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नेहरू-पटेल और गांधी पर क्या बोली थीं जिन्ना की बेटी
- Author, डॉ. एंड्रूय व्हाइटहेड
- पदनाम, पूर्व बीबीसी इंडिया संवाददाता
- प्रकाशित
मोहम्मद अली जिन्ना की इकलौती संतान दीना वाडिया ने 98 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया.
दीना वाडिया मीडिया की चकाचौंध पसंद करने वाली हस्ती नहीं थीं. मैं बीते पांच साल से उनसे मिलने की कोशिश कर रहा था.
लेकिन आख़िरकार मुझे न्यू यॉर्क के मेडिसन एवेन्यू में स्थित उनके अपार्टमेंट में उनसे मिलने का मौका मिला.
ये साल 2002 की बात है. मैं अमरीका में 9/11 हमले की पहली बरसी को कवर करने पहुंचा था.
मेरी कोशिशों के चलते दीना मुझसे मिलने के लिए तैयार हो गईं. वह एक इतने आलीशान अपार्टमेंट में रहती थीं जिसकी लॉबी में भी बुलावे के बिना पहुंचना संभव नहीं होता है.
उन्होंने मुझे अपना इंटरव्यू रिकॉर्ड करने से मना कर दिया. ऑन-रिकॉर्ड कुछ भी कहने और तस्वीर खिंचवाने से इनकार कर दिया.
हालांकि, इंटरव्यू ख़त्म होने के बाद उन्होंने मुझे उनके पोर्टेट की तस्वीर खींचने दी जो कि साल 1943 में लंदन में पेंट की गई थी. तब वह नुस्ली वाडिया को जन्म देने वाली थीं.
लेकिन दीना वाडिया की मौत के बाद मैं गोपनीयता के बंधन से आज़ाद हो गया हूं. हालांकि, इस इंटरव्यू में उन्होंने ऐसी कोई बड़ी बात नहीं कही. लेकिन मैं फिर भी इसे साझा करना चाहता हूं.
जिन्ना जैसी थीं उनकी बेटी दीना
जब मैं दीना का इंटरव्यू लेने उनके फ्लैट पर पहुंचा तो उन्होंने ख़ुद ही दरवाजा खोला. लेकिन मैं उन्हें देखते ही अवाक रह गया.
ओठों पर लाल चमकदार लिपस्टिक, दुबली-पतली काया और चेहरे पर शाही परिवारों जैसे रुतबे के साथ वह जिन्ना की बेटी ही लगती थीं.
दीना ने मुझे अपनी ख़ूबसूरत मां रती पेटिट की तस्वीर दिखाई. दीना जब सिर्फ़ आठ साल की थीं तभी उनकी मां की मौत हो गई. ऐसे में दीना की परवरिश उनकी नानी ने ही की.
हालांकि, उनकी डेस्क पर उनके पिता की तस्वीर रखी हुई थी. पिता के बारे में बात करते हुए दीना के चेहरे पर झलकने वाले गर्व के भाव देखने वाले थे.
हालांकि, दोनों के बीच नेविल वाडिया के साथ दीना की शादी को लेकर तनाव भी रहा. वह बताती हैं कि जब जिन्ना मुस्लिम लीग की पाकिस्तान वाली डिमांड को मनवाने में सफल हो गए तो उन्होंने दीना को फोन करके कहा, 'हमने कर दिखाया.'
दीना को पाकिस्तान नहीं बॉम्बे पसंद था
दीना ने कभी भी पाकिस्तान को अपना घर नहीं बनाया.
उन्होंने मुझे बताया कि वह लंदन और न्यूयॉर्क में लंबा समय गुजार चुकी हैं लेकिन आज भी उनका अपना शहर बॉम्बे ही है.
वह अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए पाकिस्तान गईं. इसके साथ ही जिन्ना की बहन फ़ातिमा से दो बार मिलने गईं.
लेकिन साल 1967 में फ़ातिमा की मौत के बाद से मेरी मुलाक़ात के बीच उन्होंने पाकिस्तान की यात्रा नहीं की थी.
जिन्ना की भक्ति थी नापसंद
दीना बताती हैं कि उन्हें कई बार पाकिस्तान बुलाया गया लेकिन वह एक चिह्न की तरह इस्तेमाल नहीं होना चाहती थीं.
उन्होंने उन नेताओं की शिकायत की जिन्होंने उनके देश को लूट लिया. इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी दी कि किसी भी मुस्लिम देश में लोकतंत्र चलन में नहीं आ सका है.
हालांकि, हमारी मुलाक़ात के दो साल बाद वह कराची की यात्रा पर गईं और अपने पिता की कब्र पर भी पहुंची.
नेहरू को बरगलाना था आसान
दीना ने आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाले नेताओं पर भी अपनी राय जाहिर की.
उन्होंने बताया कि वह गांधी को याद करती हैं और जिन्ना भी उन्हें पसंद करते थे. लेकिन नेहरू का ज़िक्र आने पर वह कहती हैं कि नेहरू को बरगलाना आसान था. वहीं माउंटबेटन भरोसे के लायक नहीं थे.
हालांकि, उन्होंने सरदार पटेल को सीधी सपाट बातचीत करने वाला नेता बताया.
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