पाकिस्तान की जेल में भारतीय मछुआरे की मौत, बेटे की सज़ा पूरी फिर भी क़ैद

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- Author, गोपाल कटेशिया
- पदनाम, बीबीसी गुजराती संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
गुजरात के गिर सोमनाथ ज़िले के ऊना तालुका में कोब गांव है. यहां रहने वाले बीजलभाई भालिया मछली पकड़ने का काम करते थे.
सात फ़रवरी 2022 को वह अपने बेटे अश्विन के साथ समुद्र में मछली पकड़ रहे थे. तभी पाकिस्तान मरीन सिक्योरिटी एजेंसी ने उन्हें पाकिस्तान के जल क्षेत्र में प्रवेश करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था.
इसके बाद बीजलभाई, अश्विन और चार अन्य मछुआरों को पाकिस्तान की जेल में बंद कर दिया गया.
पाकिस्तान की जेल में बीजलभाई बीमार पड़ गए. करीब 50 साल के बीजलभाई की जेल में मौत हो गई. उनका 26 साल का बेटा अश्विन भी उसी जेल में बंद था.
मछुआरों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि अरब सागर में भारत और पाकिस्तान के बीच समुद्री सीमा को लेकर चल रहे विवाद की वजह से मछुआरों के परिवारों को कई दुखद घटनाओं का सामना करना पड़ता है.
सज़ा पूरी पर रिहाई नहीं

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बीजलभाई के बेटे अश्विन की सज़ा चार साल पहले ही पूरी हो चुकी थी. लेकिन वह अब भी जेल में बंद हैं. पाकिस्तान ने बीजलभाई की मौत के तीन हफ़्ते बाद उनका शव भारत भेजा.
बीजलभाई के परिवार के लोग गिर सोमनाथ के स्थानीय नेताओं से मुलाक़ात कर रहे हैं. वे उनसे अश्विन को पाकिस्तान की जेल से रिहा कराने में मदद मांग रहे हैं.
बीबीसी गुजराती ने इस बारे में पाकिस्तान की लांधी जेल के अधिकारियों से सवाल पूछे हैं. उनकी ओर से अब तक कोई जवाब नहीं मिला है. जवाब मिलने पर उसे इस रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा.
पिता और बेटा पाकिस्तान की हिरासत में कैसे पहुंचे?

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बीजलभाई के चार बेटे हैं. अश्विन तीसरे नंबर पर हैं. बीजलभाई के सबसे छोटे बेटे मानसिंह ने बीबीसी को बताया कि उनके पिता पोरबंदर की विजयाबेन सोलंकी के 'नदिता सागर' नाम के फ़िशिंग ट्रॉलर पर टंडेल यानी कैप्टन थे.
मानसिंह ने बताया कि अश्विन भी अपने पिता के साथ नाव पर मछली पकड़ने जाता था. उन्होंने कहा कि उनके पिता और भाई 4 फ़रवरी 2022 को पोरबंदर से नाव लेकर मछली पकड़ने निकले थे.
मानसिंह ने कहा, "मेरे पिता अपने पांच भाइयों में सबसे बड़े थे. उन्होंने बचपन से ही मछली पकड़ने वाली नावों पर काम करना शुरू कर दिया था. उन्हीं को देखकर हम चारों भाई भी मछुआरे बन गए. जिस समय अश्विन को पकड़ा गया था, उस समय उसकी पत्नी दक्षाबेन गर्भवती थीं."
मानसिंह ने बताया, "करीब चार महीने बाद दक्षाबेन ने बेटे हरपाल को जन्म दिया. हरपाल अब चार साल का हो गया है, लेकिन उसने आज तक अपने पिता को नहीं देखा."
उन्होंने कहा, "मेरे पिता को पहले कोई बीमारी नहीं थी. लेकिन जेल में वह बीमार पड़ गए. हमें चिट्ठी से इसकी जानकारी मिली थी."
क्या बीजलभाई को सही इलाज नहीं मिला?

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मुंबई के पत्रकार जतिन देसाई भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते बेहतर बनाने की कोशिश करने वाले ग़ैर-सरकारी संगठन 'पाकिस्तान-इंडिया पीपुल्स फ़ोरम फ़ॉर पीस एंड डेमोक्रेसी' के भारतीय चैप्टर के महासचिव रह चुके हैं.
वह मछुआरों के लिए भी काम करते हैं. जतिन देसाई ने बीबीसी गुजराती को बताया कि बीजलभाई को कराची के पास बनी लांधी जेल में रखा गया था.
उन्होंने कहा, "बीजलभाई के बीमार पड़ने के बाद उन्हें कराची के जिन्ना पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल सेंटर यानी जेपीएमसी में भर्ती कराया गया था. 27 अगस्त को अस्पताल में उनकी मौत हो गई. पाकिस्तान ने बाद में उनका शव भारत को सौंपा. उनका शव 18 और 19 सितंबर की रात उनके गांव पहुंचा."
मानसिंह ने बताया कि उनके पिता को डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर हो गया था.
उन्होंने कहा, "जब पाकिस्तान ने उन्हें पकड़ा था, तब उन्हें कोई बीमारी नहीं थी. जेल में बंद किए जाने के बाद उन्हें डायबिटीज़ और ब्लड प्रेशर की समस्या हुई. हमें दूसरे लोगों के ज़रिए इसकी जानकारी मिली थी. अश्विन ने जेल में पिता की पूरी देखभाल की."
मानसिंह का आरोप है कि उनके पिता को अच्छा इलाज नहीं मिला और अगर उन्हें सही इलाज मिला होता तो शायद उनकी इस तरह मौत नहीं होती.

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जतिन देसाई ने कहा, "मछली पकड़ते समय बीजलभाई की नाव अनजाने में पाकिस्तान की समुद्री सीमा की तरफ़ चली गई थी. इसके बाद पाकिस्तान मरीन सिक्योरिटी एजेंसी ने उन्हें पकड़ लिया."
"पाकिस्तान की एक अदालत ने बीजलभाई को ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से पाकिस्तान की समुद्री सीमा में प्रवेश करने का दोषी ठहराया. उन्हें कुछ हफ़्तों की सज़ा सुनाई गई थी. उनकी सज़ा 16 मार्च 2022 को पूरी हो गई थी."
उन्होंने कहा, "सज़ा पूरी होने के बाद पाकिस्तान को बीजलभाई को तुरंत जेल से रिहा करके भारत भेज देना चाहिए था. अगर उन्हें अपने घर वापस भेज दिया गया होता तो शायद वह आज ज़िंदा होते."
बीजलभाई इस साल पाकिस्तान की जेल में मरने वाले दूसरे भारतीय मछुआरे हैं. इससे पहले 16 जनवरी को भगाभाई बांभणिया नाम के एक भारतीय मछुआरे की पाकिस्तान की जेल में मौत हुई थी.
37 साल के भगाभाई ऊना तालुका के चिखली गांव के रहने वाले थे.
परिवार की क्या मांग है?

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जतिन देसाई का कहना है कि बीजलभाई की मौत के बाद पाकिस्तान संवेदनशीलता दिखा सकता था.
जतिन देसाई ने कहा, "अश्विन की जेल की सज़ा भी बहुत पहले पूरी हो चुकी है. इसके बावजूद पाकिस्तान ने उसे जेल में बंद रखा है. बीजलभाई और उनके बेटे अश्विन को एक ही जेल में रखा गया था. इसलिए यह स्वाभाविक है कि अश्विन को अपने पिता की मौत की जानकारी होगी."
उन्होंने कहा, "बीजलभाई की मौत से परिवार पहले ही सदमे में था. परिवार को उम्मीद थी कि बीजलभाई के शव के साथ अश्विन को भी रिहा करके भारत भेजा जाएगा. ऐसे मौक़े पर पाकिस्तान संवेदनशीलता और इंसानियत दिखाते हुए अश्विन को रिहा कर सकता था, ताकि वह अपने पिता का अंतिम संस्कार कर सके."
मानसिंह ने भी कहा कि पिता के अंतिम संस्कार के समय अश्विन के मौजूद न होने से परिवार का दुख दोगुना हो गया.
उन्होंने कहा, "हमने स्थानीय नेताओं से मुलाक़ात करके मदद मांगी है. हमने उनसे अश्विन को पाकिस्तान की जेल से रिहा कराने की अपील की है."
जतिन देसाई के मुताबिक़, इस समय पाकिस्तान की जेलों में 197 भारतीय मछुआरे बंद हैं.
उन्होंने बताया, "इनमें से 177 मछुआरे ऐसे हैं, जिनकी जेल की सज़ा पूरी हो चुकी है. उनकी भारतीय नागरिकता की जांच भी पूरी हो गई है. इन दोनों प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद मछुआरों को एक दिन के लिए भी जेल में नहीं रखा जाना चाहिए. ऐसा करना ग़ैर-क़ानूनी माना जाएगा."
उन्होंने कहा, "हम पाकिस्तान सरकार से अपील करते हैं कि इन सभी भारतीय मछुआरों को तुरंत जेल से रिहा करके भारत वापस भेजा जाए."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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