कितनी आम है आम आदमी पार्टी?

अरविंद केजरीवाल
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आम आदमी पार्टी की स्थापना 26 नवंबर 2012 को हुई. इसके एक साल बाद इसने पहली बार चुनाव लड़ा और दिल्ली विधानसभा में 28 सीटें जीत कर सब को चौंका दिया.

इस तरह भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक मुहिम से एक सियासी पार्टी तक का इसका सफ़र पूरा हुआ.

अब इसके हाव-भाव एक राजनीतिक पार्टी की तरह नज़र आते हैं, लेकिन अब कितनी आम है ये आम आदमी पार्टी?

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अरविंद केजरीवाल

पश्चिम दिल्ली का घनी आबादी वाला शास्त्री नगर इलाक़ा. इस इलाक़े का मुखौटा शहरों वाला है, लेकिन इसके तेवर अब भी ग्रामीण इलाक़ों वाले हैं.

इस बस्ती को ऊंचे खम्बों पर चीरती हुई जाती हैं मेट्रो की लाइनें, लेकिन इसके बावजूद यहाँ यातायात अराजकता चारों तरफ नज़र आती है.

ये बस्ती आम आदमी वाली बस्ती है और यहाँ की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी जद्दोजहद वाली है.

शास्त्री नगर की इस नीरस जिंदगी में पिछले दिनों उस समय हलचल हुई जब आम आदमी पार्टी की नेता और अभिनेत्री गुल पनाग चुनाव के लिए रोड शो करने आईं.

अरविंद केजरीवाल

उनके आने से पहले से ही काफी हलचल थी. ऑटो रिक्शा पर लाउडस्पीकर से बार बार उनके आने का एलान किया जा रहा था.

तंग गलियों में लोगों की भीड़ जमा होने लगी थी. वो तीन घंटे देर से आईं. लेकिन उनके आने पर अफ़रातफ़री मच गई. धक्का मुक्की शुरू हो गई.

रिक्शा वालों और मज़दूरों को उस जगह पर आने से रोक दिया गया जहाँ वो प्रचार के लिए आईं थी.

ख़ास नेता

गुल पनाग

आम आदमी पार्टी के एक कार्यकर्ता ने कहा कि रिक्शा वाले आदमी हैं, उन्हें न रोका जाए, लेकिन दूसरे कार्यकर्ता इतने उत्साहित थे कि उन्होंने किसी की न सुनी और बस्ती की ख़ास गली में यातायात बंद हो गया.

गुल पनाग अपनी गाड़ी से उतरीं तो वहां जमा लोग और भी उत्साहित हो गए. एक ने मोटर साइकिल पर चढ़ कर कहा, 'मैंने गुल पनाग को देख लिया'. वो इसी में खुश था.

ऐसा लग रहा था कि लोग उन्हें देखने ज़्यादा आए थे, सुनने कम.

ये ज़ाहिर था कि वो आम आदमी पार्टी की एक ख़ास नेता थीं. कई आम आदमियों ने उनसे हाथ मिलाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें इस भीड़ में सफलता नहीं मिली.

आम आदमी कौन?

अरविंद केजरीवाल

आम आदमी पार्टी के सब से जाने माने नेता हैं अरविंद केजरीवाल. एक सप्ताह पहले मैं दक्षिण दिल्ली में अपने घर के पास खड़ा था.

वहां लोग उनसे मिलने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन कार्यकर्ताओं से घिरे केजरीवाल से उनके प्रशांकों का फ़ासला लम्बा था. वो केवल हाथ जोड़े, अपने मफलर के ऊपर मुस्कुराते हुए वहां से गुज़र रहे थे.

शास्त्री नगर से मेट्रो लेकर मैं वापस दफ्तर के लिए जब ट्रेन पर बैठा तो तीन युवाओं की बातों पर मेरा धयान गया.

वो स्टेशन पर आम आदमी पार्टी के उन इश्तेहारों को देख कर बातें कर रहे थे जो शीशों में फ्रेम किए हुए थे और काफी महंगे इश्तेहार लग रहे थे.

एक ने कहा, "आम आदमी पार्टी के पास इतने पैसे हैं कि इतने महंगे इश्तेहार और पोस्टर स्टेशन पर लगा रहे हैं."

दूसरे ने कहा, "अरे यार आम आदमी ये लोग नहीं, हम हैं, जो इस भीड़ भाड़ वाली ट्रेन से रोज़ सफ़र करते हैं.'

'खास लोगों की आम पार्टी'

योगेंद्र यादव

आम आदमी पार्टी अब भी अधिकतर आम आदमियों से भरी है, लेकिन इन युवाओं की राय ये थी कि इसके नेता अब ख़ास होते जा रहे हैं.

उन जैसे आम लोगों से मिलने का उनके पास समय कम होता है. आखिर में एक ने कहा ये अब ख़ास आदमियों की आम आदमी पार्टी हो गई है. इस पर सभी हंस पड़े.

मेरा स्टेशन आ चुका था और मैं ट्रेन से उतरने के बाद ये सोचने लगा कि क्या इन युवाओं की बातों में कोई दम है?

फिर मैंने सोचा क्या भारतीय जनता पार्टी में एक आम आदमी के लिए अमित शाह से मिलना आसान है?

क्या कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी से मिलना आसान है? लेकिन फिर मैंने सोचा ये आम आदमियों की पार्टी होने का दावा भी तो नहीं करतीं.

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