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शिमला के गांव से भारतीय क्रिकेट टीम तक का सफ़र
- Author, पंकज शर्मा
- पदनाम, शिमला से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
- प्रकाशित
हिमाचल प्रदेश के छोटे से गांव से भारतीय महिला क्रिकेट टीम की खिलाड़ी सुषमा वर्मा के संघर्ष से कामयाबी की कहानी बेहद दिलचस्प है.
वो भारतीय टीम में विकेटकीपर-बैट्समैन के तौर पर खेलती हैं.
शिमला से क़रीब सौ किलोमीटर दूर गढ़ेरी गांव की सुषमा को बचपन से ही खेलों से लगाव था.
बेहद कठिन और दुर्गम इस पहाड़ी इलाक़े में खेल और सुविधाओं का अभाव था. इसके बाबजूद भी सुषमा ने अपने जीवन का लक्ष्य खेल को ही चुना.
सरकारी स्कूल से...
सुषमा वर्मा के पिता भोपाल सिंह वर्मा कहते हैं, "माँ-बाप का सपना होता है कि हमारे बच्चे कुछ बन जाएं. जब बच्चों से माँ बाप की पहचान बन जाए तो ये सबसे बड़ा सौभाग्य होता है. बेटी के शौक़ को देख कर मैंने उसके लिए कम खर्चे में परिवार की ज़रूरतों को पूरा करके उसके सपने को सच करने की हर संभव कोशिश की."
शिमला के सुन्नी तहसील के एक सरकारी स्कूल में सुषमा ने वॉलीबॉल को अपना करियर चुना. इस खेल में नेशनल खेलने के बाद सुषमा रुकी नहीं.
सुषमा के हुनर का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि सुषमा ने वॉलीबॉल के साथ-साथ हैंडबॉल और वाटर पोलो में भी नेशनल खेला.
ऑलराउंडर सुषमा
उनके खेल के बारे में बताते हुए उनके स्कूल कोच सतदेव शर्मा बताते हैं कि स्कूल में जब लड़कों की क्रिकेट मैच की टीम बनी तो सुषमा ने क्रिकेट खेलने की इच्छा जताई और एक महीने की मुश्किल प्रैक्टिस और अपने खेल से सुषमा ने सबको प्रभावित किया.
सतदेव शर्मा कहते हैं, "इसमें कोई शक नहीं है जब वो वॉलीबॉल खेलती थीं तो अकेले अपने दम पर उन्होंने कई मैच जिताए. वो ऑलराउंडर थीं. यहाँ पहले कपड़े के बॉल से क्रिकेट खेलते थे. तो मैंने लेदर बॉल से लड़कों को क्रिकेट खेलाना शुरू किया. तो सुषमा बोलीं कि मुझे भी आप के साथ खेलना है और उसने बैटिंग के साथ-साथ विकेट कीपिंग भी शुरू की. वो यहाँ से वॉलीबॉल छोड़ क्रिकेट में आईं जो सुषमा का एक बड़ा टर्निंग प्वाइंट बना."
दमदार खेल
ये एक ऐसा मौक़ा था जहाँ से सुषमा ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.
2009 में शिमला में हिमाचल क्रिकेट एसोसिएशन के ट्रायल में सुषमा ने अपने दमदार और उम्दा खेल से टीम हिमाचल में जगह पाई.
इसके बाद 2013 में घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन कर सुषमा वर्मा ने भारतीय क्रिकेट टीम में जगह बनाई.
भोपाल सिंह वर्मा कहते हैं, "वर्ल्ड कप के लिए खेलना एक बड़ी बात है. इस ख़ुशी को बयान नहीं कर सकता, मुझे पूरी उम्मीद है कि हम वर्ल्ड कप जीतेंगे."
गांव के लिए गर्व की बात
महिला क्रिकेट को लेकर आज देश की जनता की सोच में अचानक से एक बदलाव नज़र आ रहा है.
हाल के दिनों में क्रिकेट प्रशंसक महिला क्रिकेट में काफ़ी दिलचस्पी दिखा रहे हैं.
सुषमा के गाँव के निवासी सुरेंद्र वर्मा बताते हैं कि ये उनके लिए एक गर्व का क्षण है कि एक छोटे-से गाँव की लड़की आज इतने बड़े मुक़ाम पर पहुँची है.
वो बताते है, "जब सुषमा छोटी थी तो वो हमारे साथ आकर खेलती थी. आज वो देश के लिए खेल रही है. ये हमारे गांव के लिए बहुत बड़ी बात है."
2005 के बाद ये दूसरा मौका है. जब भारतीय महिला क्रिकेट टीम वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में पहुँची है.
इन महिला खिलाड़ियों ने ये साबित किया है कि वो किसी से कम नहीं हैं और अपनी मेहनत और काबिलियत की बदौलत वो पूरी दुनिया में एक अलग पहचान बनाने का माद्दा रखती हैं.
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