ज़मीन अधिग्रहण पर 'अच्छे दिन अभी दूर'

    • Author, अजित साही
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
  • प्रकाशित

लोकसभा में भूमि अधिग्रहण विधेयक कुछ संशोधनों के साथ 10 मार्च को पारित हो गया.

इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार का अब तक का सबसे अहम प्रस्तावित विधेयक माना जा रहा है.

नए भूमि अधिग्रहण विधेयक के तहत अब ज़मीन मालिक की मर्ज़ी के बिना भी उनकी ज़मीन अधिग्रहित हो सकेगी.

लेकिन भूमि अधिग्रहण (संशोधन) विधेयक के रास्ते में अभी कई रुकावटें हैं. यही नहीं, इस विधेयक का अतीत भी कई हिंसक और अहिंसक आंदोलनों का गवाह रहा है.

क़ानून बनने से पहले कई मुश्किलें और विरोध हैं, जिनका अभी इस विधेयक को सामना करना है.

पढ़ें विस्तार से

भूमि अधिग्रहण (संशोधन) विधेयक को राज्यसभा में पारित कराना आसान नहीं होगा क्योंकि वहां मोदी का राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) अल्पमत में है.

हालाँकि भूमि अधिग्रहण विधेयक का लोकसभा में पास हो जाना भी बड़ी बात है क्योंकि राजद के कई घटक इसके विरोध में खड़े थे.

मोदी सरकार का दावा है कि ये विधेयक ज़मीन के मालिकों को पहले से अधिक मुआवज़े का हक़ देता है. विपक्ष के अलावा मोदी के कुछ सहयोगी दल भी इस विधेयक को जनविरोधी बता रहे हैं और आंदोलन छेड़ने की धमकी दे रहे हैं.

मोदी सरकार इस विधेयक से बहुत उम्मीद लगाए हुए हैं. उसका कहना है कि यह विधेयक भूमि अधिग्रहण को आसान बनाएगा. इससे औद्योगिक विस्तार को मदद मिलेगी और देश में ताबड़तोड़ कारखाने खुलने लगेंगे.

आर्थिक सुस्ती को ख़त्म कर ख़ुशहाली लाने के वादे ने ही मोदी को पिछले साल लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत दिलाया था. प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने ऐलान किया था कि वो भारत को चीन की तर्ज़ पर एक विशाल औद्योगिक मुल्क़ बनाएँगे.

चुनौतियां

लेकिन कम से कम दो दशकों का अनुभव भूमि अधिग्रहण (संशोधन) विधेयक के प्रति अधिक उत्साह पैदा नहीं करता है. हिंसक और अहिंसक दोनों क़िस्म के आंदोलनों ने लंबे समय से देश भर में भूमि अधिग्रहण को जमकर चुनौती दे रखी है.

वर्ष 2007-08 में पश्चिम बंगाल में भूमि अधिग्रहण विरोधी हिंसा में कई लोगों की मौत हो गई थी.

टाटा कंपनी को कार कारख़ाना लगाने की योजना रद्द करनी पड़ी थी. इंडोनेशिया के एक बड़े औद्योगिक समूह की योजनाओं पर भी अमल नहीं हो पाया था.

जनविरोधों के चलते ही कई वर्षों से दक्षिण कोरियाई कंपनी पॉस्को ओडिशा में दुनिया का सबसे बड़ा स्टील कारख़ाना शुरू नहीं कर पाई है. नक्सली हिंसा की वजह से छत्तीसगढ़ में टाटा और एस्सार कंपनियों की योजनाएं भी अटकी हुई हैं.

बदस्तूर विरोध

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नए भूमि अधिग्रहण विधेयक के विरोध में हैं.
इमेज कैप्शन, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नए भूमि अधिग्रहण विधेयक के विरोध में हैं.

उत्तर प्रदेश के नोएडा से महाराष्ट्र के रायगढ़ तक, पंजाब के लुधियाना से तमिलनाडु के तिरुवल्लूर तक हाल के वर्षों में भूमि अधिग्रहण विरोध बदस्तूर होता रहा है. कोई वजह नहीं दिखती कि नया क़ानून इन विरोधों को ध्वस्त कर देगा.

इसके विपरीत आशंका ये है कि जमीन मालिकों की सहमति की अनिवार्यता ख़त्म कर देने से विरोध और प्रबल होगा. ये क़ानून 2013 के उस क़ानून को रद्द करता है, जिसमें भूमि अधिग्रहण के लिए ज़मीन मालिकों की सहमति अनिवार्य की गई थी.

ऐसे विरोध के चलते ही पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार 34 साल बाद चुनाव हारकर सत्ता से बाहर हो गई थी.

बिहार में अक्टूबर में विधानसभा चुनाव होने हैं और इसीलिए वहाँ के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस नए क़ानून के विरोध में खड़े हैं.

कॉरपोरेट जगत

मोदी के समर्थन में अगर कोई दिखता है तो वो है कॉरपोरेट जगत. मगर आर्थिक मंदी के बाद वो भी 'चट मँगनी, पट ब्याह' के लिए अधीर है.

राजनीतिक और जनविरोध के चलते नहीं लगता कि नया क़ानून एक-दो साल में तेज़ी पकड़ पाएगा.

यूँ भी मोदी का औद्योगिक सपना साकार करना आसान नहीं होगा. ज़मीन आसानी से मिलने भी लगे तो भी देश भर में कारख़ाने लगाने के लिए बहुत बड़ी पूँजी चाहिए.

उस स्तर का निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था के बस का नहीं.

विकसित देश

विकसित देशों में फ़िलहाल ये माद्दा नहीं है कि भारत में लाखों-करोड़ों डॉलर का निवेश करें. 2008 के करारे झटके से अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था अब तक चरमराई हुई है.

ऐसे में अंतरराष्ट्रीय निवेश की संभावना कम होगी, क्योंकि किसी नए उद्योग के शुरुआती साल घाटे के होते हैं और आज पश्चिम के निवेशकों में लंबे समय तक मुनाफ़े की नाउम्मीदी का उत्साह नहीं है.

एक समस्या ये है कि भारत में बिजली, सड़क, रेल, हवाई अड्डा और बंदरगाह जैसी मौजूदा बुनियादी सुविधाएँ एक विशाल औद्योगिक मुल्कबनने लायक नहीं हैं. इनके विकास के लिए भी व्यापक पैमाने पर निवेश और इफ़रात ज़मीन की आवश्यकता होगी.

वैसे भी पश्चिम के बाज़ारों में बेचे जाने लायक माल निर्मित करने की तकनीक और कौशल भारत में विराट स्तर पर मौजूद नहीं है. इन्हें रातों-रात खड़ा कर देना नामुमकिन है. चीन का उदाहरण लें तो ऐसी फ़ौज तैयार करने के लिए दस साल भी कम होंगे.

अच्छे दिन

और फिर ये सब हो भी जाए और माल बनने भी लगे तो ख़रीदेगा कौन? पश्चिम के विकसित देशों के ग्राहक 2008 के पहले के मुक़ाबले अब कम ख़र्चीले हैं.

इस वजह से चीन, थाईलैंड और फ़िलीपींस जैसे स्थापित औद्योगिक मुल्कों का धंधा मंदा चल रहा है.

पहले से इस मंडी में पैर फैलाए इन मुल्कों के बीच भारत के लिए अपनी जगह बनाना क़तई आसान नहीं होगा.

चुनाव के दौरान मोदी का नारा था "अच्छे दिन आने वाले हैं". निश्चित ही करोड़ों भारतीय अच्छे दिन की उम्मीद रखते हैं.

लेकिन ये उम्मीद अगर भूमि अधिग्रहण विधेयक पर आधारित है तो अच्छे दिन अभी दूर हैं.

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