भूमि अधिग्रहण बिल: विकल्प तो हैं पर...

भूमि अधिग्रहण बिल के ख़िलाफ प्रदर्शन करती महिलाएं
    • Author, प्रदीप सिंह
    • पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

भूमि अधिग्रहण संबंधी बिल केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के लिए मुश्किल का सबब बन गया है.

देश में विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने और रोज़गार के नए अवसर पैदा करने के लिए सरकार को यह कानून बहुत ज़रूरी लगता है.

लेकिन राज्यसभा की बाधा पार करने का रास्ता अभी तक वह खोज नहीं पाई है. सरकार के सामने विकल्प तो कई हैं लेकिन कोई सीधा और आसान नहीं है.

इसी सत्र में करे कोशिश

खेत में काम करता किसान

अभी तो फौरी तौर पर भारत सरकार को तय करना है कि अध्यादेश का क्या करे. उसे खत्म हो जाने दे या फिर से जारी करे. मौजूदा अध्यादेश पांच अप्रैल को खत्म हो जाएगा.

संसद का बजट सत्र एक महीने के रिसेस पर है. संविधान के अनुच्छेद 123 के मुताबिक संसद का सत्र चल रहा हो तो अध्यादेश जारी नहीं किया जा सकता.

उसके लिए ज़रूरी है कि दोनों में से कम से कम एक सदन का सत्रावसान किया जाए.

ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो रहा हो. इससे पहले तेरह बार संसद के एक सदन के बीच में सत्रावसान करके अध्यादेश जारी किया जा चुका है.

पर सवाल है कि क्या राष्ट्रपति अध्यादेश फिर से जारी करने के लिए राज़ी होंगे. क्योंकि सरकार को उन्हें बताना पड़ेगा कि अध्यादेश फिर से जारी करने की इमरजेंसी क्या है?

विधेयक लाने का दूसरा तरीका

स्वदेशी जागरण मंच
इमेज कैप्शन, मेक इन इंडिया के विरोध में है स्वदेशी जागरण मंच.

सरकार के सामने दूसरा विकल्प यह है कि अध्यादेश को खत्म होने दे और बजट सत्र के दूसरे भाग में विधेयक पेश करे.

इस मसले पर सरकार घर के अंदर यानी संघ परिवार में सहमति बना चुकी है.

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भारतीय किसान संघ को भी विधेयक के कई प्रावधानों पर एतराज़ था. लेकिन सरकार ने विपक्षी दलों और पार्टी के अंदर चर्चा के बाद विधेयक में नौ संशोधन किए हैं.

अन्ना हज़ारे
इमेज कैप्शन, अन्ना हज़ारे भी उतरे प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण बिल के ख़िलाफ

इन संशोधनों के बाद संघ और भारतीय किसान संघ का एतराज़ ख़त्म हो गया है. दोनों ही इस मुद्दे पर अब सरकार के साथ हैं.

संघ और भाजपा नेताओं की उच्च-स्तरीय बैठक में इस बात पर भी सहमति बनी है कि सरकार की नीतियों से मतभेद होने पर उसे सार्वजनिक रूप से उठाने की बजाय मामला घर के अंदर ही सुलझाया जाएगा.

विपक्ष को तोड़े

सोनिया गांधी
इमेज कैप्शन, कांग्रेस, सपा, तृणमूल कांग्रेस और वाम दलों सहित 10 विपक्षी दलों ने किया इसके ख़िलाफ मार्च

घर के मोर्चे पर शांति स्थापित करने में कामयाबी के बाद मोदी सरकार के रणनीतिकारों की नजर ग़ैर-कांग्रेसी और ग़ैर-वामपंथी दलों पर है.

सरकार चाहती है कि जिस तरह कोयला और ख़दान विधेयक पर वह विपक्षी एकता तोड़ने में कामयाब रही वैसा ही भूमि अधिग्रहण से संबंधित कानून के मामले में भी हो जाए.

इसके लिए सरकार दो तीन मोर्चों पर एक साथ काम कर रही है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार
इमेज कैप्शन, विधेयक का विरोध करने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक दिन का उपवास रखा

एक तो बातचीत के जरिए विधेयक में कुछ और संशोधन के लिए सरकार ने विकल्प खुला रखा है.

दूसरा क्षेत्रीय दलों को यह समझाने की कोशिश हो रही है कि इस विधेयक का पास होना उनके राज्य के विकास में सहायक होगा.

सरकार यह भी कह रही है कि जो राज्य इसे लागू न करना चाहें वे पुराने कानून के आधार पर ही भूमि अधिग्रहण करने के लिए स्वतंत्र हैं.

लालू प्रसाद यादव
इमेज कैप्शन, लालू प्रसाद यादव भी मोदी सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरे.

इसके पीछे सरकार की सोच यह है कि देश की जीडीपी में चालीस फ़ीसदी से ज्यादा का योगदान करने वाले राज्यों में भाजपा या उसके सहयोगी दलों की सरकार है.

वेस्टर्न फ्रेट कॉरीडोर जिन सात राज्यों दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र से गुज़रेगा उनमें से पांच में भाजपा का शासन है.

सरकार तर्क दे रही है कि जो विकास न करना चाहे वह दूसरों को विकास से कैसे रोक सकता है.

संयुक्त अधिवेश की राह

कांग्रेसी नेता विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेते हुए
इमेज कैप्शन, कांग्रेसी नेता विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेते हुए

सरकार के सामने एक और विकल्प है कि वह संसद के बजट सत्र के दूसरे हिस्से में लोकसभा से पास विधेयक को राज्यसभा में पेश करे.

विपक्ष यदि मांग करता है तो उसे राज्यसभा की प्रवर समिति को भेज दिया जाए उसकी रिपोर्ट बजट सत्र ख़त्म होने से पहले मंगा ली जाए.

इसके बावजूद राज्यसभा में विधेयक गिरता है तो संसद सत्र खत्म होने के बाद दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेश बुलाकर इसे पास करा लिया जाय.

मेक इन इंडिया कार्यक्रम का लांच

मोदी सरकार का मेक इन इंडिया का पूरा अभियान भूमि अधिग्रहण पर टिका है. इसके बिना इंडस्ट्रियल कॉरीडोर की पूरी योजना धरी रह जाएगी.

किसानों को दे सकती है सहूलियतें

लेकिन इस बीच सरकार की एक और चिंता है. इस मुद्दे पर उसकी छवि किसान विरोधी बन रही है.

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

इसे ठीक करने के लिए प्रधानमंत्री ने रेडियो पर मन की बात में इस मुद्दे को उठाया.

इसके अलावा भाजपा और संघ परिवार के दूसरे संगठन सरकार की इस छवि को बदलने के लिए बड़े पैमाने प्रचार अभियान की तैयारी कर रहे हैं.

सरकार इसके लिए किसानों को कई तरह की सहूलियतें देने का ऐलान कर सकती है.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>