कश्मीर के पहाड़ी गांवों में चुनावी मौसम

कश्मीर
    • Author, सब्बाह हाजी
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. पाँच चरणों में से दो चरणों का मतदान हो चुका है.

राज्य में विधानसभा की कुल 87 सीटें हैं. पहले दो चरणों में मतदान प्रतिशत पिछले चुनाव के मुक़ाबले ज़्यादा रहा है.

पहाड़ी इलाक़ों में लोगों ने भले ही मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया हो, लेकिन इन इलाक़ों में बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी हुई है.

पहाड़ों में बसे इन गाँवों में बिजली, टीवी, मोबाइल जैसी आधुनिक चीज़ें तो पहुँची हैं, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और साफ़-सफ़ाई की स्थिति नहीं बदली है.

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भारत निर्वाचन आयोग, भारत

शहर छोड़कर ब्रेसवाना गाँव में आए मुझे पाँच साल हो गए हैं. डोडा ज़िले में पश्चिमी हिमालय की गोद में बसा यह एक छोटा सा गाँव है.

इस गाँव को उन्नसवीं सदी की शुरुआत में मेरे परदादा ने बसाया था. समुद्र तल से 7,500 फ़ीट ऊपर स्थित इस गांव में मेरे पिता खेती-बाड़ी करते रहे हैं. यहीं हमारे नाते-रिश्तेदार और जानवर रहते हैं.

साल 2015 बस आने ही वाला है, लेकिन आज भी गाड़ी चलने लायक तारकोल की सड़क गाँव से आठ किलोमीटर नीचे है, जिस तक पहुँचने के लिए घोड़े या पैदल तीन घंटे का सफ़र करना पड़ता है.

मैं गाँव में एक स्कूल शुरू करने के लिए अपने परिवारवालों की मदद करने आई थी. यह स्कूल मेरे चाचा की आर्थिक मदद से खुल रहा था.

बचपन में हर साल गर्मियों में दुबई से ब्रेसवाना आने पर हम मूलभूत सुविधाओं की कमी से बेहाल हो जाते थे. मैं बिजली, टीवी या आधुनिक सुविधाओं की बात नहीं कर रही. यहाँ पर स्वास्थ्य, शिक्षा और सफ़ाई की कमी खलती थी.

बुनियादी सुविधाएँ

कश्मीर में चुनाव

आज दो दशकों से भी ज़्यादा वक़्त बीतने के बाद भी यहाँ ज़्यादा कुछ नहीं बदला है.

हाँ, कच्ची सड़कें गाँव के ज़्यादा क़रीब पहुँच गई हैं, ज़्यादातर घरों में बिजली और पानी है, लोगों की कमाई बढ़ी है और घरों में आधुनिक गैज़ेट्स दिखाई देने लगे हैं. लेकिन स्वास्थ्य, शिक्षा और सफ़ाई की बुनियादी सुविधाओं का आज भी अभाव है.

मेरी मूल चिंता हमेशा ही शिक्षा रही है, क्योंकि मैने अच्छी और बुरी शिक्षा का फर्क देखा है.

मुझे बढ़िया स्कूली शिक्षा मिली और मेरे कई दोस्त, पड़ोसी और परिवारवाले इससे महरूम रहे. यहाँ की कई पीढ़ियों के बच्चों ने हर गाँव में मौजूद ग़ैर-ज़िम्मेदार सरकारी स्कूलों में मोटी पगार पाने वाले ऐसे मास्टरों से पढ़ाई हासिल की जिनसे शायद ही वो कुछ सीख पाए हों.

गाँवों की अनदेखी

कश्मीर, चिनार, पेड़

देश की बड़ी आबादी गाँवों में रहती है, जिस पर कोई ध्यान नहीं देता, जबकि वो सबसे ज़्यादा शोषित, उपेक्षित और दयनीय हालात में रहे हैं.

लेकिन इसका अपवाद है चुनावों का मौसम.

इन गाँवों में कोई नेता या अफ़सर यूं ही नहीं आ जाता. स्थानीय निकाय, राज्य या राष्ट्रीय चुनावों के समय इन गांव के लोगों का महत्व काफ़ी बढ़ जाता है.

इस दौरान नेता हेलिकॉप्टरों में बैठकर पूरे शानो-शौक़त के साथ पहुँचते हैं और जनता को मुफ़्त खाना और वादे देते हैं.

चुनावों में बदलते हैं हालात

जम्मू-कश्मीर में मतदान

यहाँ चुनाव एक त्योहार जैसा है. हमसे पूछा जाता है कि गाँव वालों के लिए मुद्दा क्या है, यहाँ महिलाओं की आवाज़ कौन है. ऐसे सवालों पर केवल हँसा जा सकता है और कहा जा सकता है कि यहाँ असली फ़ैसला इस बात से होगा कि कौन सबसे ज़्यादा पैसे देगा.

यह तय है कि चुनाव के समय पैसों की बाढ़ आ जाएगी. दुकानदार ख़ुश हो जाते हैं, उनकी बिक्री काफ़ी बढ़ जाती है, घरों में नए टीवी और मोबाइल दिखने लगते हैं. यहाँ यही 'असली मुद्दा' है.

कोई ऐसी विचारधारा नहीं जिसका पूरे राज्य पर कोई प्रभाव हो, कश्मीर समस्या के रूमानी हल का कोई सपना नहीं, चुनावों में भागीदारी वैचारिक है या राज्य और सशस्त्र संघर्ष के इतिहास पर आधारित- इसकी कोई चिंता नहीं है. ये सब कुछ भी नहीं.

यहाँ चुनाव का मतलब है केवल पैसा और शायद इस बात की छद्म ख़ुशी कि मेरा प्रत्याशी जीत गया. क्योंकि चुनाव के बाद इन सबको गुमनामी में खो जाना है. उनकी असल समस्याओं के बारे में न कोई सुनता है, न ही किसी को उनकी परवाह है.

आँखों पर पट्टी

जम्मू-कश्मीर में मतदान

अगर आप शहर से आए हों और आपकी आँखों पर पट्टी बंधी हो या आप इतने मासूम हों कि आपको दुनियावी हक़ीक़तों का अहसास ही न हो तो आप 'चारों तरफ़ हो रहे बदलाव' को लेकर हमेशा उत्तेजित रह सकते हैं.

लेकिन मेरे लिए पिछले पाँच साल बेहद निराशा और कड़वाहट भरे रहे हैं. मैं और मेरा परिवार 'व्यवस्था' के अंदर की किसी भी चीज़, स्कूल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सरकारी अधिकारियों के कामकाज का तरीका बदलने में सक्षम नहीं है. इसलिए हमने उस काम पर ध्यान दिया जो हमारे वश में था.

और यह था हमारा स्कूल, वो बच्चे जो यहाँ पढ़ते हैं, उनके परिवार और उनकी मुश्किलें. हमने उनके जीवन, उनके व्यक्तित्व, उनके सपनों और क्षमताओं में आश्चर्यजनक बदलाव होते देखा.

सही क़दम का परिणाम

कश्मीरी महिलाएँ वोट देते हुए

ये सब इसलिए हो सका क्योंकि हमने उनको शिक्षित करने के लिए स्कूल खोला और हमने ऐसा किया भी.

हमने उन्हें अच्छी शिक्षा दी, उन्होंने इसे खुले दिल से स्वीकार किया, उनके परिवारवालों ने हर तरह से हमारी मदद की और अब ये ये बच्चे बाहरी दुनिया में क़दम रख चुके हैं.

यह एक छोटी सी बात है, कि जो सही है उसे किया जाए तो उसका परिणाम तत्काल मिलता है.

(32 वर्षीय सब्बाह हाजी, हाजी पब्लिक स्कूल की निदेशक हैं. कश्मीर के सामाजिक-राजनीतिक मामलों में गहरी रुचि रखती हैं.)

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