अपने घर लौटने के इंतजार में हैं विस्थापित तमिल

कोनापल्लम राहत शिविर के निवासी
    • Author, चार्ल्स हैवीलैंड
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

'' क्या आप घर जाना चाहेंगे?'' मेरे इस सवाल का तमिल में अनुवाद होने के बाद, उस व्यक्ति का कहना था, '' जी. हम उस दिन का इंतजार कर रहे हैं. वहाँ पर्याप्त ज़मीन है. हम वहाँ खेती करेंगे. हम वहाँ मछलियां मारेंगे.''

कोनापल्लम राहत शिविर में वो ये सब नहीं कर सकते हैं. इस शिविर में 240 विस्थापित परिवार रहते हैं.

श्रीलंका के उत्तरी इलाक़ों में 31,542 लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं. क्योंकि उनकी ज़मीनों पर सेना का कब्जा है.

जन्मभूमि की उम्मीद

42 साल की सहारयानी थारंगाराजा दो बच्चों की माँ हैं. वो उत्तरी तट पर स्थित अपने जन्मस्थान कांकेसाथुरई लौटना चाहती हैं. वो कहती हैं, ''कुछ अधिकारियों ने हमसे कहा है कि हमें अप्रैल के मध्य तक फिर से बसा दिया जाएगा.'' वो मुझसे पूछती हैं, '' क्या यह सही है, आपको जानते हैं.''

वह अब सामान्य जीवन जीना चाहती हैं, क्योंकि लंबे समय से वो मानसिक आघात से गुजर रही हैं. उन्हें 1990 में उनके घर से जबरदस्ती बेदख़ल कर दिया गया था. साल 2009 में तमिल विद्रोहियों की हार के बाद ख़त्म हुए युद्ध में उनके पिता, भाई और उनकी बहन की मौत हो गई.

वो अपनी ज़मीन वापस पाना चाहती हैं, क्योंकि वो ख़राब साफ़-सफ़ाई और मच्छरों के बीच और नहीं रह सकती हैं. अधिकारियों ने मात्र एक बार राशन की आपूर्ति की थी, लेकिन पिछले चार सालों में ऐसा सिर्फ़ एक बार हुआ है. उनके पति मछली बेचते हैं. लेकिन उससे बहुत अधिक आमदनी नहीं होती है. युद्ध में विधवा हुई उनकी चाची भी उनके साथ रहने आ गई हैं.

कोनापल्लम राहत शिविर से 10 मिनट की दूरी पर स्थित नादेस्वरा कॉलेज में खेल दिवस का आयोजन किया गया है.

बेदख़ल स्कूल

विस्थापित श्रीलंकाई तमिलों का एक राहत शिविर

यह एक विस्थापित स्कूल है, जो पहले कांकेसांथुरई में हुआ करता था. उसमें दो हज़ार बच्चे पढ़ते थे. लेकिन अब इस स्कूल में केवल 200 बच्चे ही पढ़ते हैं. नालीदार लोहे के चादरों से बनी कक्षाओं में बहुत कम जगह है.

यहाँ के वयस्क गुस्से में हैं. सेना ने 6,381 एकड़ ज़मीन के एक टुकड़े पर रिसार्ट होटल बना दिया है. देश के उत्तर में भी सेना ने ज़मीन पर कब्ज़ा कर इसी तरह के निर्माण कर दिए हैं.

नादेस्वरा कॉलेज के एक पूर्व छात्र कृष्णापिल्लई मनोहरम कहते हैं, '' मैं रिसार्ट में जा सकता हूं. लेकिन घर नहीं.''

इस स्कूल के एक पूर्व अध्यापक बीवी मुरूगेसू कहते हैं, ''हमने अपने घर खो दिए, अपने खेत खो दिए, अपना सबकुछ खो दिया.''

आजकल इस स्कूल में एक अफवाह चल रही है कि मूल नादेस्वरा कॉलेज, जिसे 1990 में खाली करा लिया गया था, उसे सेना ने ध्वस्त कर दिया है. स्थानीय परिषद के अध्यक्ष सोमासुंदरम सूगीरत्न इसकी पुष्टि करते हैं.

सेना का कब्ज़ा

वो मुझे बुलडोज़र और गिरे हुए घर की तस्वीरें दिखाते हैं. उनका नक्शा बताता है कि मुख्य इलाका सेना के कब्ज़े में है, जो कि 72 गांवों को निगल चुकी है. वहाँ 18 स्कूलों को बंद करा दिया गया है. इनमें से सात को कहीं और खोला गया है.

विस्थापित श्रीलंकाई तमिलों का एक स्कूल

वो कहते है, ''अधिकांश विस्थापित स्कूलों में छात्रों की संख्या पाँच सौ से घटकर 75 या सौ रह गई है.''

वो कहते हैं, इसके बाद भी वहाँ से कुछ अच्छी ख़बरें हैं. 18 विस्थापित स्कूलों में से एक अपने मूल भवन में फिर से खुल गया है. वहीं जाफना में नए कमांडर के नेतृत्व में सेना ने कुछ ज़मीने उनके असली मालिकों को लौटा दी हैं.

परमेश्वरन नवारत्नम जैसे ज़मीन मालिक समुद्र के किनारे स्थित अपनी ज़मीन दिखाने ले जाते हैं, जो कि उन्हें और उनके सात भाइयों को फिर से बहाल की गई है.

जाफना कस्बे में रहने वाले परमेश्वरन कहते हैं, ''हम यहाँ अपने गाँव के जीवन का आनंद उठा रहे हैं. बच्चे मुझे समुद्र में धकेल देत हैं. हम समुद्र तट पर योग करते हैं. हम मूंगे को रंग कर उसे विदेशी पर्यटकों को बेचेंगे.''

भारत का हस्तक्षेप

श्रीलंकाई तमिल अपनी ज़मीन दिखाते हुए

यहां जुलाई 1987 में स्थिति रातो-रात बदल गई थी जब सरकारी रेडियो ने तेज़ी से फैल रहे युद्ध में भारत के हस्तक्षेप को देखते हुए सबको इलाका खाली करने की चेतावनी दी. वो कहते हैं, ''हमारे भागने के आधे घंटे बाद ही नौसेना से समुद्र की ओर से और तमिल विद्रोहियों ने ज़मीन से हमला कर दिया.''

कुछ देर बाद उनका घर गिरा दिया गया. वे केवल चांदी का एक कप ही बचाकर ले जा पाए, जिसे उनके दादा ने उपहार में दिया था.

इस परिवार को उसकी ज़मीन वापस नहीं मिली है. लेकिन यह परिवार उतना ग़रीब नहीं है जितना कि एक भारतीय संस्था की ओर से दिए जा रहे घर को पाने के लिए होना चाहिए. लेकिन उतना अमीर भी नहीं है कि अपनी पैतृक ज़मीन पर नया घर बना सके.

वहीं कुछ लोग भाग्यशाली हैं कि उनके घरों को सेना ने फिर से बनाया है और उनकी ज़मीनें उन्हें लौटा दी हैं.

सेना का डर

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और तमिल कार्यकर्ताओं का कहना है कि कब्जा की गई ज़मीन का केवल कुछ हिस्सा ही वापस किया गया है और सेना उत्तरी तमिल इलाके में सेना के सिंहली सदस्यों की कॉलोनी बसाने की कोशिश कर रही है. लेकिन सेना का कहना है कि अधिकांश ज़मीन वापस कर दी गई है.

तमिलों के एक स्कूल के पूर्व अध्यापक

सेना के प्रवक्ता ब्रिगेडियर रूवान वानीगोसोरिया का कहना है, ''हमने उत्तर में 19 हज़ार तीन सौ एकड़ और पूर्व में 680 एकड़ से अधिक ज़मीन वापस की है.'' उन्होंने कहा कि सेना ने उत्तर में ढाई हज़ार एकड़ और पूर्व में 32 सौ एकड़ सरकारी ज़मीन भी वापस की है.

लेकिन विस्थापित लोगों का क्या होगा? इलाक़े से सैन्य कमांडर ने हाल के लिए दिनों में उन्हें फिर से बसाने के लिए कुछ वादे किए हैं. ज़मीन मामले के मंत्री जानाका तेन्नाकून ने बीबीसी से कहा कि वो लोगों को उनकी ज़मीने वापस देना चाहते हैं. इस मामले में उत्तर में सेना बहुत सहायक है.

उत्तरी श्रीलंका के विभिन्न हिस्सों में जहाँ सेना ने ज़मीनों पर कब्जा कर रखा है, वह उन पर क़ानूनी कब्ज़े का प्रयास कर रही है. अपनी ज़मीन वापस पाने के लिए क़रीब दो हजार लोग विभिन्न अदालतों में मुक़दमें लड़ रहे हैं.

कोनापल्लम राहत शिविर में वापस आने पर हमें एक 50 साल से अधिक के व्यक्ति ने पकड़ लिया है. उनका मानना था कि यहां विस्थापित लोगों को फिर से बसाने के लिए कोई गंभीर नहीं है.

वो कहते हैं, ''नेताओं ने पहले कुछ वादे किए थे. लेकिन हुआ कुछ नहीं.'' उनका मानना है कि सेना का ज़मीन के कागजात मांगना एक खेल है.

वो कहते हैं, ''जब हम बाहरी लोगों से बात करते हैं तो, वो हम पर नज़र रखते हैं. हम अपनी बात मुक्तभाव से नहीं रख सकते हैं. अगर हम बाहरी लोगों से कुछ भी कहते हैं, तो सुरक्षा बल बाद में आकर कहते हैं कि हम बाहरी लोगों से बात क्यों करते हैं.''

इस पर सरकार का कहना है कि तमिल टाइगर के दोबारा खड़ा होने से रोकने के लिए सेना की मौजूदगी ज़रूरी है.

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