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सोने की तलाश में इस नदी की ख़ाक छान रहे हैं लोग, कितनी होती है कमाई
- Author, मोहम्मद सरताज आलम
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
झारखंड में एक ऐसी नदी बहती है, जो इस बात के लिए जानी जाती है कि उससे सोना निकलता है. इस नदी का नाम स्वर्णरेखा है. रोज़ाना सैकड़ों लोग इस उम्मीद में इसकी ख़ाक छानते हैं कि उन्हें सोना मिल जाए.
कुछ लोगों को सोना मिलता तो है, लेकिन वह कोई ऐसा टुकड़ा नहीं होता, जिसे बेचकर वे हज़ारों या लाखों रुपये की कमाई कर सकें.
उनकी आमदनी महज़ कुछ सौ रुपये तक ही सीमित रहती है.
रांची ज़िले के नगरी गांव के 'रानी चुआं' से निकलकर बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली स्वर्णरेखा नदी लगभग 474 किलोमीटर की दूरी तय करती है.
दरअसल, इस नदी का केवल एक हिस्सा ऐसा है, जहां लोगों को सोने के कण मिलते हैं.
यह इलाक़ा जमशेदपुर शहर से लगभग 17 किलोमीटर दूर पड़ोसी ज़िले सरायकेला-खरसावां के चांडिल ब्लॉक में स्वर्णरेखा नदी के किनारे बसा है.
इस नदी के किनारे कई जगहों पर गांव वाले, बहकर आए बालू और मिट्टी से सोने के कणों को निकालकर वर्षों से अपनी जीविका चलाते आ रहे हैं.
इन स्थानों में से एक गौरी गांव है, जिसके 20 किलोमीटर के दायरे में फैले दर्जनों गांवों के ग्रामीण हर सुबह सैकड़ों की संख्या में नदी के तट पर जुटते हैं.
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता दुखु महाली बताते हैं, "लगभग पांच सौ ग्रामीणों के लिए सोने के ये कण उनकी आजीविका का साधन हैं."
आदिवासी बहुल इस इलाक़े में आजीविका के लिए एक तबका सब्ज़ियों की खेती पर निर्भर है, लेकिन जिन लोगों के पास खेत नहीं हैं, वे रोज़गार का कोई साधन न होने पर इस काम में जुट जाते हैं. दुखु महाली कहते हैं कि सोने के इन कणों की चमक के पीछे अत्यधिक शारीरिक कष्ट और अनिश्चित आय का एक लंबा व दर्दनाक सिलसिला छिपा है.
सोना तलाशने वाले ग्रामीणों का अनुभव
सोना निकालने का यह काम देखने में जितना सहज लगता है, हक़ीक़त में उतना ही मुश्किल है. कड़ी धूप में नदी के किनारे गड्ढों में घुटनों के बल झुककर घंटों मिट्टी धोने की प्रक्रिया शरीर को तोड़कर रख देती है.
पुड़िसिली गांव की 60 वर्षीय बुज़ुर्ग महिला ढांगी सरदार वर्षों से यह काम करती आ रही हैं.
जब हम उनसे मिले तो वह हमें जामुन की लकड़ी से बने गहरे सूपनुमा सांचे में मौजूद मिट्टी से सोने के कण अलग करने की मुश्किल प्रक्रिया में जुटी दिखाई दीं.
ढांगी सरदार कहती हैं, "मिट्टी जब खोदकर इस सूपनुमा सांचे में डालते हैं, थोड़ा हिलाते हैं, तब अंत में एक-दो कण धुलकर सोना मिलता है."
दरअसल, लकड़ी का एक आयताकार सांचा होता है, जो बीच में हल्का गहरा होता है. पानी के बहाव और हिलाने से हल्की मिट्टी और बालू बह जाती है, जबकि सोना भारी होने के कारण बर्तन के नीचे या तली में बैठ जाता है.
दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद जब ये ग्रामीण शाम को अपने घरों को लौटते हैं, तो शरीर का हर हिस्सा दर्द से कराह रहा होता है.
ढांगी सरदार आगे बताती हैं, "बहुत दर्द रहता है, पैर में, पीठ में, हाथ में. दवा खाते हैं, तब ठीक होता है."
इस क्षेत्र में सोने के कण क्यों मिलते हैं?
इस सवाल का जवाब जानने के लिए बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने सरायकेला-खरसावां ज़िले के खनन अधिकारी ज्योति शंकर सथपति से बात की.
वह कहते हैं, "स्वर्णरेखा नदी जब तमाड़ से होकर गुज़रती है, तो वहां कई ऐसी चट्टानें हैं, जिनमें थोड़ी मात्रा में सोना भी मौजूद है. इन चट्टानों से कटकर निकलने वाली मिट्टी और तलछट पानी के साथ बहती हुई कई स्थानों पर नदी के किनारे जमा हो जाती है. इसे प्लेसर डिपॉज़िट कहा जाता है."
गौरी गांव के पास नदी के किनारे लगभग डेढ़ किलोमीटर के क्षेत्र में ऐसे प्लेसर डिपॉज़िट पाए जाते हैं.
खनन अधिकारी सथपति के अनुसार, यह सोना बिल्कुल शुद्ध अवस्था में होता है.
वह कहते हैं, "यह सोना किसी भी तत्व के साथ संयुक्त अवस्था में बिल्कुल नहीं होता. इस वजह से यह शुद्ध अवस्था में मिलता है. पानी के साथ बहकर आने के कारण इसकी मात्रा गौरी तक पहुंचते-पहुंचते बहुत कम हो जाती है."
कड़ा संघर्ष और अनिश्चित आय
स्वर्णरेखा नदी के किनारे सोना तलाशने वाले ग्रामीणों के लिए कोई-कोई दिन अच्छा होता है, लेकिन कुछ ऐसे भी दिन होते हैं, जब मेहनत तो बहुत करनी पड़ती है, मगर कुछ हाथ नहीं लगता.
घंटों पसीना बहाने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि अंत में कुछ हासिल होगा ही.
गौरी गांव के 65 वर्षीय बुज़ुर्ग बोका कुम्हार अपने जीवन के इस लंबे संघर्ष को बयान करते हैं.
वह कहते हैं, "सोना कभी मिलता है, कभी नहीं मिलता है, फिर भी हम लोग दिनभर मेहनत करते हैं."
सोने के कुछ कण निकालने में कामयाब बोका कुम्हार आगे कहते हैं, "फाली यानी सांचे में जो ये सुनहरे कण मिले हैं, उनको मैंने एक कटोरे में अलग कर लिया है. यही आज की मेहनत का फल है."
यह संघर्ष सिर्फ़ गौरी या पुड़िसिली गांव तक सीमित नहीं है. दूर-दराज़ के गांवों से भी लोग कई किलोमीटर का सफ़र तय करके नदी तट पर पहुंचते हैं.
यहां चालियांवा गांव से आए 41 वर्षीय युवक मिल्हड़ सिंह मानते हैं कि इस काम से रोज़ तय आय होना नामुमकिन है.
मिल्हड़ सिंह कड़े परिश्रम के बाद निकाले गए सोने को दिखाते हुए कहते हैं, "निकला हुआ यह सोना लगभग तीन सौ रुपये का है. लेकिन यह तय नहीं कि हर दिन 300 रुपये की आय हो."
कैसे होती है इस सोने की बिक्री?
संसाधनों की कमी और आय की अनिश्चितता के बावजूद इन ग्रामीणों के बीच सोना तलाशने को लेकर किसी तरह की होड़ या आपसी रंजिश नहीं दिखती.
लगभग 20 किलोमीटर के दायरे में फैले दर्जनों गांवों के सैकड़ों ग्रामीण एक साथ सोना निकालते हैं. वे न सिर्फ़ एक-दूसरे का सम्मान करते हैं, बल्कि सोना ढूंढने की इस मशक्कत में हाथ भी बंटाते हैं.
उन्हीं में से एक चालियांवा गांव के 42 वर्षीय गुरुपदो सिंह बताते हैं कि वे लोग सोना निकालने वाली जगह की पहचान कैसे करते हैं.
वह कहते हैं, "ग्रामीण सबसे पहले उस स्थान का चयन करते हैं, जहां पानी के बहाव से पत्थर और बालू के साथ मिट्टी आकर किनारे जमा होती है."
ग्रामीण पहले पत्थर हटाते हैं, फिर बालू की परत पर खोदाई करके मिट्टी की सतह तलाश करते हैं.
यह वही मिट्टी है, जो पानी के साथ सोने के कणों को बहाकर ले आती है.
गुरुपदो मिट्टी की तरफ़ इशारा करके कहते हैं, "इस मिट्टी को फाली में लेकर पानी से धीरे-धीरे धोते हैं. इससे मिट्टी पानी के साथ बह जाती है, जबकि सोना फाली की गहराई में बैठ जाता है."
ग्रामीण सोने के इन कणों को पानी की सहायता से एल्युमिनियम के कटोरे में रखते हैं और पहले धूप में सुखाते हैं.
बोका कुम्हार कहते हैं, "कटोरे में मौजूद नमी सोने को छोड़कर उड़ जाएगी, तब सोने के ये कण काग़ज़ में रख लेंगे."
सोने के कणों को काग़ज़ पर रखते हुए गुरुपदो बताते हैं कि यहां सोना बहुत नहीं निकलता, बल्कि निकला हुआ सोना कभी सौ तो कभी दो सौ रुपये का ही बिक पाता है.
वह कहते हैं, "बहुत कम होता है कि सोने की क़ीमत तीन सौ रुपये या उससे अधिक मिले."
यहां के ग्रामीण बताते हैं कि निकाले हुए सोने के कणों को बेचने की प्रक्रिया भी अलग है.
इसे विस्तार से बताने में हिचकिचाते हुए गुरुपदो कहते हैं, "इसकी बिक्री पॉइंट पर निर्भर है. प्रति पॉइंट के लिए दुकानदार एक सौ बीस रुपये देते हैं. यानी सोने का जितना पॉइंट, उसी के अनुसार पैसा मिलता है."
अनिश्चित कमाई के बाद भी यह काम क्यों?
इस काम में लगे ग्रामीणों को रोज़ाना सोना नहीं मिलता. फिर वे ऐसे अनिश्चित काम में घंटों समय क्यों लगाते हैं?
इस सवाल पर ग्रामीण रोहिन सिंह कहते हैं, "यहां कोई काम-धंधा नहीं मिलता. ऐसे में जब हाथ में यह हुनर है, तो घर में बैठकर क्या करेंगे. यहां आने पर 200-300 रुपये जो भी मिल जाएं, वह घर बैठने से बेहतर है."
वह आगे कहते हैं, "यह छोटी-सी आय इन ग्रामीणों के लिए तेल-साबुन और राशन-पानी का ख़र्च पूरा कर देती है."
सोना निकालने वालों में बड़ी संख्या बुज़ुर्ग महिलाओं और पुरुषों की है.
रोहिन सिंह कहते हैं, "जिन लोगों की उम्र 60 साल है, वे लोग दूर शहर जाकर ठेकेदारी में मज़दूरी नहीं कर सकते. जीवनयापन के लिए कुछ तो जीविका चाहिए. उसके लिए बेटा-बेटी पर निर्भर नहीं हो सकते, उनका अपना परिवार है. इसलिए जब तक शरीर चलता है, तब तक यह काम करते रहेंगे."
अशिक्षा और बेरोज़गारी ज़िम्मेदार
लेकिन गौरी गांव के 51 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता दुखु महाली का मानना है कि इस क्षेत्र में रोज़गार और शिक्षा का अभाव ही ग्रामीणों को इस कड़े संघर्ष की ओर धकेलता है.
दुखु महाली कहते हैं, "यह ग्रामीण क्षेत्र है. किसी के पास नौकरी नहीं है, लोग शिक्षित नहीं हैं. यही कारण है कि ग्रामीण सोने की तलाश कर जीवनयापन करते हैं."
दरअसल, इन बुज़ुर्गों और युवा वर्ग के लिए यह काम बारिश के मौसम को छोड़कर साल के बाक़ी महीनों में रोज़गार का एकमात्र सहारा बन जाता है.
प्रशासन ने क्या कहा?
यहां जो लोग सोना तलाशने का काम करते हैं, उन्हें इसके लिए कहीं से मंज़ूरी लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती है.
हमने इस बारे में जानने के लिए चांडिल ब्लॉक के पदाधिकारी सह दंडाधिकारी नितिन शिवम गुप्ता से बात की.
वह कहते हैं, "इस क्षेत्र में सोना निकालने वालों के बीच किसी विवाद का कभी कोई मामला प्रकाश में नहीं आया है."
इस बयान से सहमत स्थानीय ज़िला खनन पदाधिकारी ज्योति शंकर सथपति कहते हैं कि यहां सोने की मात्रा इतनी कम होती है कि इसका खनन सरकार के लिए संभव नहीं है.
वह कहते हैं, "ऐसे में यदि ग्रामीण इन प्लेसर डिपॉज़िट से सोना निकाल रहे हैं, तो इसे चोरी तो नहीं कह सकते."
सरकार क्यों नहीं करती व्यावसायिक खनन?
स्वर्णरेखा और उसकी सहायक नदियों पर अध्ययन कर चुकीं प्रोफ़ेसर डॉ. नंदिता नाग जमशेदपुर कोऑपरेटिव कॉलेज में भूगर्भशास्त्र विभाग की अध्यक्ष रह चुकी हैं.
उनसे पूछा गया कि जब सोना मौजूद है, तो इसका व्यावसायिक खनन क्यों नहीं होता?
इस सवाल पर वह कहती हैं, "यहां सोने का खनन करने के लिए ख़ासतौर पर कोई खदान नहीं है. जो सोना है भी, उसका प्रतिशत इतना कम है कि सरकार को खनन करने से घाटा ही होगा. इसलिए सरकार इस पर ध्यान नहीं देती."
वह आगे कहती हैं, "गांव के लोगों को जितना सोना मिल जाए, उसी में उनको ख़ुशी मिलती है. इसलिए ये लोग सोना निकालते हैं."
भले ही इस नदी में इतना सोना न निकलता हो और ग्रामीणों की घंटों की मेहनत कभी-कभी बेकार चली जाती हो, लेकिन यह नदी फिर भी लोगों में बार-बार एक उम्मीद जगा देती है कि शायद इस बार मेहनत करने पर उन्हें सोने के कुछ कण मिल जाएं और उनका तेल-साबुन और राशन का ख़र्च निकल जाए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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