झारखंडः क्यों आसान नहीं भाजपा की राह..

झारखंड भाजपा
    • Author, नीरज सिन्हा
    • पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

कई महीनों से झारखंड में अकेले चुनाव लड़ने का दम भर रही भारतीय जनता पार्टी ने जब ऑल झारंखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) और लोक जनशक्ति पार्टी से गठबंधन किया, तो मायने निकाले गए कि वक़्त की नज़ाकत भांपते हुए पार्टी ने यह क़दम उठाए हैं.

फिर उम्मीदवारों की सूची जारी हुई, तो <link type="page"><caption> पाला बदलने वाले</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/11/141104_jharkhand_leader_defection_sk.shtml" platform="highweb"/></link> दर्जन भर से ज़्यादा विधायकों-नेताओं के नाम इसमें शामिल थे.

अब चुनाव प्रचार परवान चढ़ने लगा है, तो होर्डिंग्स, पोस्टर, पंप्लेट्स, स्लोगन, कलम से लेकर बटन तक में नरेंद्र मोदी छाए हैं.

ऐसे में माना जा रहा है कि झारखंड में '41 प्लस' के लिए भाजपा की चुनौतियां कुछ कम नहीं हैं. पार्टी की नज़र अब मोदी के झारखंड दौरे पर है.

नीरज सिन्हा की रिपोर्ट

झारखंड भाजपा

भाजपा के किसी भी नेता या कार्यकर्ता से चुनौतियों पर बात करें तो वो यही कहते हैं कि 21 नवंबर को मोदी के झारखंड आने के साथ ही पूरी फिज़ा बदल जाएगी.

यहां 25 नवंबर से चुनाव होंगे और 81 सदस्यों वाली झारखंड विधानसभा में पूर्ण बहुमत के लिए 41 का आंकड़ा ज़रूरी है.

अलग राज्य के गठन के बाद वर्ष 2005 और 2009 में हुए चुनाव में किसी दल को 41 सीटें नहीं मिलीं.

इस बार भाजपा 72 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि आठ सीटें आजसू के लिए और एक सीट लोजपा के लिए छोड़ी गई है.

लोकसभा चुनाव में झारखंड की 14 में से 12 सीटों पर मिली जीत के बाद भी विधानसभा चुनाव में भाजपा यहां सजग है.

वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार कहते हैं, "नरेंद्र मोदी के दौरे से फिज़ा बदले. यह संभव है. लेकिन कई मोर्चे पर चुनौतियां शायद आख़िर तक बरक़रार रहेंगी. उम्मीदवारों के चयन को लेकर भाजपा के अंदर सब कुछ ठीक नहीं है."

झारखंड मुक्ति मोर्चा

झारखंड मुक्ति मोर्चा

भाजपा की बड़ी चुनौती है झारखंड मुक्ति मोर्चा को रोकना. झारखंड मुक्ति मोर्चा अकेले 81 सीटों पर चुनाव लड़ रहा है.

झामुमो ने अधिकतर पुराने नेताओं या दल छोड़ने वालों को इस चुनाव में तरजीह दी है. भाजपा के प्रचार अभियान के तौर तरीकों को भी झामुमो ने कॉपी कर लिए हैं.

वर्ष 2009 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और झामुमो ने 18-18 सीटें जीती थीं. हालांकि भाजपा को 20.18 प्रतिशत और झामुमो को 15.20 फीसदी वोट मिले थे.

जातीय तानाबाना

झारखंड

बदली परिस्थितियों में झामुमो अपने परंपरागत वोट बैंक थ्री एम- महतो (कुर्मी), मुस्लिम और मांझी को एकजुट करने में लगा है.

हालांकि भाजपा की उम्मीदें हैं कि मोदी की वजह से गैर आदिवासी वोट उसे एकमुश्त मिल सकते हैं.

रणनीतिकार यह भी मान रहे हैं कि मुस्लिम वोटों के बिखराव का उसे फ़ायदा होगा.

संथाल, कोल्हान

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पिछले चुनाव में संथाल की 18 सीटों में से दस पर झामुमो को जीत मिली थी, जबकि भाजपा को महज दो सीटें मिली थीं. शिबू सोरेन आदिवासियों के बड़े नेता माने जाते हैं और हेमंत सोरेन भी तेज़ी से उभरे हैं.

हिन्दी दैनिक 'प्रभात खबर' के वरिष्ठ संपादक अनुज कुमार सिन्हा कहते हैं, "बेशक झारखंड में सत्ता के लिए संथाल और कोल्हान की 32 सीटें अहम होती हैं और इन इलाकों में झामुमो ने ख़ुद को सशक्त बनाने की कोई कसर नहीं छोड़ी है."

सिन्हा के अनुसार, "अब नरेंद्र मोदी के दौरे से भाजपा के पक्ष में जो माहौल बनेगा उसका सामना झामुमो किस तरीके से कर पाता है, यह देखने लायक होगा. क्योंकि लोकसभा चुनाव में कथित मोदी लहर के बाद भी संथाल की दो सीटों दुमका और राजमहल में झामुमो की ही जीत हुई थी."

संघ की परेशानी

संघ

चुनाव से ठीक पहले दलबदलुओं को तरजीह देने और आजसू के साथ गठबंधन को लेकर भाजपा और खासकर संघ में नाराज़गी उभरी है क्योंकि संघ समर्थित कई दावेदार टिकट पाने से वंचित हुए हैं.

झारखंड में आदिवासियों और पार्टी काडर के बीच संघ की पैठ पार्टी के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है.

जानकार बताते हैं कि संघ के राज्य नेतृत्व को मनाने के लिए केंद्रीय नेतृत्व की पहल जारी है.

टिकट नहीं मिलने से नाराज़ कई नेता दूसरे दलों से चुनाव लड़ रहे हैं. इसलिए भीतरघात का खतरा भी है.

झारखंड प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रवींद्र राय कहते हैं, "सात-आठ सीटों पर ये स्थिति उभरी थी, जिसे ठीक कर लिया गया है."

चुनौतियों के सवाल पर वे कहते हैं, "राज्य को संवारना और स्थायी सरकार बनाना ही हमारी चुनौतियां हैं. हमारा एजेंडा साफ़ है. रही बात विपक्ष की, तो उनके पास कोई एजेंडा नहीं है. सरकार में साथ रहने के बाद भी झामुमो, कांग्रेस, राजद अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं."

सरकार और विकास

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भाजपा के तमाम नेता इस बात पर जोर दे रहे हैं कि स्थायी सरकार बनाएं, विकास पाएं, लेकिन विकास के सवाल पर भाजपा पर भी पलटवार होने लगे हैं.

दरअसल 14 सालों में सबसे अधिक नौ साल तक भाजपा ने ही राज्य सरकार का नेतृत्व किया है.

उधर, हेमंत सोरेन बतौर मुख्यमंत्री अपने 14 महीनों के कार्यकाल को उपलब्धियों के तौर पर गिना रहे हैं. अक्सर वे कहते हैं, "14 महीने 14 साल पर भारी, सबने कहा हमने किया."

झामुमो के केंद्रीय महासचिव सुप्रियो भट्टचार्य कहते हैं, "भाजपा के पास चुनाव लड़ने के अपने उम्मीदवार तक नहीं थे, वो पूर्ण बहुमत क्या हासिल करेगी."

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