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चीन को चित करने के लिए अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया का नया दाँव कितना कारगर?
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
हफ़्ते भर पहले अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से फ़ोन पर बात की और कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रखनी चाहिए.
दोनों नेताओं के बीच ये बातचीत सात महीने बाद हुई थी.
अमेरिकी राष्ट्रपति के इस क़दम को दोनों देशों के बीच ख़राब होते रिश्ते को पटरी पर लाने की कोशिश के तौर पर देखा गया.
उस बातचीत के एक सप्ताह बाद ही अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने एक साथ बेहद महत्वपूर्ण रक्षा समझौता किया है. इस करार के तहत रॉयल ऑस्ट्रेलियाई नौसेना के लिए परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों का निर्माण करने की बात कही गई है.
जानकार मानते हैं कि हिंद-प्रशांत महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती ताक़त और सैन्य मौजूदगी को लेकर अमेरिका चिंतित हैं. इस वजह से अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने ये करार किया है.
इस पर चीन की तरफ़ से प्रतिक्रिया भी आ गई है. वॉशिंगटन में चीन के दूतावास के प्रवक्ता ने कहा है कि 'तीसरे पक्ष के हितों को टारगेट करते हुए अलग ब्लॉक नहीं बनाना चाहिए'
इस साझेदारी के बाद ऑस्ट्रेलिया के पास पहली बार परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियाँ होंगी.
यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि ऑस्ट्रेलिया, परमाणु अप्रसार संधि के पक्ष में है. इस समझौते के बाद भी एक ग़ैर-परमाणु देश के तौर पर अपना दायित्व पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है.
क्या है 'ऑकस'
ऑकस यानी ऑस्टेलिया, यूके और यूएस. इन तीनों देशों के बीच हुए इस रक्षा समझौते को 'ऑकस' नाम दिया गया है.
इसमें आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी और साइबर साझेदारी भी शामिल है.
ऑकस सुरक्षा समझौते पर एक संयुक्त बयान जारी कर कहा गया है, "ऑकस के तहत पहली पहल के रूप में हम रॉयल ऑस्ट्रेलियाई नौसेना के लिए परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों का निर्माण करने के लिए प्रतिबद्ध हैं."
"इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा और ये हमारे साझा मूल्यों और हितों के समर्थन में तैनात होंगी."
इन पनडुब्बियों के मिलने के साथ ही ऑस्ट्रेलिया दुनिया के उन सात देशों की लिस्ट में शामिल हो जाएगा, जिनके पास परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियाँ होंगी.
इससे पहले अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, चीन, भारत और रूस के पास ही ये तकनीक थी.
ये पनडुब्बियाँ पारंपरिक रूप से संचालित पनडुब्बियों से ज़्यादा तेज़ होंगी और और इनका पता लगाना बेहद कठिन होगा.
ये महीनों तक पानी में डूबे रह सकते हैं और मिसाइलों से लंबी दूरी तक मार कर सकते हैं. ये समझौता इसलिए भी अहम है क्योंकि पिछले 50 सालों में अमेरिका ने अपनी सब-मरीन तकनीक, ब्रिटेन के अलावा किसी के साथ साझा नहीं की है.
फ़्रांस और चीन पर असर
बीबीसी के रक्षा मामलों के संवाददाता जोनाथन बील के मुताबिक़ इस समझौते का एलान तीनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने एक साथ वीडियो कांफ्रेंस के ज़रिए किया है.
ये इस बात को दिखाता है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के लिए कितनी अहमियत रखता है.
जोनाथन बील का कहना है कि इस समझौते का असर मुख्य रूप से दो देशों पर पड़ेगा. पहला है फ़्रांस और दूसरा है चीन.
दरअसल इस समझौते की वजह से ऑस्ट्रेलिया ने फ़्रांस के साथ किया एक सौदा रद्द कर दिया है.
साल 2016 में ऑस्ट्रेलियाई नौसेना के लिए फ़्रांसीसी-डिज़ाइन की 12 पनडुब्बियों के निर्माण का फ़्रांस को कॉन्ट्रैक्ट मिला था.
इस अनुबंध की लागत क़रीब 50 बिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर थी. यह सौदा ऑस्ट्रेलिया का अब तक का सबसे बड़ा रक्षा सौदा माना गया था.
इस लिहाज से देखें तो ये समझौता फ्रांस के लिए एक झटका है, जो अमेरिका का नेटो मित्र देश है.
फ़्रांस ने भी इस नए समझौते पर नपी तुली प्रतिक्रिया दी है. अमेरिका में फ़्रांसीसी दूतावास ने ट्वीट कर कहा है, "यह सौदा ऑस्ट्रेलिया के सामंजस्य की कमी को दिखाता है, जिसे फ्रांस केवल नोट कर सकता है और पछतावा व्यक्त कर सकता है."
इस समझौते का चीन पर क्या असर होगा, इस पर जोनाथन बील कहते हैं, "ब्रिटेन के अधिकारियों का मानना है कि ये रक्षा समझौता किसी एक देश की प्रतिक्रिया में नहीं है. ब्रिटेन ये भी कहता है कि ये इस क्षेत्र में सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करने और शांतिपूर्ण 'नियम आधारित' आदेश का समर्थन करने के लिए बना है. लेकिन सब जानते हैं कि ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया हिंद-प्रशांत में चीन के बढ़ते दबदबे को लेकर कितने चिंतित हैं.'
'क्वॉड' से कितना अलग है 'ऑकस'
ऑकस समझौते को लेकर एक सवाल ये भी उठ रहा है कि 'क्वॉड' समूह के होते हुए अमेरिका को इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी? क्वॉड में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया के साथ-साथ जापान और भारत भी है.
गज़ाला वहाब 'फ़ोर्स' मैग़जीन की कार्यकारी संपादक हैं. उन्होंने चीन पर 'ड्रैगन ऑन ऑवर डोरस्टेप' नाम की किताब भी लिखी है.
बीबीसी से बातचीत में वो कहती हैं कि 'ऑकस' को दो नज़रिए से समझने की ज़रूरत है.
"ऐसा प्रतीत होता है कि क्वॉड से अलग हटकर ऑस्ट्रेलिया के साथ इस तरह के समझौते का मक़सद एक तरह से 'मिलिट्री एलायंस' शुरू करना है."
"क्वॉड को भी चारों देशों के बीच 'सैन्य सहयोग' के नज़रिए से बनाया गया था, लेकिन उसमें 'हाई-टेक्नोलॉजी' ट्रांसफ़र की बात नहीं की गई थी. अगर क्वॉड में ऐसे समझौते होते तो फ़ायदा भारत को भी मिलता. इस वजह से ऑकस को क्वॉड से अलग रखा गया है."
गज़ाला का मानना है 'ऑकस' का मंच 'मिलिट्री एलायंस' का मंच है, जिसमें अमेरिका और ब्रिटेन पहले से साथ थे. अब ऑस्ट्रेलिया भी जुड़ गया है.
वो ये भी मानती है कि क्वॉड देशों का पूरी तरह से एक दूसरे के साथ 'मिलिट्री एलायंस' बनना थोड़ा मुश्किल लगता है. इसकी वजह भारत और जापान की हिचक है.
"अमेरिका से नज़दीकी के साथ-साथ भारत, रूस और ईरान के साथ भी संबंध बनाना चाहता है. भारत से ज़्यादा जापान झिझक रहा है. जापान का चीन के साथ अच्छा व्यापारिक रिश्ता है. चीन को जापान से बीआरआई परियोजना में भी मदद मिल रही है. इसलिए जापान, चीन के साथ अपने सारे संबंध ख़त्म नहीं करना चाहता है. इस वजह से क्वॉड में कई दूसरे फ़्रंट पर सहयोग की बात भी हो रही है. जैस हाल ही में कोविड वैक्सीन को लेकर हुआ."
ऑकस के एलान के बाद क्वॉड देशों के राष्ट्राध्यक्षों का शिखर सम्मेलन 24 सितंबर को अमेरिका में होना है, जिसमें हिस्सा लेने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जा रहे हैं.
क्वॉड को चीन ख़ुद ही अपने ख़िलाफ़ एक मंच मानता है.
ऑकस की ज़रूरत क्यों है?
ऑस्ट्रेलिया और चीन के रिश्ते इस समय बुरे दौर में हैं.
दक्षिण चीन सागर, पश्चिम प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव और भारत के साथ चीन के तल्ख़ होते रिश्तों के बीच ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने इस साल जुलाई में अपने सैन्य ख़र्च में बड़ी बढ़ोतरी करने का फ़ैसला भी लिया था.
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने एलान किया था कि वो अगले 10 साल में सेना का बजट 270 अरब ऑस्ट्रेलियन डॉलर करेंगे. ये पहले के मुक़ाबले 40 फ़ीसदी की वृद्धि है.
दक्षिण चीन सागर का इलाक़ा हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच है और चीन, ताइवान, वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया, ब्रुनेई और फिलीपिंस से घिरा है.
गज़ाला कहती हैं, "ऑस्ट्रेलिया का सीधे दक्षिण चीन सागर से कोई सरोकार नहीं है. उसकी चिंता पश्चिम-प्रशांत क्षेत्र की ज़्यादा है. इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को पश्चिमी देश अपने लिए ख़तरा ज़रूर मानते हैं. उन्हें लगता है कि चीन समुद्री महाशक्ति बनने के साथ-साथ इस इलाक़े में अपनी 'विस्तारवाद' की रणनीति पर काम कर रहा है. ऑस्ट्रेलिया और चीन आपस में समुद्री सीमाएँ साझा करते हैं. अगर हिंद- प्रशांत क्षेत्र में आज चीन की पनडुब्बी घूम रही है, तो आने वाले दिनों में पश्चिमी-प्रशांत क्षेत्र में भी आ सकती है. इस वजह से भविष्य में ऑस्ट्रेलिया का अपने इलाक़े में दबदबा कहीं कम न हो जाए."
ऑस्ट्रेलिया और चीन के रिश्ते
चीन और ऑस्ट्रेलिया के बीच कभी अच्छे व्यापारिक संबंध हुआ करते थे. लेकिन हाल के दिनों में ये काफ़ी ख़राब हुए हैं.
हाल के दिनों तक चीन ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा है. दोनों देशों के बीच 2019 में 195 अरब डॉलर का कारोबार हुआ था, लेकिन बीते तीन सालों में इनके आपसी रिश्ते बिगड़े हैं.
इसकी शुरुआत साल 2018 में तब हुई थी, जब ऑस्ट्रेलिया ने चीनी कंपनी ख़्वावे के 5जी नेटवर्क पर प्रतिबंध लगा दिया था और ऐसा करने वाला वह पहला देश था.
इसके बाद पिछले साल रिश्ते तब और ख़राब हो गए, जब ऑस्ट्रेलिया ने विश्व समुदाय से कोविड-19 के लिए चीन की स्वतंत्र रूप से जाँच करने को कहा था. ऑस्ट्रेलिया क्वॉड समूह का भी हिस्सा है, जिसे चीन अपने ख़िलाफ़ बनाया गुट मानता है.
इस साल अप्रैल के महीने में ऑस्ट्रेलिया ने चीन के साथ उसकी महत्वाकांक्षी 'बेल्ट एंड रोड' परियोजना से जुड़े दो समझौते भी रद्द कर दिए थे.
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