कैप्टन स्मित मच्छर की बहादुरी की चर्चा के बीच फिर क्यों याद आ रही हैं नीरजा भनोट?

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फ्लाईदुबई की उड़ान एफ़ज़ेड 1073 में घायल हुए भारतीय नागरिक कैप्टन स्मित मच्छर की बहादुरी की चर्चा हो रही है.
इसराइली यात्री यानिव हयून ने प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू को बताया कि कैप्टन मच्छर ने कथित तौर पर बेहोश होने से पहले अपनी सूझबूझ से कॉकपिट का दरवाज़ा खोल दिया था. इससे दूसरे लोग कॉकपिट में पहुंच सके और विमान को बचाने में मदद मिली.
नेतन्याहू ने बाद में एक्स पर कैप्टन मच्छर की बहादुरी की तारीफ़ की. उन्होंने कहा कि अगर कॉकपिट का दरवाज़ा बंद रहता, तो शायद कोई अंदर पहुंचकर विमान को बचाने में मदद नहीं कर पाता. उनके मुताबिक़, मच्छर के एक फ़ैसले ने विमान में सवार सभी लोगों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई.
भारतीय विमानकर्मियों की बहादुरी का ऐसा ही एक क़िस्सा इतिहास में पहले भी दर्ज हो चुका है.
यह कहानी नीरजा भनोट की है. वह पैन एम के एक विमान में सीनियर फ़्लाइट पर्सर थीं. साल 1986 में इस विमान को हाईजैक कर लिया गया था.
नीरजा ने अपनी सूझबूझ और साहस से 300 से ज़्यादा लोगों की जान बचाई, लेकिन वह ख़ुद हाईजैकर्स की गोलियों से नहीं बच सकीं.
जब कराची में हाईजैक हुआ पैन एम का विमान

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नीरजा भनोट 5 सितंबर 1986 को 'पैन अमेरिकन वर्ल्ड एयरवेज़ फ़्लाइट 73' मुंबई से कराची और फ़्रैंकफ़र्ट होते हुए न्यूयॉर्क जा रही थीं. कराची में इस विमान को हाईजैक कर लिया गया.
विमान में कुल 360 यात्री और चालक दल के 19 सदस्य मौजूद थे. हाईजैकिंग में शामिल चार लोगों ने ख़ुद को और विमान को उड़ाने की योजना बनाई थी.
विमान के हाईजैक होते ही नीरजा ने सबसे पहले पायलटों को इसकी जानकारी दी. इसके बाद पायलट, को-पायलट और फ़्लाइट इंजीनियर आपातकालीन रास्ते से विमान से बाहर निकल गए.
हाईजैकर्स के साथ 16 घंटे तक चली जद्दोजहद के बाद अंधेरा होते ही नीरजा ने विमान का आपातकालीन दरवाज़ा खोल दिया. इसके बाद यात्रियों ने बाहर निकलना शुरू किया.
लगभग सभी यात्री बाहर निकल चुके थे, लेकिन तीन छोटे बच्चे अब भी विमान में फंसे हुए थे.
नीरजा जब बच्चों को बाहर निकाल रही थीं, तभी हाईजैकर्स की नज़र उन पर पड़ी. बच्चे बच गए, लेकिन नीरजा हाईजैकर्स की गोलियों से नहीं बच सकीं.
इस घटना में 22 लोगों की मौत हुई और 150 लोग घायल हुए थे.
रिपोर्ट के मुताबिक़, हाईजैकर्स फ़लस्तीनी लड़ाके थे. इनमें मुख्य हाईजैकर ज़ायद हसन अब्द अल लतीफ़ मसूद अल-सफ़ारीनी था.
पाकिस्तान ने 2001 में उसे अमेरिका की जांच एजेंसी फ़ेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन को सौंप दिया था. उसे अमेरिका ले जाया गया, जहां अदालत ने उसे 160 साल क़ैद की सज़ा सुनाई.
चालक दल के सदस्यों ने 30 साल बाद क्या बताया?
इस घटना के बारे में चालक दल के सदस्यों ने विस्तार से अपना अनुभव बताया था.
साल 2016 में पैन एम 73 के हाईजैक होने के 30 साल बाद पहली बार विमान के चालक दल के छह सदस्यों ने मीडिया से बात की थी.
फ़्लाइट अटेंडेंट नुपूर अबरोल ने बीबीसी न्यूज़ से कहा था, "मुझे पहले लगा कि विंग एक्ज़िट खोलकर कुछ यात्रियों के साथ विमान से बाहर कूद जाऊं. लेकिन तभी मुझे एहसास हुआ कि इससे बाक़ी यात्रियों की जान ख़तरे में पड़ जाएगी."
उन्होंने कहा था, "हाईजैक अब भी मेरे और मेरे सहकर्मियों के लिए ख़त्म नहीं हुआ है. चालक दल के कुछ सदस्य और यात्री अब भी अतीत के इस बुरे सपने से बाहर निकलने और घटना की गुत्थियों को समझने के लिए संघर्ष कर रहे हैं."
विमान में कैसे घुसे थे हथियारबंद लोग?

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मुंबई से उड़ान भरने के बाद विमान सुबह क़रीब छह बजे कराची एयरपोर्ट पहुंचा था. तभी चार हथियारबंद लोग एयरपोर्ट की सुरक्षा व्यवस्था तोड़कर गोलियां चलाते हुए विमान में घुस गए.
नुपूर ने देखा कि एक गोली उनके एक सहकर्मी के पैर के पास आकर लगी. उन्होंने चिल्लाकर उनसे विमान का गेट बंद करने को कहा.
फ़्लाइट अटेंडेंट शिरीन पवन को हथियारबंद लोगों ने नहीं देखा था. गोली की आवाज़ सुनते ही वह इंटरकॉम तक पहुंचीं और उन्होंने कॉकपिट का इमरजेंसी नंबर डायल किया.
उनकी दूसरी कोशिश में पायलट ने फ़ोन उठाया और शिरीन ने हाईजैकिंग की जानकारी देने वाला कोड बोल दिया.
एक अन्य फ़्लाइट अटेंडेंट सनशाइन वेसुवाला ने देखा कि अपहरणकर्ताओं ने नीरजा भनोट को पकड़ लिया था और उनके सिर पर बंदूक़ तान रखी थी.
एके-47 और ग्रेनेड से लैस एक चरमपंथी ने सनशाइन से कहा कि वह उसे कैप्टन के पास ले जाएं.
लेकिन कॉकपिट पूरी तरह ख़ाली था. सनशाइन ने देखा कि विमान से बाहर निकलने के उपकरण कॉकपिट में खुले पड़े थे. कॉकपिट की छत में बाहर निकलने का रास्ता भी खुला हुआ था.
लेकिन वह इस तरह पेश आईं, जैसे उन्होंने इनमें से कुछ भी नहीं देखा हो.
उनके मुताबिक़, ऐसा लग रहा था कि अपहरणकर्ताओं को विमान के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी. इसलिए उन्होंने खुले पड़े रास्ते और उपकरणों पर ध्यान नहीं दिया.
क्या पायलटों के जाने से बचीं कई जानें?
बाद में कई लोगों ने पायलटों के विमान से बाहर निकलने और यात्रियों को उनके हाल पर छोड़ने की आलोचना की. लेकिन चालक दल के एक अन्य सदस्य दिलीप बीड़ी चंदानी का मानना था कि पायलटों के बाहर निकल जाने से कई लोगों की जान बची.
उन्होंने कहा था, "पायलटों के विमान से चले जाने का मतलब था कि हम पूरी तरह चरमपंथियों के रहमोकरम पर नहीं थे. अगर पायलट वहां होते, तो चरमपंथी उन्हें विमान उड़ाकर किसी इमारत से टकराने के लिए कह सकते थे या विमान को हवा में ही उड़ा सकते थे."
चरमपंथियों की योजना पायलट को मजबूर करके विमान को साइप्रस और इसराइल के ऊपर से ले जाने की थी.
साइप्रस और इसराइल में उनके संगठन के कुछ दूसरे सदस्यों को क़ैद करके रखा गया था. पैन अमेरिकन सर्विस के कराची डायरेक्टर विराफ़ दरोगा ने मेगाफ़ोन के ज़रिए चरमपंथियों से बातचीत शुरू की.
उन्होंने चारों हथियारबंद लोगों से कहा कि वे जहां जाना चाहते हैं, पायलट उन्हें वहां ले जाएंगे. उन्होंने बताया कि एयरपोर्ट के अधिकारी विमान में पायलट भेजने पर विचार कर रहे हैं.
इसी दौरान चरमपंथियों ने विमान में मौजूद 29 साल के अमेरिकी नागरिक राजेश कुमार को उनकी सीट से खींचकर बाहर निकाला.
उन्हें विमान के दरवाज़े के पास ले जाकर घुटनों के बल बैठाया गया और उन पर बंदूक़ तान दी गई. एक घंटे के भीतर कोई पायलट नहीं आया, तो चरमपंथियों ने राजेश कुमार को गोली मारकर विमान से बाहर फेंक दिया.
सनशाइन ने बताया था, "इस घटना ने विमान के भीतर का माहौल पूरी तरह बदल दिया. इससे साफ़ हो गया कि वे निर्दयी हत्यारे हैं."
अमेरिकी यात्रियों को बचाने की कोशिश

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विमान को हाईजैक करने के क़रीब चार घंटे बाद चरमपंथियों ने अमेरिकी नागरिकों की तलाश शुरू की. उनका संगठन अबू निदाल ऑर्गेनाइज़ेशन मध्य पूर्व में अमेरिका और इसराइल की नीतियों का विरोध करता था.
सनशाइन, माधवी बहुगुणा और दूसरे फ़्लाइट अटेंडेंट ने यात्रियों के पासपोर्ट जमा करने शुरू किए. लेकिन उन्होंने चुपचाप एक रणनीति बनाई. उन्होंने अमेरिकी नागरिकों के पासपोर्ट जमा नहीं किए, ताकि हाईजैकर्स उनकी पहचान न कर सकें.
चालक दल की सदस्य शिरीन और सनशाइन ने सबसे ज़्यादा समय मुख्य अपहरणकर्ता ज़ायद हसन अब्द अल लतीफ़ साफ़ारीनी के साथ बिताया.
साफ़ारीनी विमान के बाहर का जायज़ा लेने के लिए दोनों को बंदूक़ की नोक पर अपने आगे ढाल की तरह इस्तेमाल करता था.
शिरीन ने बताया था, "ऐसे मौक़े पर वह मेरे बाल पकड़कर मेरे चेहरे को खिड़की से लगा देता और पूछता कि मैं बाहर क्या देख पा रही हूं. वह कहता था कि उसे अमेरिकी लड़ाकू विमानों का इंतज़ार है."
विमान में मैकेनिक के रूप में काम करने वाले 28 साल के मेहरजी खारस को चरमपंथियों ने रेडियो के ज़रिए बातचीत कर रहे अधिकारियों से संपर्क करने के लिए मजबूर किया.
उन्हें अब भी उम्मीद थी कि विमान उड़ाने के लिए कोई पायलट मिल जाएगा.
सनशाइन ने बताया था कि साफ़ारीनी ने कई बार उनके साथ फ़्लर्ट किया और उन्हें अपने साथ साइप्रस चलने का प्रस्ताव दिया.
लंबे इंतज़ार के बाद चरमपंथियों ने घोषणा की कि अगर पायलट नहीं आया, तो वे हर 15 मिनट में एक यात्री को गोली मारेंगे.
शिरीन ने देखा कि मेहरजी मारे जा चुके थे.
भगदड़ के दौरान नुपूर और माधवी विमान के विंग से बाहर की ओर कूद गईं. क़रीब 20 फ़ुट की ऊंचाई से कूदने के कारण उनकी हड्डियां टूट गईं.
सनशाइन और दिलीप भी विंग पर पहुंच गए थे, लेकिन अंधेरा होने के कारण वे यह अंदाज़ा नहीं लगा पाए कि उन्हें कहां कूदना चाहिए. इसके बाद चालक दल के सदस्यों ने इमरजेंसी स्लाइड के ज़रिए यात्रियों को विमान से बाहर निकालना शुरू किया.
जब सभी यात्री विंग से बाहर निकल गए, तो चालक दल के सदस्य दोबारा विमान के भीतर गए. उस समय गोलियों की आवाज़ बंद हो चुकी थी और उन्हें नहीं मालूम था कि चरमपंथी कहां हैं.
नीरजा को किस हालत में पाया गया?

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सनशाइन ने विमान के भीतर नीरजा को देखा. उनके कूल्हे में गोली लगी थी और काफ़ी ख़ून बह रहा था, लेकिन वह होश में थीं. सनशाइन ने दिलीप को मदद के लिए बुलाया. दोनों नीरजा को इमरजेंसी स्लाइड तक लेकर आए.
उन्होंने पहले नीरजा को स्लाइड से नीचे उतारा और फिर ख़ुद उनके पीछे बाहर आए. शिरीन और उनकी सहयोगी रानी वासवानी विमान से निकलने वाली आख़िरी दो बंधक थीं.
तीन अपहरणकर्ताओं को उस समय एयरपोर्ट के सुरक्षा बलों ने पकड़ लिया, जब वे भागने की कोशिश कर रहे थे.
जब पाकिस्तान के सुरक्षा बल विमान के भीतर पहुंचे, तब तक साफ़ारीनी विमान में ही मौजूद था. नीरजा के सहकर्मियों ने बताया कि कराची के जिन्ना अस्पताल पहुंचने तक वह जीवित थीं.
सनशाइन ने कहा था, "अगर नीरजा को कहीं दूर ले जाकर सही इलाज दिया गया होता, तो वह आज भी जीवित होतीं."
दिलीप ने कहा था, "मैंने एयरपोर्ट पर केवल मामूली मेडिकल सुविधा देखी. अस्पताल एयरपोर्ट से कई किलोमीटर दूर था. नीरजा को बिना स्ट्रेचर के एंबुलेंस में रखा गया."
नीरजा निजी ज़िंदगी में कैसी थीं?
नीरजा भनोट से जुड़े कई क़िस्से उनके भाई अखिल भनोट ने साझा किए थे.
नीरजा का जन्म 7 सितंबर 1963 को एक पंजाबी परिवार में हुआ था. परिवार उन्हें प्यार से 'लाडो' बुलाता था. उनका परिवार चंडीगढ़ का रहता था. उनके पिता हरीश भनोट, मां रमा भनोट और दो बड़े भाई अनीश और अखिल भनोट थे.
हरीश भनोट 'हिंदुस्तान टाइम्स' में पत्रकार थे.
नीरजा जब छठी कक्षा में पढ़ रही थीं, तब उनके पिता का तबादला मुंबई हो गया. उन्होंने मुंबई के बॉम्बे स्कॉटिश स्कूल से पढ़ाई की और उसके बाद ज़ेवियर्स कॉलेज से ग्रैजुएशन किया.
अखिल के मुताबिक़, नीरजा किसी से नहीं डरती थीं और अपनी सोच पर अड़ी रहती थीं. वह अपने पिता की तरह निडर थीं और उन्हीं से प्रेरित थीं.
एक बार नीरजा अखिल के साथ स्कूटर पर कॉलेज जा रही थीं. रास्ते में एक व्यक्ति अपनी पत्नी को पीट रहा था.
नीरजा ने स्कूटर रुकवाया और जाकर उस व्यक्ति का हाथ पकड़ लिया.
उस महिला ने नीरजा से पीछे हटने और इसे अपना निजी मामला बताया. इसके बावजूद नीरजा वहां से नहीं हटीं. अखिल बड़ी मुश्किल से उन्हें समझाकर घर लाए.
अखिल के मुताबिक़, नीरजा ने उस समय कहा था, "यह ज़िंदगी बीत जाएगी और पता भी नहीं चलेगा. मैं अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करूंगी. वहां जो हो रहा था, वह मुझसे सहन नहीं हुआ."
मॉडलिंग की दुनिया में कैसे पहुंचीं नीरजा?

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नीरजा ने पढ़ाई के साथ-साथ मॉडलिंग शुरू कर दी थी. अखिल बताते हैं कि वह केवल 19 साल की थीं, जब उन्होंने मॉडलिंग की दुनिया में क़दम रखा.
एक बार नीरजा अपने दोस्तों के साथ कॉलेज के बाहर खड़ी थीं. उस समय 'बॉम्बे' नाम की एक पत्रिका 'गर्ल्स नेक्स्ट डोर' नाम से एक लेख तैयार कर रही थी.
पत्रिका के लिए नीरजा की तस्वीर खींची गई. जब यह तस्वीर छपी, तो उन्हें कई मशहूर कंपनियों के विज्ञापनों के प्रस्ताव मिलने लगे.
उन्होंने 1980 के दशक में अलग-अलग कंपनियों के लिए क़रीब 70 से 80 विज्ञापन किए.
अखिल बताते हैं कि नीरजा बेहद ज़िंदादिल थीं. उन्हें संगीत से बहुत प्यार था और वह हमेशा लोगों को हंसाती रहती थीं.
वह एक बार हंसना शुरू करतीं, तो फिर रुकती नहीं थीं. हंसते-हंसते उनकी आंखों से आंसू निकल आते थे, लेकिन उनकी हंसी जारी रहती थी.
अगर परिवार में कोई रोता या उदास होता, तो नीरजा कहती थीं, "पुष्पा, आई हेट टियर्स."
वह राजेश खन्ना की बहुत बड़ी प्रशंसक थीं और अक्सर उनका यह डायलॉग बोलती थीं, "बाबूमोशाय, ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं..."
अखिल के मुताबिक़, नीरजा अपने पिता को बहुत मानती थीं और उनकी बात नहीं टालती थीं. साल 1985 में उनके पिता नीरजा के लिए शादी का रिश्ता लेकर आए.
नीरजा शादी नहीं करना चाहती थीं. इसके बावजूद उन्होंने अपने पिता की ख़ुशी के लिए शादी कर ली. शादी के बाद उनके पति उन्हें अपने साथ शारजाह ले गए.
अखिल के मुताबिक़, नीरजा वहां केवल दो महीने रहीं. उनके पति उन्हें दहेज के लिए परेशान करते थे. इससे बेहद दुखी होकर नीरजा किसी बहाने मुंबई लौट आईं और फिर कभी वापस नहीं गईं. मुंबई लौटने के बाद उन्होंने दोबारा मॉडलिंग शुरू कर दी.
एयरहोस्टेस बनने का संयोग

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नीरजा की एक सहेली ने 'पैन एम' में एयरहोस्टेस की नौकरी के लिए आवेदन किया था. सहेली ने नीरजा से इंटरव्यू में साथ चलने और मेकअप में मदद करने का अनुरोध किया.
वहीं एयरलाइन से जुड़े किसी व्यक्ति की नज़र नीरजा पर पड़ी. उन्होंने नीरजा को भी 'पैन एम' में नौकरी के लिए आवेदन करने की सलाह दी.
नीरजा का चयन हो गया और उन्हें ट्रेनिंग के लिए मियामी भेजा गया. मियामी में ट्रेनिंग के दौरान ही उन्हें पर्सर के पद पर प्रमोट कर दिया गया.
नीरजा 1986 में ही 'पैन एम' में भर्ती हुई थीं. जिस दिन विमान हाईजैक हुआ, वह उनकी सातवीं यात्रा थी. उस दिन नीरजा की छुट्टी थी. चालक दल की जिस दूसरी सदस्य की ड्यूटी थी, उसकी तबीयत ख़राब हो गई थी.
इसके बाद नीरजा से ड्यूटी पर जाने का अनुरोध किया गया और वह तैयार हो गईं. एक सप्ताह पहले मिली थी हाईजैकिंग से निपटने की ट्रेनिंग हाईजैकिंग से क़रीब एक सप्ताह पहले नीरजा लंदन से ऐसी स्थिति से निपटने की ट्रेनिंग लेकर लौटी थीं.
जन्मदिन के दिन घर पहुंचा शव

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हाईजैकिंग वाली उड़ान पर जाने से पहले नीरजा ने एक विज्ञापन की शूटिंग की थी. वह रात क़रीब आठ बजे घर पहुंची थीं और उन्होंने परिवार के साथ शूटिंग से जुड़ी बातें साझा की थीं.
इसी दौरान उनके जन्मदिन की चर्चा हुई. नीरजा ने कहा था कि इस बार वह अपना जन्मदिन दोस्तों के साथ नहीं, बल्कि केवल परिवार के साथ मनाएंगी.
अखिल ने बीबीसी को बताया था, "लेकिन जन्मदिन के दिन ही उनका शव घर आया."
नीरजा की बहादुरी के लिए भारत सरकार ने 1987 में उन्हें अशोक चक्र से सम्मानित किया. पाकिस्तान सरकार ने उन्हें तमग़ा-ए-पाकिस्तान और अमेरिकी सरकार ने हीरोइज़्म अवॉर्ड दिया.
साल 2016 में उनके जीवन पर 'नीरजा' नाम की फ़िल्म बनी, जिसमें सोनम कपूर ने उनकी भूमिका निभाई. फ़िल्म रिलीज़ होने से पहले सोनम कपूर ने एक इंटरव्यू में नीरजा की मां से सुना एक क़िस्सा साझा किया था.
जब नीरजा की मां रमा भनोट अशोक चक्र लेने गईं, तो तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह ने उनसे पूछा था कि वह रो क्यों रही हैं. उन्होंने कहा था कि उन्हें ऐसी संतान मिलने पर गर्व होना चाहिए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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