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दांतों को सेहतमंद रखना है, तो क्या खाएं और क्या न खाएं?
- Author, जैस्मीन फ़ॉक्स-स्केली
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 10 मिनट
सोचिए, आपके मुंह में एक ऐसी दुनिया रहती है, जिसे आप देख भी नहीं सकते.
यहां सैकड़ों तरह के बैक्टीरिया और दूसरे सूक्ष्मजीव रहते हैं. इनमें कुछ दांतों को नुक़सान पहुंचाते हैं, तो कुछ उनकी रक्षा करने में मदद करते हैं.
हम अक्सर दांतों को स्वस्थ रखने के लिए ब्रश, फ्लॉस और माउथवॉश की बात करते हैं. लेकिन एक और चीज़ है, जो इस पूरी दुनिया पर बड़ा असर डालती है- वह है हमारा भोजन.
सब जानते है कि बहुत ज्यादा मीठा खाने से कैविटी हो सकती है. इसकी वजह यह है कि चीनी मुंह में मौजूद नुक़सानदेह बैक्टीरिया को बढ़ाने और एसिड बनाने में मदद करती है.
लेकिन कहानी सिर्फ़ ये नहीं है कि हमें क्या नहीं खाना चाहिए. यह भी मायने रखता है कि हम क्या खाते हैं.
और हैरानी कि बात यह है कि फल, चाय, चीज़ और कुछ फर्मेंटेड फूड भी मुंह में रहने वाले फायदेमंद बैक्टीरिया के लिए मददगार हो सकते हैं.
मुंह के अंदर बैक्टीरिया की अपनी दुनिया
हमारे मुंह में करीब 700 तरह के बैक्टीरिया रहते हैं. इनके अलावा वायरस, फंगस और दूसरे सूक्ष्मजीव भी मौजूद होते हैं. इन सबको मिलाकर ओरल माइक्रोबायोम कहा जाता है.
हर सूक्ष्मजीव की अपनी पसंदीदा जगह होती है. कुछ दांतों की सतह पर रहते हैं, कुछ जीभ पर और कुछ दांतों और मसूड़ों के बीच की छोटी-छोटी जगहों में.
इनमें से कुछ नुकसानदेह होते हैं.
मिसाल के तौर पर, स्ट्रेप्टोकोकस म्यूटन्स दांतों की सतह पर पाया जाता है और इसे चीनी बहुत पसंद है. यह चीनी को एसिड में बदल देता है.
ये अम्ल दाँतों की सुरक्षात्मक इनेमल परत को धीरे-धीरे नुकसान पहुँचाते हैं. समय के साथ दाँतों में छोटे-छोटे छेद या कैविटी बन सकती हैं.
अमेरिका में 30 की उम्र के मध्य तक पहुंचने वाले 80 फीसदी से ज्यादा लोगों को कैविटी हो चुकी होती है.
लेकिन मुंह में सिर्फ़ नुक़सानदेह बैक्टीरिया ही नहीं होते. वेयलोनेला, एक्टिनोमाइसीस और स्ट्रेप्टोकोकस और नाइसेरिया की कुछ प्रजातियां फायदेमंद हो सकती हैं.
ये बैक्टीरिया नुकसानदेह बैक्टीरिया और बीमारी पैदा करने वाले दूसरे सूक्ष्मजीवों को मुंह में जगह बनाने से रोकने में मदद कर सकते हैं.
यानी मुंह में अच्छे और बुरे बैक्टीरिया के बीच लगातार एक तरह की होड़ चलती रहती है.
जब मुंह का संतुलन बिगड़ता है
ओरल माइक्रोबायोम का संतुलन सिर्फ़ दांतों के लिए महत्वपूर्ण नहीं है.
अगर हम दांतों की नियमित और अच्छी तरह सफाई नहीं करते, तो दांतों और मसूड़ों के बीच छोटी-छोटी जेब जैसी जगहें बन सकती हैं.
इनमें ऑक्सीजन कम होती है और पॉर्फ़ाइरोमोनास जिंजिवालिस जैसे बैक्टीरिया आसानी से बढ़ सकते हैं. पॉर्फ़ाइरोमोनास जिंजिवालिस मसूड़ों की बीमारी का कारण बन सकता है.
वैज्ञानिकों ने इसे हृदय रोग, डिप्रेशन, अल्जाइमर, डायबिटीज़, इंफ़्लेमेटरी बाउल डिसीज़, रूमेटाइड आर्थराइटिस और समय से पहले बच्चे के जन्म जैसे स्वास्थ्य जोखिमों से भी जोड़ा है.
हाल के वर्षों में खराब ओरल माइक्रोबायोम, आंत के कैंसर और अग्न्याशय के कैंसर के बीच संभावित संबंध पर भी रिसर्च हुई है.
एक हालिया स्टडी में अमेरिका के अलग-अलग हिस्सों के वैज्ञानिकों ने लोगों की लार में मौजूद सूक्ष्मजीवों की जांच की और बाद में उनके कैंसर के जोखिम को देखा.
जिन लोगों के ओरल माइक्रोबायोम में दांतों की सड़न से जुड़े कुछ बैक्टीरिया या कैंडिडा यीस्ट पाए गए, उनमें अग्न्याशय के कैंसर का जोखिम ज्यादा पाया गया.
हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि ये सूक्ष्मजीव सीधे कैंसर का कारण बनते हैं. वैज्ञानिक अभी इनके बीच के संबंध को समझने की कोशिश कर रहे हैं.
वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि मुंह में कई तरह के सूक्ष्मजीवों का होना अच्छा है. यानी माइक्रोबायोम में जितनी ज्यादा विविधता होगी, उसका संतुलन उतना बेहतर हो सकता है.
एक स्टडी में मुंह में सूक्ष्मजीवों की कम विविधता और डिप्रेशन के बीच भी संबंध पाया गया.
सिर्फ़ ब्रश करना काफ़ी नहीं
यहां एक अहम बात है. सिर्फ़ दांतों को ब्रश करना ही ओरल माइक्रोबायोम को स्वस्थ रखने के लिए पर्याप्त नहीं है.
क्योंकि आप जो खाते हैं, वही आपके मुंह में रहने वाले सूक्ष्मजीव भी खाते हैं.
इसलिए हमारा खान-पान इस बात पर असर डाल सकता है कि मुंह में कौन से बैक्टीरिया बढ़ेंगे और कौन से कम होंगे.
सबसे पहले उन चीज़ों को कम करना चाहिए जिनमें बहुत ज्यादा चीनी होती है. कैविटी पैदा करने वाले बैक्टीरिया चीनी का आसानी से इस्तेमाल करते हैं.
प्रोसेस्ड कार्बोहाइड्रेट भी कम खाना बेहतर है, क्योंकि मुंह में ये आसानी से टूटकर शुगर में बदल सकते हैं.
इसमें सफेद ब्रेड, क्रैकर्स, बिस्किट, केक और प्रेट्ज़ेल जैसे स्टार्च वाले स्नैक्स शामिल हैं.
दूसरी तरफ, फायदेमंद बैक्टीरिया को बढ़ावा देना भी मददगार हो सकता है.
ये बैक्टीरिया, नुक़सानदेह बैक्टीरिया के साथ खाने और जगह के लिए मुक़ाबला करते हैं. इससे नुक़सानदेह बैक्टीरिया के लिए बढ़ना और मुंह में अपनी जगह बनाना मुश्किल हो सकता है.
कुछ फायदेमंद बैक्टीरिया ऐसे प्रोटीन और दूसरे पदार्थ भी बनाते हैं, जो नुक़सानदेह सूक्ष्मजीवों पर सीधे हमला कर सकते हैं.
अमेरिका की पेनसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफ़ेसर लॉरा वाइरिख़, ओरल माइक्रोबायोम पर रिसर्च करती हैं.
वे बताती हैं कि स्ट्रेप्टोकोकस परिवार के कुछ बैक्टीरिया बहुत कम एसिड बनाते हैं और ज्यादा एसिड बनाने वाले दूसरे सूक्ष्मजीवों पर हमला कर सकते हैं.
मिसाल के तौर पर एस. सलिवेरियस नाम का फायदेमंद बैक्टीरिया ऐसे प्रोटीन बनाता है, जो कई तरह के नुक़सानदेह सूक्ष्मजीवों को ख़त्म कर सकते हैं.
इनमें कुछ ऐसे रोग पैदा करने वाले सूक्ष्मजीव भी शामिल हैं, जो आम एंटीबायोटिक दवाओं के असर से बचने की क्षमता रखते हैं.
हरी सब्ज़ियां क्यों फायदेमंद
अगर आप अपने ओरल माइक्रोबायोम को स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो हरी पत्तेदार सब्ज़ियां ज्यादा खाना अच्छा कदम हो सकता है.
केला, पालक, चुकंदर और मूली जैसी सब्ज़ियों में नाइट्रेट की मात्रा ज्यादा होती है.
मुंह में मौजूद नाइसेरिया जैसे बैक्टीरिया नाइट्रेट का इस्तेमाल करते हैं और उसे नाइट्राइट में बदल देते हैं.
इसके बाद आंतों में मौजूद बैक्टीरिया इसे आगे ऐसे पदार्थों में बदलते हैं, जिनसे नाइट्रिक ऑक्साइड बन सकता है.
नाइट्रिक ऑक्साइड रक्त वाहिकाओं को फैलाने और ब्लड प्रेशर कम करने में मदद करता है. इससे दिल और रक्त वाहिकाओं की सेहत को फ़ायदा हो सकता है.
एक स्टडी में अधिक उम्र के लोगों ने दो हफ़्तों तक दिन में दो बार नाइट्रेट से भरपूर चुकंदर का जूस पिया. इस दौरान उनके ब्लड प्रेशर में कमी देखी गई.
लहसुन भी दिलचस्प उदाहरण है.
इसे चबाने से सांसों में बदबू आ सकती है, लेकिन इसमें एलिसिन नाम का रसायन होता है, जो कैविटी और मसूड़ों की बीमारी से जुड़े कुछ बैक्टीरिया पर असर डाल सकता है.
चाय, फल और पॉलीफ़ेनॉल
पौधों से मिलने वाले खाने में पॉलीफ़ेनॉल नाम के प्राकृतिक पदार्थ पाए जाते हैं.
ये एंटीऑक्सीडेंट की तरह काम करते हैं और पौधों की कोशिकाओं और ऊतकों को नुक़सान से बचाने में मदद करते हैं.
पौधों के लिए पॉलीफ़ेनॉल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि जानवर खतरे की स्थिति में दूसरी जगह जा सकते हैं, लेकिन पौधे ऐसा नहीं कर सकते.
इसलिए गर्मी, ठंड या तेज धूप जैसी मुश्किल परिस्थितियों से बचने के लिए वे ऐसे पदार्थ बनाते हैं.
लेकिन पॉलीफ़ेनॉल इंसानों के लिए भी फायदेमंद हो सकते हैं.
शिकागो स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ़ इलिनॉय के कॉलेज ऑफ़ डेंटिस्ट्री की प्रोफ़ेसर क्रिस्टीन वू और उनके सहयोगियों की रिसर्च में पाया गया कि चाय में मौजूद पॉलीफ़ेनॉल कैविटी और मसूड़ों की बीमारी से जुड़े कुछ नुक़सानदेह बैक्टीरिया को दबा सकते हैं.
ये बैक्टीरिया को आपस में चिपकने और दांतों की सतह पर जमा होने से भी रोक सकते हैं. वू के मुताबिक, पॉलीफ़ेनॉल प्लाक को चिपचिपा बनाने वाले एक एंजाइम के काम को रोकते हैं.
उनकी एक स्टडी में चाय पीने से सांसों की बदबू से जुड़े कुछ बैक्टीरिया पर भी असर देखा गया. ये बैक्टीरिया जीभ के पिछले हिस्से में रहते हैं.
कई फल, ख़ासकर गहरे रंग वाले बेरीज़ भी पॉलीफ़ेनॉल से भरपूर होते हैं. यह थोड़ा हैरान करने वाला लग सकता है क्योंकि फलों में प्राकृतिक चीनी और एसिड भी होता है.
लेकिन वू की रिसर्च में पाया गया है कि क्रैनबेरी जूस दांतों पर प्लाक बनने से रोकने में मदद कर सकता है, कैविटी और मसूड़ों की बीमारी से जुड़े कुछ बैक्टीरिया के विकास को सीमित कर सकता है.
शहद में भी पॉलीफ़ेनॉल होते हैं. कुछ अध्ययनों में इसे प्लाक बनने से रोकने और कैविटी पैदा करने वाले बैक्टीरिया से लड़ने में मददगार पाया गया है.
चीज़ और फ़र्मेंटेड फ़ूड का फ़ायदा
चीज़ भी मुंह के माइक्रोबायोम के लिए फ़ायदेमंद हो सकती है.
इटली में किए गए एक छोटे अध्ययन में नौ लोगों को लगातार पांच दिनों तक रोज़ ग्राना पडानो चीज़ खिलाई गई.
अध्ययन के अंत में उनके मुंह में मौजूद बैक्टीरिया के समुदाय में थोड़ा बदलाव देखा गया.
चीनी पसंद करने वाले और कैविटी से जुड़े एस. म्यूटन्स की मात्रा कम हुई, जबकि स्वस्थ मुंह में ज्यादा पाए जाने वाले एस. सेंग्विनिस की मात्रा बढ़ी.
चीज़ एक और तरीके से मदद कर सकती है.
इसे चबाने से मुंह में ज्यादा लार बनती है. लार दांतों और मुंह से अतिरिक्त चीनी हटाने में मदद करती है. साथ ही, यह मुंह में बनने वाले एसिड के असर को भी कम करती है.
फ़र्मेंटेड फ़ूड भी मददगार हो सकते हैं. इनमें ऐसे लाभदायक बैक्टीरिया होते हैं, जो नुक़सानदेह बैक्टीरिया से मुक़ाबला करते हैं.
मिसाल के तौर पर, एक हालिया रिसर्च समीक्षा में पाया गया कि केफिर, जो फर्मेंटेड दूध से बना पेय है, कुछ नुक़सानदेह ओरल बैक्टीरिया के विकास को रोक सकता है. यह इन बैक्टीरिया को चिपचिपी परत यानी बायोफ़िल्म बनाने से भी रोक सकता है.
कोई एक सुपरफ़ूड नहीं है
इसके बावजूद वैज्ञानिकों का कहना है कि ओरल हेल्थ के लिए कोई एक 'सुपरफ़ूड' नहीं है.
इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ कैटानिया के एसोसिएट प्रोफेसर गाएटानो इसोला के मुताबिक़, सबसे ज्यादा मायने रखता है कि हम कुल मिलाकर किस तरह का खाना खाते हैं.
अगर हम बार-बार रिफाइंड चीनी और ऐसे कार्बोहाइड्रेट खाते हैं, जिन्हें मुंह के बैक्टीरिया आसानी से तोड़ सकते हैं, तो इससे ऐसे सूक्ष्मजीवों को बढ़ावा मिलता है जो एसिड बनाने और उसे सहन करने में माहिर होते हैं.
समय के साथ इससे मुंह के सूक्ष्मजीवों का संतुलन बिगड़ सकता है.
इसके उलट, ऐसी डाइट जिसमें साबुत पौधों से मिलने वाले खाद्य पदार्थ, फाइबर और कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट ज्यादा हों और रिफ़ाइंड चीनी कम हो, वह मुंह के माइक्रोबायोम के संतुलन के लिए बेहतर हो सकती है.
इसोला की आसान सलाह है कि रिफ़ाइंड कार्बोहाइड्रेट की जगह सब्ज़ियां, साबुत फल, दालें और साबुत अनाज ज्यादा खाएं.
मेडिटेरेनियन डाइट भी इसका अच्छा उदाहरण है. इसमें फल, सब्ज़ियां, साबुत अनाज और स्वस्थ वसा को ज्यादा महत्व दिया जाता है.
एक हालिया स्टडी में, जिसमें इसोला भी शामिल थे, पाया गया कि जो लोग मेडिटेरेनियन डाइट को ज्यादा करीब से अपनाते थे, उनमें मसूड़ों की बीमारी कम गंभीर थी.
जो लोग इस डाइट का कम पालन करते थे, उनमें बीमारी ज्यादा गंभीर थी. ख़ासकर उन लोगों में जो बार-बार लाल मांस खाते थे.
हालांकि, लाल मांस और मसूड़ों की बीमारी के बीच यह संबंध क्यों है, यह अभी साफ़ नहीं है.
एक संभावना यह है कि प्रोटीन मुंह में ऐसा माहौल बनाने में मदद कर सकता है, जो पॉर्फ़ाइरोमोनास जिंजिवालिस जैसे नुक़सानदेह बैक्टीरिया के लिए अनुकूल हो.
ब्रश और फ़्लॉस करना फिर भी ज़रूरी
खाने की आदतें कितनी भी अच्छी हों, ब्रश और फ़्लॉस की जगह नहीं ले सकतीं.
फ़्लॉसिंग को दांतों की सड़न से जुड़े एस. म्यूटन्स जैसे बैक्टीरिया की कम मात्रा से जोड़ा गया है.
वहीं, दांतों और जीभ को ब्रश करने से दांतों और मसूड़ों की बीमारी से जुड़े बैक्टीरिया की संख्या काफ़ी कम हो सकती है.
माउथवॉश को लेकर वैज्ञानिक अभी यह पूरी तरह नहीं जानते कि आम तौर पर मिलने वाले माउथवॉश लंबे समय में ओरल माइक्रोबायोम पर क्या असर डालते हैं.
उम्मीद है कि भविष्य में ऐसे माउथवॉश बनाए जा सकेंगे, जो मुंह में मौजूद सभी बैक्टीरिया को कम करने के बजाय अच्छे और नुक़सानदेह बैक्टीरिया के बीच संतुलन बनाने में मदद करें.
दूसरी तरफ, क्लोरहेक्सिडीन वाले कुछ माउथवॉश मुंह में मौजूद सूक्ष्मजीवों के संतुलन को बिगाड़ने के लिए जाने जाते हैं.
फिर भी मसूड़ों की बीमारी और कुछ दूसरी ओरल समस्याओं के इलाज में इनका थोड़े समय के लिए इस्तेमाल मददगार हो सकता है.
तो आखिर क्या खाएं
मुंह के माइक्रोबायोम को स्वस्थ रखने के लिए किसी एक खास 'सुपर फ़ूड' की ज़रूरत नहीं है.
सबसे ज़रूरी है कि हमारा पूरा खान-पान संतुलित हो.
सब्ज़ियां, ख़ासकर हरी पत्तेदार सब्ज़ियां ज्यादा खाएं. साबुत फल, दालें, साबुत अनाज और पर्याप्त प्रोटीन लें. चीज़, चाय और फ़र्मेंटेड फ़ूड भी संतुलित डाइट का हिस्सा हो सकते हैं.
दूसरी तरफ, मीठे पेय और बार-बार खाई जाने वाली चीनी वाली चीज़ों को कम करना बेहतर है.
लॉरा वाइरिख के मुताबिक, सलाह भले ही साधारण लगे, लेकिन यही सबसे जरूरी है. संतुलित खाना खाएं, खूब सारी सब्ज़ियां और हरी पत्तेदार सब्ज़ियां लें, पर्याप्त प्रोटीन लें और चीनी, खासकर मीठे पेय, का सेवन कम करें.
और ब्रश और फ्लॉस करना न भूलें.
क्योंकि हमारे मुंह में रहने वाले ये छोटे-छोटे जीव दिखाई नहीं देते, लेकिन हम जो खाते हैं, उसका असर उन पर भी पड़ता है.
तो अगली बार जब आपकी प्लेट में हरी सब्ज़ियों से भरा सलाद हो, साथ में थोड़ा चीज़ और एक कप गर्म चाय हो, तो याद रखिए.
यह खाना सिर्फ़ आपके शरीर के लिए नहीं है.
आपके मुंह में रहने वाले अच्छे बैक्टीरिया भी इससे खुश हो सकते हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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