेस में मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग को फिर से एक बार अपना नेता चुन लिया है. साथ ही शी जिनपिंग की विचारधारा को भी पार्टी ने अपने संविधान में शामिल कर लिया है.
इस तरह पार्टी ने उन्हें वही कद और सम्मान दे दिया है जो पार्टी के संस्थापक माओत्से तुंग और उनके बाद नेता बने देंग जियाओपिंग को मिला था.
शी जिंनपिंग के एक बेहद ताकतवर नेता के रूप में उभरने की घटना को वैश्विक स्तर पर बेहद अहम माना जा रहा है.
'शी जिनपिंग सिद्धांत' को एकमत से संविधान में शामिल करने के पार्टी के फ़ैसले को उनकी नई ताकत और देश की नीतियों पर और अधिक नियंत्रण के रुप में देखा जा रहा है.
बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने बीजिंग में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार अतुल अनेजा से बात की और पूछा कि इस घटना के क्या मायने हैं और दुनिया के बड़े देश, ख़ास कर भारत इससे कितना प्रभावित होगा? उनका विश्लेषण उन्हीं के शब्दों में -
शी जिनपिंग बने ताकतवर नेता
64 साल के शी जिनपिंग को उन नेताओं की श्रेणी में डाल दिया गया है जिसमें अब तक केवल माओत्से तुंग और देंग जियाओपिंग शामिल थे. 'माओ की विचारधारा' और 'देंग जियाओपिंग सिद्धांत' के बाद 'शी जिनपिंग सिद्धांत' को अब संविधान में शामिल किया गया था.
शी ने अपने सिद्धांत में चीन के सामने मौजूद 'मुख्य विरोधाभास' की बात की है. उन्होंने कहा है कि देश के सभी हिस्सों का विकास और देश के भीतर और बाहर नागरिकों के बेहतर जीवन के लिए काम किया जाएगा.
शी का कहना है कि एक तरफ चीन की दो इंटरनेट कंपनी और एक प्रॉपर्टी कंपनी के पास 30-30 बिलियन डॉलर की संपत्ति है तो दूसरी तरफ लाखों लोगों के लिए दिन में एक डॉलर की कमाई करना मुश्किल है. इसी फर्क को पाटना उनका उद्देश्य है.
'शी जिनपिंग सिद्धांत' को संविधान में शामिल करने के बाद शी के पास अब रणनीतिक तौर पर दो बड़े काम हैं-
पहला, चीन को राजनीति शक्ति के रूप में विकसित करने के अलावा साल 2021 तक इसे उदारवादी संपन्न देश बनाना. इसका मतलब है कि 2010 तक चीन का जो सकल घरेलू उत्पाद था उसे 2021 तक दोगुना करना. सरल शब्दों में कह सकते हैं कि चीन को दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाना.
2021 में कम्युनिस्ट पार्टी के सौ साल पूरे हो जाएंगे. इसके बाद दूसरे स्तर पर उन्हें 2035 तक चीन को इसी स्तर पर यानी इस विकास को बनाए रखना है.
और इसके बाद वो साल 2049 तक एडवान्स्ड सोशलिस्ट देश यानी सैन्य ताकत, अर्थव्यवस्था, संस्कृति में सबसे बड़ी शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहते हैं.
कैसे बनेगा चीन विश्व शक्ति?
जब दुनिया के सभी देश वैश्वीकरण से दूर हटने की बात कर रहे थे और सरकारी संरक्षण की बात कर रहे थे, तब शी जिनपिंग ने वर्ल्ड इकनॉमिक फ़ोरम में वैश्वीकरण का समर्थन किया था. हालांकि उनका कहना था कि ये वैश्वीकरण समावेशी होगा और सतत विकास की धारा पर होगा.
इसको हासिल करने के लिए शी ने 'वन बेल्ट वन रोड' का प्रस्ताव दिया है जिसके तहत मध्य एशिया, मध्य यूरोप से ले कर अफ्रीका तक के औद्योगीकरण का प्रस्ताव है. इस प्रस्ताव के अनुसार चीन के नेतृत्व में पूरे एशिया का विकास किया जाएगा.
चीन पहले ही इस कार्यक्रम के लिए पाकिस्तान को अपना सहयोगी बता चुका है. चीन ने चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर को 'वन बेल्ट वन रोड' के तहत एक मॉडल परियोजना के रुप में पेश किया है.
श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह बनाने के लिए चीन सहयोग कर रहा है. चीन मालदीव में ढांचागत सुविधाओं के विकास के लिए निवेश कर रहा है. चीन तिब्बत रेलवे को नेपाल सीमा तक बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.
नेपाल ने कहा है कि वो इसका हिस्सा बनने के लिए तैयार है और अब चीन उसके लिए एक बड़े मौके की तरह उभर रहा है.
चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर भारत के पड़ोसी देशों के नज़दीक से और साथ ही भारत प्रशासित कश्मीर से गुज़र रहा है. इस कारण भारत ने इसका विरोध किया है. भारत में मई के महीने में हुए 'वन बेल्ट वन रोड' फ़ोरम का बहिष्कार किया था.
वियतनाम और जापान के चीन से साथ तनावपूर्ण संबंध रहे हैं, लेकिन इन दोनों देशों ने इस कार्यक्रम के लिए अपने प्रतिनिधि भेजे थे.
भारत के लिए ये चुनौती है कि अब जब चीन और शक्तिशाली बन रहा है तो क्या वो चीन के नेतृत्व में होनेवाले इस विकास का हिस्सा बनेगा या आसियान, जापान और अमरीका के साथ मिल कर एक विकल्प बनाने की कोशिश करेगा. मुझे नहीं लगता कि भारत के पास इस मामले में अधिक विकल्प हैं.
भारत पर 'बेल्ट एंड रोड' का हिस्सा बनने का दबाव भी रहेगा और अगर वो इसका हिस्सा नहीं बनता है तो दक्षिण एशिया में उसके अलग-थलग पड़ने की काफी गुंजाइश है.
भारत के लिए ज़रूरी चीन के साथ सहयोग करना
भारत वैसे भी चीन के साथ कई मामलों में सहयोग करता है. चीन भारत में पूंजीनिवेश करता है और ये भारत के लिए बहुत अहम है.
चीन फिलहाल 11 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था है और अगर भविष्य में ये 2021-23 तक 18-19 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाती है (जैसा कि शी चाहते हैं) तो वो दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी. और निवेश के लिहाज़ से ये भारत के लिए महत्वपूर्ण होगा क्योंकि भारत को विकास के लिए निवेश चाहिए और फिलहाल अन्य देश यहां निवेश नहीं कर रहे हैं.
आज 12 मिलियन भारतीय नौकरियों की तलाश में हैं और भारत को इस निवेश की दरकार है. चीन पर भारत की निर्भरता से इंकार नहीं किया जा सकता.
चीन विश्व का केंद्र बनने जा रहा है और यूरोप खुद (जर्मनी को छोड़ कर) एक ऐतिहासिक पतन की तरफ़ जा रहा है तो भारत के पास रास्ते कहां है.
नेपाल की बात करें तो सांस्कृतिक तौर पर नेपाल भारत के नज़दीक है और ऐसे में उसके लिए भारत हमेशा एक ज़रूरी पड़ोसी तो रहेगा ही.
लेकिन ये भी याद रखें कि नेपाल को निवेश की बहुत ज़रूरत है. भारत ने नेपाल में उसकी उम्मीद के अनुरूप बहुत अधिक निवेश नहीं किया है और चीन में ये शक्ति है. नेपाल इसका लाभ उठा सकता है.
चीन बनेगा सैन्य ताक़त
शी ने ये भी कहा था कि चीन को वर्ल्ड क्लास मिलिटरी के रूप में तैयार किया जाएगा. चीन को सैन्य सुधारों की ज़रूरत भी है, लेकिन ये भी ज़रूरी है कि डोकलाम जैसे सीमा विवाद ना हों. और ये भी जानने वाली बात है कि जैसे-जैसे दोनों अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे पर अधिक से अधिक निर्भर करेंगी सीमा विवादों से भी ध्यान हटेगा और ये कम भी होंगे - इन दोनों बातों को अलग-अलग नहीं किया जा सकता.
कई चीनी टेलीकॉम कंपनियों ने भारत में निवेश किया है, अलीबाबा, पेटीएम और कई और व्यवसाय हैं जहां चीन का पैसा लगा है- इस बिज़नेस लॉबी ने भी डोकलाम विवाद को ख़त्म करने में अपनी छोटी-सी भूमिका निभाई है.
लेकिन देखा जाए तो भारत की कंपनियां अब तक चीन में निवेश नहीं कर पाई हैं. भारत को निवेश को कम करने की बजाय उसे बढ़ाने पर ध्यान देना होगा और इस दिशा में रिश्ते को परिपक्व करने के लिए दोस्ताना संबंध बढ़ाने होंगे ताकि स्थायित्व बढ़े.
शी जिनपिंग के बारे में ये बात भी सामने रही है कि वो माओ की तरह एक ताकतवर नेता बन कर आ रहे हैं. ऐसे में माओ की ग़लतियों (कल्चरल रिवोल्यूशन, ग्रेट लीप फॉरवर्ड) पर भी नज़र जाती है.
मुझे लगता है शी फॉरवर्ड लुकिंग एजेंडे के साथ आगे बढ़ रहे हैं और उन्हें शक की नजर से शी को देखना सही नहीं है.
क्या बेहतर होंगे चीन-अमरीका संबंध?
चीन और अमरीका के बीच बातचीत जारी है. नवंबर के महीने में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की चीन यात्रा को इस दिशा में बेहद अहम माना जा रहा है.
अमरीका की नज़र में चीन उत्तर कोरिया की तरफ़ जो करना चाहिए वो नहीं कर रहा, तो ऐसे दोनों देशों में तनाव बढ़ने की संभावनाएं हैं. ये अफगानिस्तान के स्तर पर भी हो सकता है.
चीन के पास मिसाइलें तो काफी हैं, लेकिन एयरक्राफ्ट कैरियर कम हैं. ऐसे में आज चीन के पास ऑफ़ेन्सिव ताकत कम ही है, लेकिन ये वक्त के साथ बदलेगा.
रूस-चीन के संबंधों को मिलेगी नई दिशा?
रूस के साथ चीन के बेहद अच्छे संबंध रहे हैं.
सोवियत यूनियन के विघटन के बाद पूर्व यूरोप और मध्य एशिया में सत्ताएं बदल रही थीं. माना जा रहा था कि पश्चिमी देश चाहते है कि इस इलाके में राजनीतिक अस्थिता और बढ़े और ईरान तक पहुंचे और फिर यूरेशिया में आए.
चीन और रूस इसे ख़तरा मानते हैं और दोनों देशों ने कोशिश की कि गद्दाफी के बाद और सत्ता पलटी (सीरिया में) ना जाए. दोनों समझते हैं कि सत्ता पलटने और कलर रेवोल्यूशन से बचना है. दोनों पहले ही 'बेल्ट एंड रोड' को ले कर सहमत हैं, ये परियोजना रूस से हो कर गुज़र रही है.
मेरा मानना है कि जहां सैन्य स्तर पर रूस आगे बढ़ रहा है वहीं आर्थिक स्तर पर चीन एक शक्ति के रूप में उभर रहा है- दोनों में तनाव अधिक नहीं दिखता और ये संबंध अस्थाई भी नहीं दिखता.
...तो चीन की तरफ झुक जाएगी दुनिया
अंतरराष्ट्रीय स्थिति को देखें तो रूस और चीन एक तरफ़ हैं और अमरीका एक तरफ़ है.
बहुध्रुवीय दुनिया की तरफ़ से अब दुनिया बाइपोलर वर्ल्ड की तरफ गति कर रही है- और ऐसे में अमरीका के संबंध रूस और चीन के साथ बेहतर हों ऐसी संभावना कम ही दिखती हैं.
ऐसा डर पहले ही है कि अमरीका अलग-थलग पड़ रहा है और ऐसे में विश्व में मिलिटरी बैलंस और पावर बदलने की गुंजाइश है.
(अतुल अनेजा से बीतचीत पर आधारित.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)