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खाना पहुंचने वाले हुए एकजुट, ख़ुद बनेंगे अपने बॉस
- Author, मारियाना शेरिएबर
- पदनाम, बीबीसी ब्रज़ील
- प्रकाशित
ख़तरनाक परिस्थितियों में देर तक काम करने से थक चुके डिलीवरी बॉय ब्राज़ील में अब अपनी को-ऑपरेटिव बना रहे हैं ताकि बड़ी कंपनियों को चुनौती दे सकें.
कोविड -19 महामारी के दौरान भी उन्होंने काम पर जाना नहीं छोड़ा. उनके अधिकतर ग्राहक इस दौरान घरों के भीतर सुरक्षित ही रहे. ब्राज़ील में लॉकडाउन में फंसी ज़िंदगी को आसान बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले फूड डिलीवरी कुरियर का कहना है कि महामारी के दौरान उनकी कमाई पहले से बहुत कम हो गई है.
उबर ईट्स और ऐसे ही मोबाइल एप्स के लिए काम करने वाले इन फूड डिलीवरी कर्मचारियों ने बेहतर वेतन और काम करने की परिस्थितियों में सुधार की मांग करते हुए जुलाई में दो बार प्रदर्शन किए.
अपनी शुरुआती कामयाबी से इनके इरादे मज़बूत हुए हैं और ये कर्मचारी अब अपना फूड डिलीवरी एप बनाने की ओर बढ़ रहें हैं ताकि वो बिना किसी बॉस के काम कर सकें.
इन कर्मचारियों के नेताओं में से एक एडुआर्डो अल्बर्टो कहते हैं कि बड़ी कंपनियां बस अपनी जेब भरना चाहती हैं, उन्हें कर्मचारियों की बेहतरी से कोई मतलब नहीं है. वो परिस्थितियां बेहतर करना नहीं चाहते हैं.
रियो डी जनेरियो में आर्किटेक्चर के छात्र अल्बर्टो कहते हैं कि उनकी मांगों को मानने के लिए कंपनियां कुछ क़दम उठा सकती हैं, लेकिन असली बदलाव प्रबंधन को अपने हाथ में लेकर ही होगा.
एप्स के ख़िलाफ़ प्रदर्शन
एक जुलाई और 25 जुलाई को हुए प्रदर्शनों को ऑनलाइन ज़बरदस्त समर्थन मिला था और इनसे जुड़ा हैशटैग ट्विटर पर ट्रेंड्स में भी आ गया था.
पड़ोसी देशों अर्जेंटीना, पराग्वे और उरूग्वे के डिलीवरी कर्मचारी भी इस आंदोलन में शामिल हो गए हैं.
अपने आपको एंटी फ़ासिस्ट कूरियर्स कहने वाला ये आंदोलन ऐसे समय में खड़ा हुआ है जब घरों में रहने को मजबूर लोग अधिक ऑर्डर कर रहे हैं और कंपनियों का मुनाफ़ा बढ़ रहा है.
एक वित्तीय स्टार्ट अप मोबिलिस का विश्लेषण बताता है कि ब्राज़ील के लोगों ने लॉकडाउन के दौरान तीन एप पर किए गए ऑनलाइन फूड ऑर्डर पर जून में मार्च के मुकाबले दोगुना पैसा ख़र्च किया गया. ये एप हैं आईफ़ूड, उबर इट्स और रेप्पी.
दवाइयां पहुंचाने का काम करने वाली रैप्पी की बिक्री दोगुनी हो गई है. लेकिन लातिन अमरीका में आईफूड अपने 1 लाख 70 हज़ार डिलीवरी कर्मचारियों के साथ सबसे आगे है. इसके बाद कोलंबिया की एप रैप्पी और फिर उबर ईट्स का नंबर है.
अप्रैल में हुए एक सर्वे में 60 प्रतिशत डिलीवरी कर्मचारियों का कहना था कि उनकी आमदनी कम हुई है. उनका आरोप है कि कंपनी उनसे ज़्यादा काम ले रही हैं और कम पैसा दे रही हैं.
डिज़िटल लेबर के विशेषज्ञ और आंदोलन को समर्थन करने वाले राफ़ेल ग्रोमैन का कहना है कि एप का एल्गोरिथम कुछ इस तरह से बनाया गया होता है कि ये कर्मचारियों के मुकाबले कंपनी को ज़्यादा फ़ायदा पहुंचाता है.
इसके अलावा डिलीवरी कर्मचारियों को दूसरे कर्मचारियों जैसे लाभ भी नहीं मिल पाते हैं. जैसे कि सवेतन अवकाश और साल के अंत में मिलने वाला बोनस आदि. लातिन अमरीका में कर्मचारियों को दिसंबर में सालाना बोनस दिया जाता है.
ऐसे में आंदोलन के नेता अब कंपनियों का साथ छोड़कर अपना एप बनाने के विचार कर रहे हैं.
अल्बर्टा का कहना है कि वो फ्रांस स्थित कूपसाइकिल के संपर्क में हैं. ये यूरोप और कनाडा में कार्यरत तीस बाइक ऑपरेटरों का एक को-ऑपरेटिव है जो इन ऑपरेटरों के ख़र्च में कटौती करता है.
लेकिन ब्राज़ील के बाज़ार के लिए कूपसाइकिल के सॉफ़्टवेयर को उसके हिसाब से ढालना होगा.
ब्राज़ील में अधिकतर डिलीवरी कर्मचारी मोटरबाइक का इस्तेमाल करते हैं लेकिन पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं की वजह से कूपसाइकिल सिर्फ़ साइकिल चलाने वाले कर्मचारियों को ही जोड़ती है.
अल्बर्टा कहते हैं कि ब्राज़ील की ज़मीनी हक़ीकत यूरोप से काफ़ी अलग है.
एक और एप है मेनसाकास जो साल 2017 में बार्सीलोना में शुरू हुआ था. ये डेलीवेरू के कर्मचारियों की परेशानियों को हल करने के लिए बाज़ार में आया था लेकिन इसका प्रसार सीमित ही रहा.
ऐसे प्रयासों के सामने फंड की समस्या आती है और प्रतिद्वंदी बाज़ार में उनके लिए जगह बनाना मुश्किल हो जाता है.
किसी आसान और नई एप को बनाने में आम तौर पर साठ-सत्तर लाख रुपए ख़र्च हो ही जाते हैं.
हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि को-आपरेटिव अपने लिए जगह बना लेंगे अगर वो स्वतंत्र सप्लायरों का समर्थन करेंगे और कंपनियों की सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ी चिंताओं को भुनाएंगे.
सेनोरीटास कूरियर महिलाओं और एलजीबीटी डिलीवरी कर्मचारियों की को-ऑपरेटिव है. ये समूह साओ पाउलो में बाइक से डिलीवरी करता है और व्हाट्सएप और टेलीग्राम के ज़रिए ऑर्डर लेता है.
सेनोरीटास की संस्थापक एलिन ओस कहती हैं कि उनके पास ऐसे ग्राहकों का नेटवर्क है हमारे मूल्यों का समर्थन करते हैं जैसे वेगन ब्रांड या ऐसे ब्रांड जो महिलाओं या अफ्रीकी मूल के समुदायों का सम्मान करते हैं.
लेकिन सेनोरीटास को भी को-ऑपरेटिव बनने में वित्तीय दिक्कतों का सामना करना पड़ा है. वो पंजीयन शुल्क आदि के लिए 15 सौ डॉलर का चंदा जुटा रहे हैं.
हालांकि, एंटीफासिस्ट कूरियर्स वकीलों, अर्थशास्त्रियों, सॉफ्टवेयर इंजीनियरों आदि से मिल रही मदद पर भरोसा कर सकते हैं.
जब तक एप और को-ऑपरेटिव बन रही है, अल्बर्टो और उनके साथियों ने व्हाट्सएप पर ऑर्डर लेकर रियो में डिलीवरी शुरू कर दी है.
ये समूह फ़िलहाल खाने के अलावा अन्य चीज़ें भी डिलिवर कर रहा है क्योंकि खाना डिलीवर करने के लिए एडवांस में ऑर्डर लेना ज़रूरी है.
समूह से जुड़े पाउलो लीमा कहते हैं कि वो को-ऑपरेटिव स्थापित करने में पूरा समय ले रहे हैं ताकि काम सही से हो.
वो कहते हैं, हम अपनी सीमाओं को जानते हैं, हो सकता है हम शुरुआत किसी एक ही प्रांत से करें लेकिन विचार ये है कि इसे राष्ट्रव्यापी को-ऑपरेटिव बनाया जाए, और अगर संभव हो तो अंतरराष्ट्रीय भी.
वो कहते हैं कि समूह अर्जेंटीना, चिली, मैक्सिको, कोलंबिया के लोगों के संपर्क में हैं और वो देख रहे हैं कि आगे क्या होता है.
कंपनियों ने कर्मचारियों की मांगों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है. कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था द ब्राज़ीलियन एसोसिएशन ऑफ़ मोबीलिटी एंड टेक्नोलॉजी (एमोबीटेक) का कहना है कि महामारी की वजह से बहुत से लोग डिलीवरी के काम से जुड़ रहे हैं जिसकी वजह से रेट कम हुए हैं.
एक बयान में एमोबीटेक ने कहा है कि कोविड महामारी की वजह से, एप को लचीला बनाना ज़रूरी हो गया है ताकि हज़ारों लोगों को जोड़ा जा सके. डिलीवरी कर्मचारी, रेस्त्रां मालिक, व्यापारी, छोटे कारोबारियों के लिए वैकल्पिक आय के मौके बनाएं जाएं ताकि वो अपने परिवारों का खर्च चला सकें.
बयान में ये भी कहा गया है कि कंपनियों ने पार्टनर डिलीवरी कर्मचारियों की मदद करने के लिए कई क़दम उठाए हैं. इनमें संक्रमित कर्मचारियों के लिए अलग से बजट रखना, डिलीवरी कूरियर को सेनेटाइज़र और अन्य हाइजीन प्रॉडक्ट वितरित करना शामिल हैं.
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