कांग्रेस की दुविधाः 'कहां जाई, का करी'

राहुल गांधी, सोनिया गांधी, कांग्रेस
    • Author, मधुकर उपाध्याय
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

कहते हैं कि राजनीति पार्टियों के सहारे चलती है और पार्टियां कार्यकर्ताओं के आसरे.

लेकिन अखिल भारतीय पहचान रखने वाली कांग्रेस के लिए परिवार ही पार्टी रही और पार्टी ही परिवार. नेतृत्व परिवार से आता रहा, पार्टी सत्ता में बनी रही.

समय बदला. सत्ता जाती रही. सवाल शुरू हो गए. नेतृत्व कमज़ोर पड़ता दिखने लगा. लोग राहुल की क़ाबिलियत के बारे में पूछने लगे.

कार्यकर्ता प्रियंका की मांग करते हुए दिख रहे हैं. पार्टी में परिवार की कोटरी पर भी लोगों की नज़र है.

दुविधा और सुविधा की राजनीति के बीच उलझी कांग्रेस की मुश्किलों पर रोशनी डाल रहे हैं मधुकर उपाध्याय.

मधुकर का विश्लेषण

सोनिया गांधी, कांग्रेस

स्थितप्रज्ञता का एक अर्थ सकारात्मक हो सकता है. इस संदर्भ में कि जहां हैं, वहां हैं. अपनी ज़मीन नहीं छोड़ी है. डटे हुए हैं. यह मामूली उपलब्धि नहीं है.

लेकिन इससे बड़ा छलावा भी कुछ नहीं हो सकता. ख़ासतौर पर ऐसे वक़्त में, जब झंझावात चल रहा हो और 'नीलोफ़र' की तरह तट पर दम तोड़ता न दिखाई दे.

कांग्रेस पार्टी, शुतुरमुर्ग की तरह, इस ख़ुशफ़हमी में रही कि तूफ़ान है तो गुज़र जाएगा. उसे नुक़सान होगा पर इतना नहीं कि बाद में खड़ा होना मुश्किल हो जाए.

अप्रैल-मई 2014 के आम चुनाव को छह महीने होने को आए लेकिन पार्टी की ख़ुशफ़हमी ख़त्म होती नहीं लगती.

उलटे उसपर एक भीषण थपेड़ा और पड़ा, जब वह महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव हार गई.

'अक्षय तूणीर'

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

इन परिणामों ने कांग्रेस के उन नेताओं को चुप करा दिया, जो माने बैठे थे कि लोकसभा चुनाव में पार्टी जितना नीचे चली गई है, उससे नीचे नहीं जा सकती.

इसी में कुछ गंभीर-अगंभीर प्रयास होते रहे कि पार्टी इस दलदल से बाहर कैसे निकले.

उसे शायद अहसास है कि वर्तमान माहौल में यथास्थितिवादिता की जगह बची नहीं है क्योंकि राजनीतिक महायुद्ध में सामने एक ऐसा लड़ाका है जो कहीं से 'अक्षय तूणीर' लेकर आ गया है.

हर रोज़ नई कथा, नए पात्र, नया घटनाक्रम. मजबूरी में कांग्रेस की स्थिति केवल बचाव करने और प्रतिक्रिया देने वाली पार्टी की रह गई है.

उसके पास न ज़मीन पर कुछ है, न हवा में. नेतृत्व, सिपहसालार और पैदल योद्धा एक साथ तो हैं पर एक ही दिशा में चलते नहीं दिखते.

बड़ी चुनौतियां

राहुल गांधी

पिछले छह महीने में यह बात ज़्यादा साफ़ हुई है कि उसके योद्धाओं के हथियार भोथरे हैं और उनमें ज़मीनी लड़ाई का मनोबल नहीं रह गया है.

पूरी कोशिश इस बात की लगती है कि सारे तिनके साथ रहें, आंधी में उड़ न जाएं.

कांग्रेस के सामने इस समय दरअसल दो बड़ी चुनौतियां हैं. एक का संबंध 'नेतृत्व' से है और दूसरे का 'पार्ट-टाइम नेतृत्व' से.

पैदल सेना दोनों की तरफ़ देखकर निराश होती लगती है. 'नेतृत्व' की चर्चा से पहले 'पार्ट-टाइम नेतृत्व' का ज़िक्र करना ज़रूरी है.

पार्टी के कई दिग्गज नेता ज़्यादातर समय व्यापार, व्यवसाय, वकालत और दूसरे धंधों में लगाते हैं. पार्टी के हिस्से में बचा-खुचा वक़्त आता है.

जो पूर्णकालिक नेता हैं, उनमें से कई पर 'आरोप' हैं और ख़ुद का बचाव उनकी प्राथमिकता है.

'अनुपस्थिति की पार्टी'

राहुल गांधी

सत्ता में रहते हुए यह सुविधाजीवी व्यवहार चल सकता था लेकिन राजनीति की वर्तमान पूर्णकालिकता में इसके भरोसे कुछ नहीं हो सकता.

पार्टी के कुछ कार्यकर्ता कहने लगे हैं कि एक हद तक 'अनुपस्थिति की सरकार' चल सकती है लेकिन 'अनुपस्थिति की पार्टी' बिलकुल नहीं चल सकती.

अगर विरोधी मुखर हो तो ऐसी चुप्पी उसका जवाब नहीं हो सकती, जिसका हवाला पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक शेर पढ़कर दिया था.

कार्यकर्ता कहते हैं कि जब अपनी आबरू लुटने को हो तो खामोश रहकर दूसरे की आबरू रखने का कोई मतलब नहीं बनता.

संभव है वे बोलना चाहते हों पर नेतृत्व की चुप्पी देखकर चुप रह जाते हैं कि पता नहीं बात किस करवट बैठे.

'पथ-प्रदर्शक'

सोनिया गांधी

दूसरा मामला 'नेतृत्व' का है, जो ख़ुद को 'चुनौतीविहीन' रखने में गर्व महसूस करता रहा.

मतलब यह कि वक़्त-ज़रुरत दीगर सवाल उठाए जा सकते हैं पर केंद्रीय नेतृत्व को उसमें शामिल नहीं किया जा सकता.

तो फिर कांग्रेस के पास विकल्प क्या हैं? क्या गांधी परिवार को 'पथ-प्रदर्शक' स्वीकार कर नेतृत्व किसी पूर्णकालिक ज़मीनी नेता को सौंपा जाए?

या फिर पार्टी के अंदर उठने वाली यह इक्का-दुक्का मांग मान ली जाए कि नई ऊर्जा भरने के लिए प्रियंका गांधी को महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी सौंपी जाए?

पार्टी की दुविधा

प्रियंका गांधी

पहला विकल्प ख़ारिज ही समझिए. दूसरे में भी कठिनाई बहुत है.

राहुल की जगह प्रियंका को लाने का एक अर्थ वर्तमान नेतृत्व की अक्षमता स्वीकार करना हो सकता है.

इसके साथ यह जुड़ा होगा कि क्या सर्वोच्च नेतृत्व से नेता चुनने में चूक हुई? प्रियंका और राहुल को एक साथ पार्टी में रखना भी इन प्रश्नों का उत्तर नहीं हो सकता.

बल्कि उससे कई दूसरे सवाल खड़े हो जाएंगे. राह भटके व्यक्ति के लिए ऐसी दुविधा चौराहे पर अक्सर हो जाती है.

गोस्वामी तुलसीदास ने ऐसी ही दुविधा में कहा होगा 'कहां जाई, का करी.'

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