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ज़िम्बाब्वे: क्या रॉबर्ट मुगाबे बहुत आगे निकल गए थे?
- Author, टोमी ओलाडिपो
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग के अफ़्रीका में रक्षा संवाददाता
- प्रकाशित
ज़िम्बाब्वे में हुए तख़्तापलट के बाद दक्षिण अफ़्रीका के रक्षा मंत्री, राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे और सेना के उन जनरलों से मिल सकते हैं जिन्होंने मुगाबे को घर में नज़रबंद कर रखा है.
सूत्रों के मुताबिक़ मुगाबे कुछ शर्तों पर अड़े हुए हैं.
हालांकि ज़िम्बाब्वे में मौजूद बीबीसी संवाददाता ने बताया कि कोई भी मुगाबे को उनके पद पर देखना नहीं चाहता.
बर्ख़ास्त किए गए उपराष्ट्रपति इमरसन मनंगावा के गद्दी संभालने की पूरी संभावना है.
वहीं मुख्य विपक्षी पार्टी एमडीसी का कहना है कि वह अंतरिम सरकार का हिस्सा बनने पर विचार करेगी.
सेना ने कहा यह तख़्तापलट नहीं है
ज़िम्बाब्वे की सेना का कहना है कि उनकी कार्रवाई तख़्तापलट नहीं है. सेना अभी भी रॉबर्ट मुगाबे को कमांडर-इन-चीफ़ बता रही है, लेकिन मुगाबे के हाथ में कमान होती तो सेना के पास जब चाहे तब पासा पलटने का अधिकार कैसे होता.
परिभाषा के हिसाब से शायद इसे 100 फ़ीसदी तख़्तापलट न कहा जा सके, लेकिन ज़मीनी तौर पर इसका असर क़मोबेश वैसा ही है.
अफ़्रीका में अब तक जो होता आया है उसके हिसाब से सरकारी टीवी पर कब्ज़ा करना, सड़कों और हर अहम रास्ते पर सेना की मौजूदगी और राष्ट्रपति भवन में ज़बरदस्ती घुसना - ये सभी तख़्तापलट की तरफ़ इशारा करते हैं.
बस एक काम जो नहीं किया गया है - वह है संविधान को बर्ख़ास्त करना.
तख़्तापलट कहने से डरती है सेना
अफ़्रीका में लोकतंत्र को मज़बूत करने की कोशिशों के चलते सेना हिंसक तरीक़े से तख़्तापलट करने से बचती है.
यही वजह है कि अतीत में हुई ऐसी घटनाओं के दौरान तख़्तापलट के बाद जल्दी ही चुनाव कराने, लोकतांत्रिक तरीक़े से सरकार बनाने या सत्ता परिवर्तन के बारे में बातचीत करने के वादे किए गए.
ज़िम्बाब्वे की सेना ने अभी तक ऐसा कोई इशारा नहीं किया है जिससे लगे कि वह अब सरकार चलाना चाहती है.
माना जा रहा है कि सेना के पास इस काम के लिए एक आदमी है. हाल ही में पद से हटाए गए उपराष्ट्रपति इमरसन मनंगावा सेना के बड़े चहेते बताए जाते हैं.
पत्नी के उकसाने पर पद से हटाया
इमरसन ने ज़िम्बाब्वे की आज़ादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी. 1980 में उन्होंने रोडेशिया के बचे हुए सुरक्षा बलों, ज़िम्बाब्वे अफ़्रीकन नेशनल लिबरेशन आर्मी और ज़िम्बाब्वे पीपल रेवॉल्यूशनरी आर्मी को मिलाकर ज़िम्बाब्वे नेशनल आर्मी का गठन किया.
उन्हें राष्ट्रपति मुगाबे का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता था.
लेकिन मुगाबे ने पिछले हफ़्ते पत्नी ग्रेस मुगाबे के उकसाने पर मनंगावा को बर्ख़ास्त कर दिया था. ग्रेस सियासी महत्वाकांक्षाएं रखती हैं और सार्वजनिक रूप से मनंगावा की मुख़ालफ़त कर चुकी हैं.
लेकिन ग्रेस को ज़िम्बाब्वे की सेना का समर्थन हासिल नहीं है. ज़िम्बाब्वे की सेना आज़ादी की विरासत और उसमें शामिल लोगों का ज़्यादा सम्मान करती है.
क्या इस बार ज़्यादा आगे निकल गए मुगाबे?
सेना अब तक मुगाबे की सरकार का साथ देती रही क्योंकि वे भी स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा रहे हैं.
मुगाबे ने 2014 में भी पूर्व उपराष्ट्रपति जोइस मुजुरु को बर्ख़ास्त कर दिया था. मुजुरु भी स्वतंत्रता सेनानी रहे थे, लेकिन तब सेना ने ऐसी प्रतिक्रिया नहीं दी थी.
लेकिन इस बार शायद मुगाबे कुछ ज़्यादा ही आगे निकल गए.
मनंगावा का वापस लौटने का वादा
इस हफ़्ते की शुरुआत में ज़िम्बाब्वे के सेनाध्यक्ष जनरल कॉन्सटैंटिनो चिवेंगा ने सत्तारूढ़ ज़नू-पीएफ़ पार्टी को स्वतंत्रता सेनानियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई न करने की चेतावनी दी थी.
पद से हटाए जाने के बाद मनंगावा दक्षिण अफ़्रीका चले गए थे, लेकिन जाते वक़्त उन्होंने वादा किया कि वे मुगाबे से सत्तारूढ़ पार्टी का नियंत्रण वापस लेने के लिए लौटेंगे.
उनके इस आत्मविश्वास से लोगों ने अंदाज़ा लगाया कि उन्हें सेना का समर्थन हासिल था.
सेना का अगला क़दम
तो अब सेना का अगला कदम दिसंबर में होने वाली पार्टी बैठक से पहले बातचीत के ज़रिए मनंगावा की वापसी कराना होगा ताकि कांग्रेस में उन्हें राष्ट्रपति का उत्तराधिकारी घोषित किया जा सके.
दूसरी सूरत में ऐसा भी हो सकता है कि मुगाबे को इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर किया जाए. लेकिन स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान और उनके साथ अपने रिश्तों के मद्देनज़र सेना मुगाबे का और अपमान नहीं करना चाहेगी..
ग्रेस मुगाबे की हालिया कार्रवाई के बावजूद उनका सम्मान भी बनाए रखा जाएगा.
बीच में कुछ ख़बरें आ रही थीं कि सेना के बीच भी इस पर एक राय नहीं है, लेकिन इस हफ़्ते ऐसा कुछ सामने नहीं आया जिससे इस धारणा को बल मिले.
अगर कोई विरोधी धड़ा बना तो ख़ूनखराबा हो सकता है. ज़िम्बाब्वे के लोग नहीं चाहेंगे ऐसा हो क्योंकि पिछले कुछ सालों में वे वैसे भी काफ़ी मुश्किलें झेलते रहे हैं.
कितने लोकप्रिय हैं मनंगावा
मुगाबे शासन का अंत बहुत से लोगों के लिए ख़ुशख़बरी हो सकता है, लेकिन मनंगावा भी देश के हर हिस्से में लोकप्रिय नहीं हैं.
अस्सी के दशक की शुरुआत में बतौर रक्षा मंत्री मनंगावा ने मिडलैंड्स और मातेबेलेलैंड प्रांत में उठ रही विरोध की आवाज़ों को बल का इस्तेमाल करके दबा दिया था. कहा जाता है कि इस कार्रवाई में हज़ारों आम नागरिकों की मौत हो गई थी.
इससे जुड़ी बुरी यादें आज भी इलाक़े के लोगों के ज़ेहन में ताज़ा हैं.
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