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आकृति चौधरी ने एनएसए हिरासत रद्द होने के बाद जेल से क्या कहा
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बुधवार को 25 वर्षीय आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत को रद्द कर दिया.
दिल्ली यूनिवर्सिटी से इतिहास में ग्रैजुएट आकृति चौधरी अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में क़रीब पाँच महीने से हिरासत में थीं.
उनकी हिरासत को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने पाया कि हिरासत 'राज्य की ओर से पेश की गई एक गढ़ी हुई कहानी' पर आधारित थी.
इसलिए अदालत ने निर्देश दिया कि अगर किसी अन्य मामले में उनकी गिरफ़्तारी ज़रूरी नहीं है, तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए.
यह घटनाक्रम तब सामने आया जब बेंच ने उनकी गिरफ़्तारी की पूरी प्रक्रिया और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत जारी नोटिसों की बारीकी से जांच की और प्रक्रिया में कई खामियां पाईं.
अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू से बातचीत में आकृति चौधरी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्वेस के साथ पैरवी करने वाले अधिवक्ता चार्ली प्रकाश ने पुष्टि की कि अदालत ने हिरासत का आदेश रद्द कर दिया है.
उन्होंने कहा, "अदालत ने उनकी गिरफ़्तारी और हिरासत को लेकर स्टेट के दावे में बड़ी विसंगतियां पाईं. अदालत ने नोएडा के ज़िलाधिकारी को उन्हें पाँच लाख रुपये का मुआवजा देने को भी कहा है."
इस मामले में अदालत का विस्तृत आदेश अभी आना बाकी है.
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फ़ैसले का सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील प्रशांत भूषण ने स्वागत किया है. प्रशांत भूषण ने एक्स पर लिखा है, ''इलाहाबाद हाई कोर्ट का आकृति चौधरी की हिरासत रद्द करने का फ़ैसला सराहनीय है. नोएडा के श्रमिकों के विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में यूपी पुलिस ने आकृति चौधरी को पूरी तरह दुर्भावनापूर्ण तरीक़े से हिरासत में लिया था.''
कौन हैं आकृति चौधरी
आकृति चौधरी उन कई एक्टिविस्ट में शामिल थीं, जिन्हें 10 से 18 अप्रैल के बीच हुए विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ़्तार किया गया था. इस प्रदर्शन में औद्योगिक और ठेका श्रमिकों ने वेतन बढ़ाने और पड़ोसी हरियाणा में दिए जाने वाले वेतन के बराबर मज़दूरी की मांग की थी. 13 अप्रैल को प्रदर्शन हिंसक हो गया था और सड़कें जाम कर दी गई थीं.
उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक महीने बाद आकृति चौधरी के ख़िलाफ़ एनएसए लगाया और आरोप लगाया कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों को पथराव और आगज़नी के लिए उकसाया था. एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पुलिस ने दावा किया कि उसके पास आकृति के ख़िलाफ़ मज़बूत इलेक्ट्रॉनिक और वीडियो सबूत हैं.
लाइव लॉ के मुताबिक़ अपनी याचिका में चौधरी ने दलील दी कि 13 अप्रैल को हिंसा शुरू होने से पहले ही वह हिरासत में थीं. उन्होंने कहा कि उनकी हिरासत का कोई तथ्यात्मक आधार नहीं था और उन्हें एहतियाती हिरासत में लेने की प्रक्रिया क़ानूनी स्तर पर दोषपूर्ण थी.
राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि चौधरी को 12 अप्रैल को सुबह 10:56 बजे गिरफ़्तार किया गया था और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 130 के तहत उन्हें चेतावनी नोटिस जारी किया गया था. जस्टिस श्रीधरन ने सवाल किया कि चेतावनी देने से पहले उन्हें कारण बताओ नोटिस क्यों नहीं जारी किया गया.
पुलिस ने स्वीकार किया कि धारा 126 के तहत कोई नोटिस नहीं दिया गया था. इसके बाद अदालत ने पुलिस की जनरल डायरी तलब की, जिसमें सामने आया कि नोटिस तैयार किए जाने से पहले ही चौधरी को गिरफ़्तार कर लिया गया था. अदालत ने पूछा कि क्या गिरफ़्तारी से पहले उन्हें मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया था और प्रदर्शनकारियों को उकसाने के आरोप के सबूत भी मांगे.
पुलिस ने अदालत को बताया कि 11 अप्रैल को प्रदर्शनकारी घटनास्थल पर जमा हुए थे, लेकिन अदालत ने कहा कि पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक़ उस दिन कोई हिंसा नहीं हुई थी. पुलिस यह वीडियो फुटेज भी पेश करने में विफल रही, जिसमें कथित तौर पर चौधरी प्रदर्शनकारियों को पत्थर फेंकने या वाहनों में आग लगाने के लिए उकसाती हुई दिखाई दे रही थीं.
आकृति चौधरी ने जेल से क्या कहा?
आकृति चौधरी ने ग्रेटर नोएडा की जेल में द हिंदू से कहा, "एनएसए का आरोप रद्द होना बड़ी राहत है, लेकिन सभी श्रमिकों और एक्टिविस्ट की रिहाई तक लड़ाई ख़त्म नहीं होगी."
द हिन्दू ने आकृति से बातचीत दौरान की स्थिति पर लिखा है, ''लोहे की जाली के पीछे खड़ी आकृति के चेहरे पर आंसू साफ़ दिखाई दे रहे थे. वह अन्य कार्यकर्ताओं के साथ अपने दोस्तों और परिवार से मिलने के इंतज़ार में खड़ी थीं.''
आकृति के पिता अरुण चौधरी ने द हिन्दू से कहा, "मेरी बेटी आज की भगत सिंह है. हमें हमेशा उसका पूरा समर्थन मिला. हमें कभी नहीं लगा कि उसने कुछ ग़लत किया है. मुझे न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है."
आकृति चौधरी पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर की रहने वाली हैं और दिल्ली यूनिवर्सिटी की लॉ फैकल्टी में एलएलबी फर्स्ट इयर में पढ़ रही हैं.
जेल में अपने अनुभव के बारे में आकृति चौधरी ने द हिन्दू से बताया कि उन्होंने खाना बनाने और सफ़ाई की ज़िम्मेदारी खुद उठाई और महिला क़ैदियों के बच्चों को पढ़ाया. उन्होंने कहा कि मनीषा चौहान और सृष्टि के साथ मिलकर, जिन्हें भी विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामलों में उत्तर प्रदेश पुलिस ने हिरासत में लिया था, उन्होंने बंद पड़ी लाइब्रेरी को फिर से शुरू किया और दूसरों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया.
आकृति ने कहा, "हम काम करते रहे क्योंकि जिस जगह हम रहते हैं, उसे व्यवस्थित रखना और उसकी देखभाल करना कोई ग़लत बात नहीं है."
उन्होंने बताया कि जेल में तीनों ने सिलाई और कॉस्मेटिक्स सहित कई व्यावसायिक ट्रेनिंग क्लास में भी हिस्सा लिया.
उन्होंने कहा, "हमारी दिनचर्या में नियमित काम शामिल है. इसके अलावा हम बच्चों को पढ़ाते हैं. हमने पोस्टर बनाए, कविताएं लिखीं, अपनी लाइब्रेरी और कॉमन रूम को सजाया और पढ़ने के साथ चर्चा की संस्कृति शुरू की. इससे विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के कारण गिरफ़्तार की गई महिलाओं का ध्यान बँटा और उनके परिवारों से अलग होने के बाद पैदा हुई उदासी को कम करने में मदद मिली."
आकृति चौधरी थिएटर से भी जुड़ी हैं और दिशा स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन से संबद्ध हैं. उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के दौलतराम कॉलेज से इतिहास की पढ़ाई की है.
वह उन चार लोगों में शामिल थीं, जिन्हें पुलिस ने 11 अप्रैल को बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से गिरफ़्तार किया था, यानी हिंसा शुरू होने से दो दिन पहले.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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