कैसी रहीं आयुष्मान-सोनम की 'बेवकूफ़ियां' ?

'बेवकूफ़ियां'
    • Author, कोमल नाहटा
    • पदनाम, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक
  • प्रकाशित

रेटिंग: *1/2

यशराज फ़िल्म्स की बेवकूफ़ियां मोहित चड्ढा (आयुष्मान खुराना) और मायरा सहगल (सोनम कपूर) की लव स्टोरी है. दोनों अच्छी नौकरियों पर हैं लेकिन मायरा, मोहित से ज़्यादा कमाती है.

मायरा के पिता वी के सहगल (ऋषि कपूर) एक रिटायर्ड आईएएस अफ़सर हैं. वो बेहद कड़क और उसूलों के पक्के इंसान हैं और अपनी बेटी के लिए उनके बड़े ऊंचे ख़्वाब हैं.

वो मायरा की शादी किसी बेहद अमीर लड़के से करना चाहते हैं. इसी वजह से जब मायरा, अपने पिता को मोहित के बारे में बताती है तो वो ख़ुश नहीं होते और उसे मोहित को रिजेक्ट करने के लिए उसके बारे में तमाम जानकारियां हासिल करने की ठान लेते हैं.

इधर मंदी की वजह से मोहित को अपनी नौकरी गंवानी पड़ती है. मायरा उसे सलाह देती है कि वो भूलकर भी अपनी इस नौकरी छूटने वाली बात उसके पिता को ना बताए वर्ना वो उनकी शादी के लिए कभी नहीं मानेंगे.

इस दौरान मोहित के ख़र्चे और उसके रहने का ख़र्च मायरा और मोहित का दोस्त (प्रताप हांडा) मिलकर उठाते हैं.

इस बीच परिस्थितियों का चक्र कुछ ऐसा चलता है कि मायरा के पिता को लगने लगता है कि मोहित ही उनकी बेटी के लिए सही पसंद है.

लेकिन तभी मायरा उन्हें बताती है कि उसका और मोहित का अलगाव हो चुका है ? आगे क्या होता है, यही फ़िल्म की कहानी है.

कहानी

'बेवकूफ़ियां'

हबीब फ़ैसल की कहानी में मेट्रो शहर के नौकरी पेशा युवाओं की लाइफ़ स्टाइल को फ़ोकस किया गया है.

उन्होंने फ़िल्म में युवा पीढ़ी और बुज़ुर्ग पीढ़ी के बीच के तनाव और मतभेद को सही तरीके से दिखाया गया है. लेकिन फ़िल्म के साथ सबसे बड़ी दिक़्क़त ये है कि ये बार-बार अपनी पकड़ खो देती है और भटकने लगती है.

हालांकि आयुष्मान और सोनम कपूर के साथ-साथ ऋषि कपूर और आयुष्मान के बीच के कई दृश्य अच्छे बन पड़े हैं. ऋषि कपूर और सोनम कपूर के बीच की केमेस्ट्री भी अच्छी नज़र आती है. लेकिन एक हद के बाद फ़िल्म उबाऊ लगने लगती है.

क्लाईमेक्स दिल को छू लेता है लेकिन बहुत ज़्यादा असर नहीं छोड़ पाता क्योंकि ये विश्वसनीय नहीं लगता.

हबीब फ़ैसल के लिखे संवाद अच्छे और मनोरंजक हैं.

अभिनय

'बेवकूफ़ियां'

ऋषि कपूर ने सोनम के पिता के रोल में जान डाल दी है और एक और ज़बरदस्त परफ़ॉर्मेंस दी है. दर्शकों को उनका किरदार बेहद पसंद आएगा क्योंकि ऋषि कपूर इस रोल में बड़े स्वाभाविक और बेहतरीन रहे हैं.

आय़ुष्मान खुराना ने भी अपने रोल के साथ पूरा न्याय किया है. उन्होंने मोहित चड्ढा के किरदार को बड़ी सहजता से निभाया है.

सोनम कपूर ने मायरा के किरदार को शानदार तरीके से निभाया है. उनके किरदार में जो चुलबुलापन ज़रूरी था उसे उन्होंने पूरी तरह से रोल में लाया है. वो काफ़ी ग्लैमरस लगी हैं. बिकिनी सीन में भी वो कमाल की लगी हैं.

बाकी कलाकार भी अच्छे रहे हैं.

निर्देशन

'बेवकूफ़ियां'

नुपूर अस्थाना का निर्देशन ठीक-ठाक है लेकिन वो फ़िल्म में निरंतरता नहीं रख पाई हैं और फ़िल्म बीच-बीच में अपनी चमक खो देती है.

इसी वजह से फ़िल्म दर्शकों को बांधे नहीं रख पाती. रघु दीक्षित का संगीत अच्छा है लेकिन ये युवा दर्शकों को लुभाने में नाकाम रहा है.

कुल मिलाकर बेवकूफ़ियां, सिर्फ़ कुछ हिस्सों में ही दर्शकों का मनोरंजन करती है. ये दर्शकों पर ज़्यादा असर नहीं छोड़ पाती. बॉक्स ऑफ़िस पर इसका अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद बहुत कम है.

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