लग पाएगा 'रिवॉल्वर रानी' का निशाना?

'रिवॉल्वर रानी'
    • Author, कोमल नाहटा
    • पदनाम, वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक
  • प्रकाशित

रेटिंग: **

पोंटी चड्ढा, मूविंग पिक्चर्स, तिग्मांशु धूलिया और क्राउचिंग टाइगर प्रोडक्शन की रिवॉल्वर रानी कहानी है एक तेज़ तर्रार और आपराधिक छवि वाली अलका सिंह (कंगना रानाउत) की, जो चंबल इलाक़े में रहती है.

वो अपने दुश्मनों को छोड़ती नहीं और बात-बात पर गोलियां चला देती है. परिवार के नाम पर उसके सिर्फ़ एक मामा (पीयूष मिश्रा) होते हैं. वो बेवफ़ाई की वजह से अपने पति की हत्या कर देती है.

चंबल इलाक़े से एक भ्रष्ट राजनेता उदय भान सिंह (ज़ाकिर हुसैन) चुनाव जीत जाता है. अलका सिंह विपक्षी नेता होती है और वो उदय भान सिंह का भंडा फोड़ करना चाहती है.

इस बीच अलका की मुलाक़ात रोहन कपूर (वीर दास) से होती है जो फ़िल्मों में हीरो बनने के लिए संघर्षरत है. वो रोहन से प्यार कर बैठती है और उसका साथ पाकर अपना अकेलापन भूलने लगती है.

लेकिन रोहन सिर्फ़ उसके साथ इसलिए रहता है क्योंकि अलका, उसके लिए एक फ़िल्म बनाने का वादा करती है.

'रिवॉल्वर रानी'

रोहन, निशा (डीना उप्पल) नाम की एक दूसरी लड़की से प्यार करता है. हालांकि अलका को उस पर कई बार शक हो जाता है लेकिन वो किसी ना किसी तरीके से झूठ बोलकर बचता रहता है.

फिर एक दफ़ा अलका के मामा की योजना से उदय भान सिंह की कारगुज़ारियां एक टीवी चैनल पर सामने आ जाती हैं जिसकी वजह से उसे इस्तीफ़ा देना पड़ता है.

फिर से उपचुनाव की घोषणा हो जाती है और इस बार अलका के मामा को लगता है कि वो चुनाव जीत जाएगी.

इन्हीं तैयारियों के बीच पता लगता है कि अलका गर्भवती है. अलका के मामा चाहते हैं कि वो गर्भपात करा ले क्योंकि अगर वो ऐसा नहीं करती तो उसके चुनाव जीतने की संभावनाएं ख़त्म हो जाएंगी.

आगे क्या होता है ? क्या अलका अपने मामा की बात मान लेती है. क्या उसका और रोहन का मिलन हो पाता है. क्या वो चुनाव जीत पाती है. उदय भान सिंह आगे क्या गुल खिलाता है. यही फ़िल्म की कहानी है.

कमज़ोर स्क्रीनप्ले

'रिवॉल्वर रानी'

एक तेज़ तर्रार, आपराधिक लड़की को केंद्र बनाकर लिखी साई कबीर की ये कहानी अच्छी और काफ़ी हट कर है. लेकिन उन्हीं के लिखे स्क्रीनप्ले में वो बात नहीं है.

इसमें स्थिरता और निरंतरता का अभाव है. हालांकि फ़िल्म के कुछ हिस्से मनोरंजक है लेकिन बाक़ी हिस्से बोर और खींचे गए लगते हैं.

कहानी की सबसे बड़ी कमी ये है कि निर्देशक साई कबीर अलका और उसके मामा के बीच मतभेद की प्रभावशाली तरीक़े से नहीं दिखा पाए हैं.

कुछ हिस्से मनोरंजक

इंटरवल से पहले और बाद वाले हिस्से में कुछ अच्छे और मनोरंजक दृश्य हैं. लेकिन पूरी फ़िल्म के बारे में ये बात नहीं कही जा सकती.

वीर दास के किरदार के ज़रिए फ़िल्म में हास्य उत्पन्न करने की अच्छी कोशिश है. दर्शकों को ये पसंद आएगा.

टीवी न्यूज़ एंकर पायल परिहार (मिश्का) का ट्रैक बहुत मज़ेदार है. लोगों का इससे अच्छा मनोरंजन होगा. साई कबीर के लिखे संवाद फ़िल्म की कहानी के अनुरूप हैं और अच्छा प्रभाव छोड़ते हैं.

अभिनय

'रिवॉल्वर रानी'

कंगना रानाउत ने अलका सिंह के केंद्रीय पात्र में जान डाल दी है. उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ ये रोल निभाया है. इस फ़िल्म के बाद उनके और प्रशंसक बढ़ जाएंगे.

कंगना के मामा की भूमिका में पीयूष मिश्रा ज़बरदस्त रहे हैं. अलका के मास्टरमाइंड की भूमिका उन्होंने इतने बेहतरीन तरीके से निभाई है कि दर्शकों में वो छा जाएंगे.

उदय भान सिंह के किरदार में ज़ाकिर हुसैन भी बढ़िया रहे हैं. न्यूज़ एंकर के रोल में मिश्का ने अच्छा काम किया है. फ़िल्म में उनका हर न्यूज़ बुलेटिन ख़त्म करने का ख़ास अंदाज़ लोगों को भा जाएगा. बाक़ी कलाकार भी अच्छे हैं.

निर्देशन

'रिवॉल्वर रानी'

साई कबीर ने ठीक-ठाक निर्देशन किया है. स्क्रीनप्ले में कमी होने के बावजूद उन्होंने कुछ अच्छे दृश्य रचे हैं जो दर्शकों का मनोरंजन करेंगे.

लेकिन फ़िल्म में ज़बरदस्त हिंसा और ख़ून-ख़राबे की वजह से ये पूरे परिवार के साथ देखने योग्य फ़िल्म नहीं बन पाई है.

महिला दर्शकों को शायद फ़िल्म उतनी पसंद ना आए. फ़िल्म का टाइटल ट्रैक मशहूर हो चुका है.

कुल मिलाकर रिवॉल्वर रानी कुछ पार्ट्स में ही मनोरंजक बन पाई है. बॉक्स ऑफ़िस पर इसका चलना मुश्किल ही लग रहा है.

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