कश्मीर की क़ब्रों पर बोलते पत्थर!

    • Author, फ़ैसल मोहम्मद अली,
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कश्मीर से
  • प्रकाशित

अगर लफ़्ज़ बोलते हैं तो क़ब्रों के सिरहाने लगे ये पत्थर कभी चीख़कर और कभी सरगोशी से कई कहानियां कह जाते हैं.

कहानी एक नौजवान की बेवक़्त मौत की, किसी के गोली या हिंसा के शिकार होने की, या फिर औलाद के लिए मां-बाप के बेपनाह मोहब्बत की.

किसने कहा कि इतिहास या मोहब्बतों की दास्तानें महज़ क़ागज़ों पर दर्ज की जा सकती हैं! कश्मीर में इतिहास के हिस्से क़ब्रों के सिरहाने लगे पत्थरों में भी दर्ज हैं.

कोई मौजूद न भी हो तो शायद ये समझने में देर नहीं होगी ये उस मां-बाप की दर्द भरी चीख है जिनका बेटा मात्र 15 साल की उम्र में उनसे सदा के लिए जुदा हो गया.

क़ब्र के सिरहाने पत्थर पर लगा ये शेर उसे साफ़ बयान करता है-

मासूम हो तुम शहीद ज़िंदा जावेद हो,

तुम जावेद ही नहीं बद्र की तस्वीर हो.

पुरानी है परंपरा

क़ब्रों के सिरहाने शेर लिखने की परंपरा कब, कैसे और क्यों शुरू हुई इसे लेकर कहीं कुछ लिखा हुआ नहीं मिलता. लेकिन एक क़िस्सा बताया जाता है सूफ़ी संत सैयद अली हमदानी से जुड़ा हुआ.

उनके प्रभाव में जब इस्लाम कश्मीर में तेज़ी से फला फूला तो मूर्तियां तैयार करने वालों के रोज़गार पर इसका भारी असर पड़ा. सूफ़ी संत ने उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया कि वो अपनी कला को निखारने का कोई दूसरा साधन ढूंढ़े.

हालांकि ऐसा नहीं कि इस तरह के पत्थर घाटी के हर क़ब्रिस्तान में मिलते हैं. कुछ लोग इसे ग़लत भी बताते हैं. लेकिन ज़्यादातर जगहों पर इसे लगाने का रिवाज़ है.

लहू का तोहफ़ा

श्रीनगर की ईदगाह के बग़ल में मौजूद क़ब्रिस्तान को लोग शहीद मज़ार के नाम से जानते हैं. यहाँ वैसे लोगों की क़ब्रें मौजूद हैं जो हिंसा के शिकार हुए हैं. वहीं एक क़ब्र पर शेर लिखा है जो बात कर रहा है धरती पर अपने लहू को निछावर करने की-

तू अपने फूलों को सुर्ख़ कर ले सवाल है तेरी आबरू का,

क़बूल कर ए ज़मीने गुलशन हक़ीर (तुच्छ) तोहफ़ा मेरे लहू का.

मरने वालों की जबीं (पेशानी) रौशन है इस ख़ल्क (दुनियां) में,

जिस तरह तारे चमकते हैं अंधेरी रात में.

श्रीनगर के पांता चौक पर पत्थरों का काम करने वाले वसीम अहमद शाह कहते हैं कि पहले स्लेटी पत्थरों के प्रयोग का रिवाज़ था लेकिन अब धीरे धीरे लोग मार्बल की मांग करने लगे हैं.

उनके मुताबिक़ लोग ख़ुद से शेर लाकर देते हैं जिसे मांग के अनुसार या तो सीधे पत्थर पर खोदा जाता है या फिर कंप्यूटर की मदद से डिज़ाइन कर फिर ट्रेसिंग पेपर के सहारे पत्थर पर उतारा जाता है.

बुलबुल की गुलशन

कई बार वैसे लोग भी कारीगरों के पास आते हैं जिन्हें शेरों-शायरी से दूर का वास्ता नहीं होता. उस हालत में कारीगर ख़ुद ही उन्हें कुछ शेर सुझाते हैं.

वसीम अहमद शाह अक्सर ये दो शेर लोगों को बताते है-

'आए थे हम मिस्ले बुलबुल सैर गुलशन कर चले

ले लो माली बाग़ अपना हम तो अपने घर चले.'

ये दूसरा शेर कुछ धार्मिक भावनाओं वाला है जो क़यामत यानी प्रलय के दिन की बात करता है.

'नबी की रहमत हो तुझपे, ख़ुदा की शिफाअत हो,

रोज़े महशर में आप पर अल्लाह की रहमत हो.'

न चराग़, न फूल

कई बार कारीगर पहले से ही ऐसे पत्थर तैयार करके रखते हैं. फ़ारसी भाषा में लिखे गए इस शेर का मतलब है-

हम ग़रीबों की मज़ार पर न चराग़ है, न फूल है

चूंकि न दिया है और न ही फूल तो न परवाना यहां आकर जलता है न ही बुलबुल यहां आती है.

इस तरह के टूंबस्टोन तैयार करने में कारीगर को तीन से छह घंटे का वक़्त लग जाता है. वो इस काम के लिए छह सात सौ रूपये से लेकर 1200 रूपये तक मेहनताना लेते हैं.

शबनम की आफ़शानी

श्रीनगर शहर में ही इस तरह की दुकानें कई इलाक़ों में मिल जाती हैं.

कई में पत्थर के दूसरे कामों के साथ इस तरह के टूंबबस्टोन तैयार करने का काम भी किया जाता है.

मोहम्मद नसीर बच्चू मैट्रिक पास हैं लेकिन अल्लामा इक़बाल के शेर फर्राटे से बोलते हैं. बातों बातों में उन्होंने ये शेर सुना डाला-

'आसमां तेरी लहद (क़ब्र) पर शबनम आफ़शानी करे,

सब्ज़-ए- नौरुस्ता उस घर की निगहबानी करे.'

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